भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 863

८३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


(मोक्ष) देनेवाले हैं, मन और वाणीकी पहुँचसे सर्वथा दूर हैं। दूरतक पहुँचे हुए सर्वव्यापी परमेश्वर! आप प्रणत जनोंको मनोवांछित वस्तुएँ प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है।^१ <br><br> इस प्रकार स्तुति करके सूर्यने महादेवजी और पार्वतीजीकी परिक्रमा की। तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने शिवके वामांग भागमें विराजमान गौरीदेवीका इस प्रकार स्तवन किया^२। <br><br> **सूर्य बोले—**देवि! आपको प्रणाम करनेमें प्रवीण जो भक्त पुरुष अपने ललाटको आपके चरणारविन्दोंकी धूलिसे उज्ज्वल करता है, जन्मान्तरमें भी चन्द्रमाकी मनोहर लेखा उसके भाल-प्रदेशको अत्यन्त उज्ज्वल बना देती है। अर्थात् वह पुरुष भगवान् शंकरका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। श्रीमती मंगलागौरी! आप सम्पूर्ण मंगलोंकी जन्मभूमि हैं। श्रीमंगले! आप सम्पूर्ण पापराशिरूपी रूईको दग्ध करनेके लिये प्रज्वलित अग्नि हैं। श्रीमंगले! आप सम्पूर्ण दानवोंके दर्पका दलन करनेवाली हैं। श्रीमंगले! आप इस सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाकरें। विश्वेश्वरी! आप ही समस्त जगत्के जीवोंकी सृष्टि, पालन तथा प्रलयकालमें उनका संहार करनेवाली हैं। आपके नामकीर्तनसे प्रकट हुई पुण्यमयी निर्मल नदी पातकरूपी तटवर्ती वृक्षोंको बहा ले जाती है। मातः! आप भगवान् शिवकी प्रिया हैं, आप ही संसारके दुःसह दुःखभारका निवारण करनेवाली हैं। इस जगत्में आपके सिवा दूसरी कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो शरणागतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो। जिनके ऊपर आपका कल्याणकारी कृपाकटाक्ष हो जाता है, वे ही समस्त भुवनोंमें धन्य हैं और वे ही माननीय हैं। देवि! आप सहज प्रकाशस्वरूपा हैं। काशीपुरीमें आप सदा निवास करती हैं और प्रणत जनोंके लिये मोक्ष-लक्ष्मीरूपा हैं। जो लोग निरन्तर आपका स्मरण करते हैं, वे मोक्षरूपी धनकी रक्षा करनेमें कुशल एवं उसे पानेके सुयोग्य पात्र हैं। उनकी बुद्धि परम शुद्ध है। आपके उन बड़भागी भक्तोंको कामारि भगवान् शिव भी सदा स्मरण करते

रविरुवाच

१- देवदेव जगताम्पते विभो भर्ग भीम भव चन्द्रभूषण।
भूतनाथ भवभीतिहारक त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
चन्द्रचूड मृड धूर्जटे हर त्र्यक्ष दक्षशततन्तुशातन।
शान्त शाश्वत शिवापते शिव त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
नीललोहित समीहितार्थद द्व्येकलोचन विरूपलोचन।
व्योमकेश पशुपशनाशन त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
वामदेव शितिकण्ठ शूलभृच्चन्द्रशेखर फणीन्द्रभूषण।
कामकृत्पशुपते महेश्वर त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
त्र्यम्बक त्रिपुरसूदनेश्वर त्राणकृत्त्रिनयन त्रयीमय।
कालकूटदलनान्तकान्तक त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
शर्वरीरहित शर्व सर्वग स्वर्गमार्गसुखदापवर्गद।
अन्धकासुररिपो कपर्दभृत् त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
शङ्करोग्र गिरिजापते पते विश्वनाथ विधिविष्णुसंस्तुत।
वेदवेद्य विदिताखिलेङ्गित त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
विश्वरूप पररूपवर्जित ब्रह्म जिह्वरहितामृतप्रद।
वाङ्मनोविषयदूर दूरग त्वां नतोऽस्मि नतवांछितप्रद॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९। ४६–५३)

२- इत्थं परीत्य मार्तण्डो मृडं देवं मृडानिकाम्। अथ तुष्टाव प्रीतात्मा शिववामार्द्धहारिणीम्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९। ५४)