भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 856, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 856

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *

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उन्होंने काशीपुरीमें सुदृढ़ राजधानी बनाकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए सबको उन्नतिशील बनाया। हाथियोंसे भी अधिक बलवान् महाराज दिवोदासका अपराध कभी नागलोग भी नहीं करते थे। दानव भी मानवकी आकृति धारण करके उनकी सेवा करते थे। गुह्यक लोग सब ओर मनुष्योंमें राजाके गुप्तचर बनकर रहते थे। उनके सभाभवनके आँगनमें बैठे हुए विद्वानों एवं मन्त्रियोंको किसीने कभी शास्त्रोंद्वारा पराजित नहीं किया तथा रणांगणमें डटे हुए उनके योद्धाओंको कभी किसीने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा परास्त नहीं किया। उनके राज्यमें कभी ऐसे लोग नहीं देखे गये, जो पदभ्रष्ट तथा दूसरोंके द्वेषभाजन हों। उस समय सब प्रजा अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित एवं सुखी थी। राजा दिवोदासके राज्यमें सभी गाँव ईति^१-भीतिसे रहित थे। कोई गाँव ऐसा नहीं था, जिसकी रक्षाके लिये राजकर्मचारी उपस्थित न हों। घर-घरमें लोग कुबेरके समान धन दान करनेवाले थे।

इस प्रकार काशीमें राज्य करते हुए दिवोदासके अस्सी हजार वर्ष एक दिनके समान व्यतीत हो गये। अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते रहनेवाले राजा रिपुंजय (दिवोदास)-के द्वारा थोड़ेसे भी अधर्मका संग्रह नहीं हुआ। वे राजनीति-सम्बन्धी छः गुणोंके^२ ज्ञाता थे। उनका चित्त अपनी त्रिविध^३ शक्तियोंसे सदा उत्साहित रहता था। वे नीतिनिपुण पुरुषोंके समस्त उपायोंका ज्ञान रखनेवाले थे। इसलिये उनके छिद्रों (दोषों)-को देवता भी नहीं जानते थे। दिवोदासके राष्ट्रमण्डलमें सभी पुरुष एकपत्नी-व्रती थे। स्त्रियोंमें कोई भी ऐसी नहीं थी जो पतिव्रता न हो। एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था जिसने वेद-शास्त्रोंका अध्ययन न किया हो। कोई भी क्षत्रिय ऐसा न था जो शूरवीर न हो। एक भी वैश्य ऐसा नहीं दिखायी देता था जो अर्थोपार्जनके कर्ममें कुशल न हो। शूद्र अनन्य भावसे द्विजातियोंकी सेवामें लगे रहते थे। उनके राज्यमें अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी थे, जो सदा गुरुकुलके अधीन रहकर वेदविद्याके अध्ययनमें तत्पर थे। गृहस्थ लोग अतिथिसत्काररूपी धर्ममें कुशल, धर्मशास्त्रोंके मर्मज्ञ तथा सर्वदा शुभ आचरणोंमें संलग्न रहनेवाले थे। तीसरे आश्रमको स्वीकार करनेवाले वानप्रस्थी वनमें उपलब्ध होनेवाली जीविकाके प्रति ही आदर रखते थे। ग्रामीण वार्ताओंके प्रति उनके मनमें कोई उत्सुकता न थी और वे वैदिकमार्गमें चलनेवाले थे। उनके राज्यमें रहनेवाले संन्यासी सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित, जीवन्मुक्त, संग्रहशून्य, मन, वाणी और कर्मरूपी दण्डसे युक्त तथा सर्वथा निःस्पृह थे। दूसरे अनुलोम^४ और विलोम^५ कर्मसे उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंने भी अपनी पूर्वपरम्परासे प्रचलित धर्ममार्गका किंचिन्मात्र भी परित्याग नहीं किया था। राजा दिवोदासके राज्यमें कोई भी सन्तानहीन, निर्धन, वृद्धोंकी सेवा न करनेवाला तथा अकाल


१. अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहोंका उपद्रव, टिड्डी गिरना, तोते आदि पक्षियोंद्वारा खेतीको हानि पहुँचना और अपने देशपर किसी शत्रु राजाका आक्रमण होना—ये छः प्रकारकी ईतियाँ हैं।
२. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—ये छः गुण हैं। इनमें अवसर और आवश्यकताके अनुसार शत्रुसे मेल करना या रखना सन्धि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, स्वयं आक्रमण करना यान, योग्य समयकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बर्तना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।
३. प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति—ये तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं। कोष और दण्ड आदिके सम्बन्धकी शक्ति प्रभु-शक्ति, सन्धि-विग्रह आदिके सम्बन्धकी शक्ति मन्त्रशक्ति और पराक्रम प्रकट करने तथा विजय प्राप्त करनेकी शक्ति उत्साह-शक्ति कहलाती है।
४. उच्च वर्णके पुरुष तथा नीच वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य अनुलोम कहा जाता है।
५. नीच वर्णके पुरुष और उच्च वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य विलोम कहा जाता है।

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