संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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साम्बादित्य, द्रौपदादित्य और मयूखादित्यकी माहात्म्य-कथा
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णके एक लाख अस्सी पुत्र थे। वे सभी सूर्यके समान तेजस्वी, अत्यन्त सुन्दर, महाबलवान्, शस्त्र-विद्या और शास्त्रोंके अतिशय ज्ञाता तथा अत्यन्त सुलक्षण थे। उन सबमें साम्ब सबसे अधिक गुणवान् थे। उन्होंने काशीमें आकर सूर्यदेवकी आराधना की और एक कुण्ड बनवाया। जो मनुष्य रविवारको साम्ब कुण्डमें स्नान करके साम्बादित्यकी पूजा करता है, वह रोगोंसे पीडित नहीं होता है। माघके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको यदि रविवार हो तो वह सूर्यग्रहणके समान कल्याणकारी महापर्व बताया गया है। उस दिन अरुणोदय कालमें साम्ब कुण्डमें स्नान करके जो साम्बादित्यकी पूजा करता है, वह बड़े-बड़े रोगोंसे मुक्त हो अक्षय धर्मको प्राप्त होता है। चैत्रमासके रविवारको साम्बादित्यकी वार्षिक यात्रा होती है। उस दिन साम्ब कुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करके जो अशोक पुष्पोंसे साम्बादित्यकी पूजा करता है, वह कभी शोकग्रस्त नहीं होता। भगवान् विश्वनाथसे पश्चिम दिशामें महात्मा साम्बने यहाँ शुभ देनेवाली सूर्यमूर्तिकी भलीभाँति आराधना की थी। महामते! साम्बादित्यका पूजन और नमस्कार करके जो आठ बार उनकी परिक्रमा करता है, वह पापरहित हो काशीवासका फल पाता है।
अब मैं द्रौपदादित्यका परिचय दूँगा। द्रौपदादित्य भक्तोंको सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। अतः उनका भलीभाँति सेवन करना चाहिये। एक समयकी बात है, पाँचों पाण्डव अपने शत्रुओंद्वारा उपस्थित की हुई बड़ी भारी विपत्तिमें पड़कर वनवासी हो गये। पांचाल देशके राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी उनकी धर्मपत्नी थी। उसने अपने पतियोंके दुःखसे सन्तप्त होकर भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने द्रौपदीको करछुल और ढक्कनके साथ एक अक्षय स्थालीपात्र (बटलोई) दिया और इस प्रकार कहा—'महाभागे! इस स्थालीसे जितने भी अन्नकी इच्छा रखनेवाले लोग आयेंगे, वे सभी तृप्तिको प्राप्त होंगे। ऐसा तभीतक होगा, जबतक तुम भोजन नहीं कर लोगी। तुम्हारे भोजन कर लेनेपर यह खाली हो जायगी। यह रसीले व्यंजनोंकी निधि है और इच्छानुसार भोजन देनेवाली है। जो मनुष्य भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें तुम्हारे सम्मुख स्थित हुए मुझ द्रौपदादित्यकी आराधना करेगा, उसकी भूखकी पीड़ा नष्ट हो जायगी। धर्मप्रिय द्रौपदी! काशीमें तुम्हारे दर्शनसे रोग और भूख-प्यासका भय नहीं रहेगा।' इस प्रकार वर देकर सूर्यदेव भगवान् शंकरकी आराधनामें लग गये। जो मनुष्य द्रौपदीके द्वारा आराधित भगवान् सूर्यकी कथाको भक्तिपूर्वक सुनेगा, उसका पाप नष्ट हो जायगा।
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! मैंने द्रौपदादित्यकी महिमा संक्षेपसे कही। अब मयूखादित्यका माहात्म्य सुनो। पूर्वकालमें त्रिभुवनविख्यात पंचगंगा तीर्थमें भगवान् सूर्यने अत्यन्त उग्र तपस्या की। गभस्तीश्वर नामक महालिंग और भक्तोंको मंगल प्रदान करनेवाली मंगला नामक गौरीदेवीकी स्थापना करके उनकी आराधना करते हुए भगवान् सूर्य तीव्र तपके तेजसे अत्यन्त जाज्वल्यमान हो उठे। उस समय पृथ्वी और आकाशके बीचका समस्त प्रदेश त्रिलोकीको दग्ध करनेमें समर्थ सूर्यकिरणोंद्वारा अत्यन्त सन्तप्त हो उठा। जैसे कदम्बफलके ऊपर सब ओरसे पुष्प ही दिखायी देते हैं, फल नहीं। उसी प्रकार ऊपर, नीचे और अगल-बगलमें सब ओर केवल सूर्यकी किरणें ही दिखायी देती थीं, सूर्यदेव नहीं। तेज और तपस्याकी राशिभूत सूर्यकी तपोमयी ज्वालाओंके तीव्र भयसे तीनों लोकोंके समस्त चराचर प्राणी काँप उठे। सब मन-ही-मन सोचने लगे—अहो! सूर्यदेव सम्पूर्ण जगत्के आत्मा