संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 858, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८२९
हो, इसीलिये लोकचक्षु कहलाते हो। मेरे बताये हुए कार्यकी सिद्धिके लिये जाओ।'
भगवान् शिवकी आज्ञा शिरोधार्य करके सूर्यदेव काशीपुरीमें गये। वहाँ बाहर-भीतर विचरते हुए उन्होंने राजामें थोड़ा-सा भी धर्मका व्यतिक्रम नहीं देखा। वे अनेक रूप धारण करके एक वर्षतक काशीमें रहे। वे कभी अतिथि बनकर राजाके पास जाते और उनसे कुछ दुर्लभ वस्तु माँग बैठते थे, परंतु राजा दिवोदासके राज्यमें उन्हें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं दिखायी दी। सूर्य कभी याचक बनते, कभी बहुत बड़े दानी होकर जाते, कभी दीनताको प्राप्त होते और कभी ज्योतिषी बन जाते थे। कभी प्रत्यक्षवादी बनकर इस लोकमें प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुओंकी ही सत्यताका प्रतिपादन करते थे। कभी जटाधारी बनते, कभी दिगम्बर हो जाते और कभी विष उतारनेकी विद्यामें प्रवीण सँपेरा बन जाते थे। कभी-कभी उन्होंने नाना प्रकारके दृष्टान्तों और कथानकोंद्वारा अनेक प्रकारके व्रतका उपदेश करके वहाँकी पतिव्रता स्त्रियोंको बहकानेकी भी चेष्टा की। कभी तो वे ब्राह्मण बनते, कभी ब्रह्मज्ञानी, कहीं वेदाध्यासी, कहीं क्षत्रिय, कहीं वैश्य और अन्त्यज, कहीं ब्रह्मचारी, कहीं गृहस्थ, कहीं वानप्रस्थ, कहीं संन्यासी—इस प्रकार अनेकानेक रूप धारण करके वे लोगोंको भ्रममें डालते थे। कहीं-कहीं तो वे सम्पूर्ण विद्याओंमें पारंगत एवं सर्वज्ञ बनकर उपस्थित होते थे। इस प्रकार काशीमें विचरते हुए सूर्यने कभी किसी मनुष्यमें भी कोई छिद्र नहीं पाया।
इस क्षणभंगुर शरीरके रहते हुए जिसने धर्मकी रक्षा की है, उसने तीनों लोकोंकी रक्षा कर ली। उसे अर्थ और कामकी भलीभाँति रक्षा करनेसे क्या प्रयोजन है ? यदि बहुत-से मनुष्योंको सुखकारी प्रतीत होनेवाला काम भी रक्षा करनेके योग्य होता तो कामवैरी भगवान् शिव उसे क्षणभरमें भस्म करके अनंग (अंगहीन) क्यों बना देते ? शिवि आदि राजाओं तथा दधीचि आदि समस्त ब्राह्मणोंने अपने शरीरका त्याग करके भी धर्मकी रक्षा की है।
दुर्लभ काशीपुरीको पाकर कौन सचेत पुरुष उसे छोड़ सकता है। इस संसारमें प्रत्येक जन्ममें पुत्र, मित्र, स्त्री, खेत और धन मिल सकते हैं, केवल काशीपुरी नहीं मिलती। जबतक काशीसेवनसे उत्पन्न पुण्यमय तेजका उदय नहीं होता, तभीतक जुगुनूके समान अन्यान्य तेज प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार काशीके प्रभावको जाननेवाले तथा अन्धकारको दूर करनेवाले लोकचक्षु सूर्यदेव अपनेको बारह स्वरूपोंमें व्यक्त करके काशीपुरीमें स्थित हो गये। इनमें पहले लोलार्क है, दूसरे उत्तरार्क, तीसरे साम्बादित्य, चौथे द्रौपदादित्य, पाँचवें मयूखादित्य, छठे खखोल्कादित्य, सातवें अरुणादित्य, आठवें वृद्धादित्य, नवें केशवादित्य, दसवें विमलादित्य, ग्यारहवें गंगादित्य तथा बारहवें यमादित्य—ये बारहों काशीपुरीमें स्थित हैं। अगस्त्य! जिनका तमोगुण अधिक बढ़ा हुआ है, ऐसे दुष्टोंसे ये सदा इस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं। अर्क अर्थात् भगवान् सूर्यका मन काशीके दर्शनके लिये लोल (चंचल) हो उठा था, इसलिये काशीमें उनकी लोलार्क नामसे ख्याति हुई। दक्षिण दिशामें असीसंगमके समीप लोलार्ककी स्थिति है, वे सदा काशीवासी मनुष्योंके योग-क्षेमकी सिद्धि करते हैं। मार्गशीर्षमासकी सप्तमी या षष्ठी तिथिको रविवारका योग होनेपर वहाँकी वार्षिक यात्रा करके मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य असीसंगममें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण एवं विधिपूर्वक श्राद्ध करे तो वह पितरोंके ऋणसे छूट जाता है। जो मनुष्य रविवारको लोलार्कका दर्शन करके उनका चरणामृत लेता है, उसे कोई दुःख नहीं होता और खुजली, दाद तथा फोड़ा-फुंसीका कष्ट भी नहीं भोगना पड़ता। जो श्रेष्ठ मनुष्य लोलार्कके इस माहात्म्यको सुनता है, वह इस दुःखसागर संसारमें कहीं भी दुःखी नहीं होता।