भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 859

८३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उत्तरार्क सूर्यकी महिमा, सुलक्षणाकी तपस्या और उसपर शिव-पार्वतीकी कृपा

स्कन्दजी कहते हैं—काशीपुरीकी उत्तर दिशामें उत्तम अर्ककुण्ड है, जहाँ भगवान् सूर्य उत्तरार्क नामसे निवास करते हैं। मुने! वहाँ जो इतिहास घटित हो चुका है, उसको सुनो। काशीपुरीमें प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे जो आत्रेयकुलमें उत्पन्न, सदाचारी तथा अतिथिजनोंके प्रेमी थे। उनकी पत्नी अत्यन्त सुन्दरी तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी। वह घरके काम-काजमें बड़ी चतुर तथा पतिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली थी। ब्राह्मणने अपनी पत्नीसे एक उत्तम लक्षणोंवाली कन्याको जन्म दिया। वह कन्या मूल नक्षत्रके प्रथम चरणमें उत्पन्न हुई थी। उस समय बृहस्पति केन्द्रमें थे। ब्राह्मणकी वह कन्या पिता-माताके घरमें दिन-दिन बढ़ने लगी। वह बड़ी रूपवती, विनयशील, सदाचारपरायणा तथा माता-पिताका प्रिय करनेवाली थी। घरकी सामग्रियोंको माँज-धोकर साफ-सुथरा रखनेमें अत्यन्त निपुण थी। वह अपने पिताके घरमें जैसे-जैसे बढ़ने लगी, वैसे-ही-वैसे उसके पिताके मनमें यह चिन्ता भी बढ़ने लगी कि—'मेरी यह परम सुन्दरी उत्तम लक्षणोंवाली श्रेष्ठ कन्या किसको देनेयोग्य है। इसके योग्य उत्तम वर मुझे कहाँ मिलेगा जो कुल, अवस्था, शील, स्वभाव, शास्त्राध्ययन, रूप और धनसे भी सम्पन्न हो। किसके साथ ब्याह होनेपर इसे सुख मिलेगा।' इस प्रकार चिन्ता नामक ज्वरसे ग्रस्त हो प्रियव्रत ब्राह्मण गृह आदि सब वस्तुओंका त्याग करके मृत्युको प्राप्त हो गये। पिताके मरनेपर उस कन्याकी पतिव्रता माता भी कन्याको अकेली छोड़कर पतिके पीछे चली गयी। पतिव्रतका पालन करनेवाली सहधर्मिणीका यह धर्म ही है कि वह पतिके जीते-जी तथा मरनेपर भी पतिके ही साथ रहे। पुत्र, पिता, माता और बन्धु-बान्धव इनमेंसे कोई भी (पतिके सदृश) स्त्रीकी रक्षा नहीं करते। स्त्री अपने पतिके चरणोंकी जो सेवा करती है वह सेवा ही सर्वत्र उसकी रक्षा करती है। माता-पिताके मरनेपर वह सुलक्षणा नामवाली कन्या दुःखसे व्याकुल हो उठी। उसने उनके और्ध्वदैहिक संस्कार करके दशाह आदि क्रियाएँ सम्पन्न कीं और अनाथ एवं दीन होकर वह बड़ी भारी चिन्ता करने लगी—'अहो! मैं पिता-मातासे हीन असहाय अबला इस संसारसागरके उस पार, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, कैसे जा सकूँगी; क्योंकि स्त्रीभाव सबके द्वारा तिरस्कृत होनेवाला है। मेरे माता-पिताने मुझे किसी वरको अर्पण नहीं किया। ऐसी दशामें मैं स्वेच्छासे दूसरे किसी वरका वरण कैसे करूँ। यदि मैंने किसीका वरण कर भी लिया तो भी यदि वह कुलीन, गुणवान्, सुशील और अपने अनुकूल रहनेवाला न मिला तो उसका वरण करनेसे भी क्या लाभ होगा।'

इस प्रकार चिन्ता करती हुई रूप, उदारता और गुणोंसे युक्त उस ब्राह्मणकन्याने अनेकों युवकोंद्वारा प्रतिदिन बार-बार प्रार्थना की जानेपर भी किसीको अपने हृदयमें स्थान नहीं दिया। पिता-माताकी मृत्यु और उनके अद्भुत वात्सल्यका विचार करके वह बार-बार अपनी और इस नश्वर संसारकी निन्दा करने लगी—'अहो! जिन्होंने मुझे जन्म दिया और बड़े लाड़-प्यारसे पाला, वे मेरे माता-पिता कहाँ चले गये? देहधारी जीवकी इस अनित्यताको धिक्कार है। जैसे मेरे ही आगे मेरे माता-पिताका शरीर चला गया, उसी प्रकार मेरा भी शरीर चला जायगा।' ऐसा विचार करके उस बालिकाने अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें किया और स्थिरचित्त हो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करती हुई वह उत्तरार्कदेवके समीप कठोर तपस्या करने लगी। उसकी तपस्याके समय प्रतिदिन एक छोटी-सी बकरी उसके आगे आकर अविचल भावसे खड़ी हो जाती। फिर सन्ध्याके समय वह कुछ घास तथा पत्ते आदि चरकर और उत्तरार्क