भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 862
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *८३३

हूँ। यदि वही हमें जलाने लगे तो कौन हमारा रक्षक होगा। सूर्य समस्त संसारके नेत्र हैं। ये ही सब ओर प्रकाश फैलाते हैं और प्रतिदिन प्रातःकाल मृतप्राय जगत्‌को नूतन जीवन देकर जाग्रत् करते हैं। ये ही अन्धकारमय अन्धकूपमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंका चारों ओर अपने किरणरूप हाथ फैलाकर उद्धार करते हैं।

इस प्रकार सम्पूर्ण विश्वको व्याकुल देख विश्वरक्षक भगवान् विश्वनाथ सूर्यदेवको वर देनेके लिये गये। वे समाधिमें स्थित होकर अपने-आपको भी भूल गये थे। अत्यन्त निश्चलभावसे बैठे हुए अंशुमाली सूर्यको देखकर भगवान् शंकरने कहा—‘आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्य ! अब तपस्याकी आवश्यकता नहीं है, वह पूरी हो गयी। अब कोई वर माँगो।’ सूर्यदेव ध्यान एवं समाधिके द्वारा अपनी इन्द्रियवृत्तियोंको रोककर स्थिर बैठे थे। अतः उन्होंने भगवान् शंकरकी बात नहीं सुनी। तब शिवजीने अपने हाथसे उनका स्पर्श किया। उनका स्पर्श पाते ही विश्वलोचन सूर्यने अपनी आँखें खोलीं और अपने आराध्यदेव भगवान् शिवको प्रत्यक्ष देखकर साष्टांग प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने इस प्रकार स्तुति की—

सूर्य बोले—देवाधिदेव ! जगत्पते ! सर्वव्यापी ! भर्ग ! भीम ! भव ! चन्द्रभूषण ! भूतनाथ तथा भवभयहारी देव ! आप प्रणत जनोंको मनोवांछित वस्तु देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। चन्द्रचूड ! मृड ! धूर्जटे ! हर ! त्र्यक्ष ! दक्षके सैकड़ों यज्ञोंका नाश करनेवाले शान्त ! शाश्वत ! शिवापते ! शिव ! आप प्रणत जनोंको मनोवांछित वस्तु देनेवाले हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। नीललोहित ! अभीष्ट वस्तु देनेवाले त्रिलोचन ! विरूपाक्ष ! व्योमकेश ! जीवोंके अज्ञानमय बन्धनका नाश करनेवाले। आप प्रणत जनोंकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। वामदेव ! शितिकण्ठ ! शूलपाणे ! चन्द्रशेखर ! नागेन्द्रभूषण ! कामनाशन ! पशुपते ! महेश्वर ! आप शरणागतोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। त्र्यम्बक ! त्रिपुरारे ! ईश्वर ! सबकी रक्षा करनेवाले त्रिनयन ! तीनों वेदस्वरूप ! कालकूटके विषका दलन करनेवाले ! कालके भी काल ! आप प्रणत जनोंकी मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप जहाँ हैं वहाँ रात्रिका अभाव है। शर्व ! आप सर्वव्यापी हैं। स्वर्गमार्गका सुख देनेवाले तथा अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्ति करानेवाले हैं। अन्धकासुरके शत्रु तथा जटाजूटधारी हैं। प्रभो ! आप प्रणत जनोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप भक्तोंके लिये कल्याणकारी और दुष्टोंके लिये उग्र हैं। गिरिराजनन्दिनीके प्राणवल्लभ ! आप ही सबके वास्तविक पति हैं। विश्वनाथ ! ब्रह्मा और विष्णु भी आपकी स्तुति करते हैं। आप ही वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्मा हैं, आपको सबकी चेष्टाओंका ज्ञान है। नाथ ! आप अपने चरणोंमें मस्तक झुकानेवाले भक्तोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ देते हैं, आपको नमस्कार है। यह विश्व आपका ही स्वरूप है, तथापि आप सबसे परे हैं, आप ही निराकार ब्रह्म हैं, आपमें कुटिलताका सर्वथा अभाव है, आप अमृत