भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 855

८२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दे तथा मोटा शरीर थोड़े ही दिनोंमें दुबला-पतला और दुबला-पतला शरीर मोटा हो जाय तो एक मासमें मृत्यु हो जाती है। जिसे स्वप्नमें भूत, प्रेत, पिशाच, असुर, कौए, कुत्ते, गीध, सियार, गधे और सूअर इधर-उधर ले जाते और खाते हैं, वह वर्षके अन्तमें प्राण त्यागकर यमराजका दर्शन करता है। जो स्वप्नकालमें गन्ध, पुष्प और लाल वस्त्रोंसे अपने शरीरको विभूषित देखता है, वह उस दिनसे केवल आठ मासतक जीवित रहता है। जो सपनेमें धूलकी राशि, विमौट (दीमकका घर) अथवा यूपदण्डपर चढ़ता है, वह छठे महीनेमें मृत्युको प्राप्त होता है। जो स्वप्नमें अपनेको तेल लगाये, मूड़ मुड़ाये और गदहेपर चढ़े दक्षिण दिशाकी ओर ले जाये जाते हुए देखता है अथवा अपने पूर्वजोंको इस रूपमें देखता है, उसकी मृत्यु छः महीनेमें हो जाती है। जो मनुष्य स्वप्नमें अपने मस्तक या शरीरपर तृण और सूखे काठ देखता है, वह छठे मासमें जीवित नहीं रहता। जो स्वप्नमें लोहेका डंडा और काला वस्त्र धारण करनेवाले किसी काले रंगके पुरुषको अपने आगे खड़ा देखता है, वह तीन माससे अधिक नहीं जीवित रहता। स्वप्नमें काले रंगकी कुमारी कन्या जिस पुरुषको अपने बाहुपाशमें कस ले, वह एक ही महीनेमें यमपुरीका दर्शन करेगा। जो मनुष्य स्वप्नमें वानरकी सवारीपर चढ़कर पूर्व दिशाकी ओर जाता है, वह पाँच ही दिनमें संयमनीपुरीको देखता है। यदि कृपण मनुष्य सहसा उदार हो जाय या उदार मनुष्य सहसा कृपण हो जाय, इस प्रकार यदि प्रकृतिमें सहसा विकार आ जाय तो वह मनुष्य शीघ्र मृत्युको प्राप्त होता है। ये तथा और भी बहुतसे मृत्युसूचक चिह्न हैं, जिन्हें जानकर मनुष्य योगका अभ्यास करे अथवा काशीपुरीकी शरण ले।

मुने! मैं गर्भवासको रोकनेवाले भगवान् काशीपति शिवकी शरण लेनेके सिवा दूसरा कोई ऐसा उपाय नहीं जानता जो कालको भी वंचित करनेमें समर्थ हो। जिसने भगवान् विश्वनाथके निवासस्थान काशीपुरीको प्राप्त किया, उत्तरवाहिनी गंगाका जल पी लिया और श्रीविश्वेश्वर लिंगका स्पर्श कर लिया, ऐसा कौन पुरुष वन्दनीय नहीं होता। काल कुपित होकर काशीनिवासी मनुष्योंका क्या बिगाड़ लेगा। जबतक बुढ़ापेका आक्रमण नहीं होता और जबतक इन्द्रियाँ शिथिल नहीं हो जातीं, तभीतक बुद्धिमान् पुरुष समस्त तुच्छ प्रपंचका त्याग करके काशीपुरीकी शरण ले। अगस्त्यजी! मृत्युसूचक दूसरे चिह्न तो दूर रहे, सबसे पहला लक्षण तो बुढ़ापा ही है, परंतु आश्चर्य है कि उसके आनेपर भी लोगोंको भय नहीं होता। वृद्धावस्थाने जिसका आलिंगन कर लिया है, उस मनुष्यको भाई-बन्धु नहीं मानते। उसके पुत्र भी उसकी आज्ञाका पालन नहीं करते और पत्नी भी उससे प्रेम करना छोड़ देती है। काशीमें निवास करनेसे जिस प्रकार कालको शीघ्रतापूर्वक जीत लिया जाता है, उस प्रकार उस कालको तपस्या और योगकी युक्तियोंद्वारा नहीं जीता जा सकता।


महाराज दिवोदासके धर्मपूर्ण राज्यका वर्णन

अगस्त्यजीने पूछा— भगवन्! भगवान् शंकरने राजा दिवोदाससे किस प्रकार काशीपुरीका परित्याग करवाया ?

कार्तिकेयजी बोले— गिरिराज मन्दरकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए भगवान् शिव ब्रह्माजीके वचनोंके गौरवसे मन्दराचलको चले गये। उनके चले जानेपर उन्हींके साथ सम्पूर्ण देवता भी वहीं चले गये। भगवान् विष्णु भी भूमण्डलके वैष्णव तीर्थोंका परित्याग करके जहाँ देवाधिदेव उमानाथ भगवान् शिव विराजमान थे उसी मन्दराचलपर चले गये। पृथ्वीसे देवसमुदायके चले जानेपर प्रतापी राजा दिवोदासने यहाँ निर्द्वन्द्व राज्य किया।