भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 857, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 857

८२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मृत्युसे मरनेवाला नहीं था। चंचल, वाचाल, | सेवा-पूजा करते थे। सब विद्वान् सब स्थानोंपर वंचक, हिंसक, पाखण्डी, भाँड़, रँडुवे और | अपनी मनोवांछित वस्तु पाकर सम्मानित होते मदिरा बेचनेवाले भी नहीं थे। सर्वत्र मन्त्रोंका | थे। विद्वान् लोग तपस्वी महात्माओंकी, तपस्वी घोष सुनायी देता था। पद-पदपर शास्त्रचर्चा | महात्मा जितेन्द्रिय पुरुषोंकी, जितेन्द्रिय महापुरुष सुनायी देती थी। सब ओर शुभ वार्तालाप होते | ज्ञानियोंकी और ज्ञानीलोग शिवयोगियोंकी पूजा और आनन्दसे मंगलगीत गाये जाते थे। मांसभक्षी, | करते थे। ब्राह्मणोंके मुखरूपी अग्निमें दिन-रात ऋण लेनेवाले और चोर भी उनके राज्यमें नहीं | विधिपूर्वक उत्तम रूपसे तैयार की हुई मन्त्रपूत थे। पुत्र पिताके चरणोंकी पूजा, देवाराधना, | एवं बहुमूल्य हविका हवन किया जाता था। उपवास, व्रत, तीर्थ और देवोपासनाको परम धर्म | दिवोदासके राज्यमें जहाँ-तहाँ सब ओर पग- समझकर करते थे। नारियाँ अपने पतिके चरणोंकी | पगपर शुद्ध द्रव्यराशिके द्वारा बावली, कुआँ और पूजा, उनके वचनोंको सुनना और स्वामीकी | पोखरा खुदवानेवाले तथा बगीचे लगानेवाले आज्ञाका पालन करना अपना श्रेष्ठ धर्म समझती | धर्मात्मा पुरुष बहुत बड़ी संख्यामें थे। वहाँ सब थीं। सब लोग अपने बड़े भाईकी सदा पूजा | जातिके लोग अनिन्द्य (उत्तम) सेवाकार्यसे करते थे। सेवक प्रसन्नतापूर्वक अपने स्वामीके | सम्पन्न हो हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे। इस प्रकार चरणकमलोंकी पूजा करते थे। छोटी जातिके | सर्वत्र शुद्ध एवं पवित्र बर्ताव करनेवाले उस लोग ऊँची जातिके लोगोंके गुण और गौरवकी | भूपालके छिद्र ढूँढ़नेके लिये देवताओंने बहुत प्रशंसा करते थे। काशीपुरीके रहनेवाले सब | चेष्टा की, किंतु उन्हें थोड़ा-सा भी छिद्र नहीं मनुष्य तीनों समय वहाँके देवताओंकी बार-बार | प्राप्त हो सका।

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भगवान् शिवके आदेशसे सूर्यका काशीमें गमन और निवास तथा लोलार्कतीर्थका माहात्म्य

स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! इन्द्रादि देवताओंने | जिस प्रकार वह क्षेत्र उजाड़ हो जाय, वैसा दिवोदासके राज्य-शासनको असफल बनानेके | करो। परंतु उस राजाका अनादर न करना, लिये अनेक प्रकारके विघ्न उपस्थित किये, किंतु | क्योंकि धर्मके मार्गमें लगे हुए सत्पुरुषका जो धर्मात्मा राजा दिवोदासने अपने तपोबलसे उन | अपमान किया जाता है वह अपने ही ऊपर सब विघ्नोंपर विजय पायी। तदनन्तर मन्दराचलसे | पड़ता है और वैसा करनेसे महान् पाप भी होता महादेवजीने चौंसठ योगिनियोंको राजाका छिद्र | है। यदि तुम्हारे बुद्धिविकाससे राजा धर्मसे च्युत देखनेके लिये काशीमें भेजा। वे योगिनियाँ बारह | हो जायँ, तब अपनी दुःसह किरणोंसे तुम्हें उस महीनोंतक काशीमें रहकर निरन्तर चेष्टा करते | नगरको उजाड़ देना चाहिये। राजा दिवोदासमें रहनेपर भी राजाका कोई छिद्र (दोष) न पा | काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकारका सकीं। अतएव उनके ऊपर अपना कोई प्रभाव | सर्वथा अभाव है, इसलिये उन्हें काल भी नहीं न डाल सकीं। जब वे लौटकर वापस नहीं | जीत सकता। सूर्य! जबतक धर्ममें स्थिर बुद्धि गयीं, तब भगवान् शिवने सूर्यदेवको बुलाकर | है और धर्ममें मन स्थिरतापूर्वक लगा हुआ है, कहा—'सप्ताश्ववाहन! तुम उस मंगलमयी | तबतक विपत्तिमें भी मनुष्योंके मार्गमें विघ्नका काशीपुरीको शीघ्रतापूर्वक जाओ जहाँ धर्मात्मा | उदय कैसे हो सकता है। दिवाकर! इस संसारमें राजा दिवोदास विद्यमान हैं। राजाके धर्मविरोधसे | जितने जीव हैं उन सबकी चेष्टाओंको तुम जानते

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