संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 864, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * । ८३५
हैं। मात:! जिसके हृदयमें आपके अत्यन्त निर्मल युगलचरणारविन्द सतत विराजमान हैं, यह सम्पूर्ण विश्व उसके हाथमें ही है। मंगलगौरि! जो प्रतिदिन आपके नामका जप करता है, उसके घरको अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ कभी नहीं छोड़ती हैं। देवि! आप ही प्रणवस्वरूपा वेदमाता गायत्री हैं। आप ही द्विजोंके लिये कामधेनु हैं। आप ही तीनों व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) हैं और आप ही सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये देवताओं और पितरोंकी तृप्तिमें कारणभूत स्वाहा और स्वधा हैं। माता मंगलागौरी! आप ही भगवान् चन्द्रशेखरके समीप गौरीरूपसे विराजमान हैं। आप ही ब्रह्माजीके निकट सावित्री होकर रहती हैं। आप ही चक्रपाणि भगवान् विष्णुके यहाँ मनोहर लक्ष्मी रूपसे निवास करती हैं तथा आप ही काशीमें मोक्षलक्ष्मी हैं। निर्मल स्वरूप धारण करनेवाली देवि! आप ही इस जगत्में मुझ शरणागतकी रक्षा करनेवाली हैं*।
इस प्रकार भगवान् शिवके आधे शरीरकी शोभास्वरूपा मंगलादेवीका इस मंगलाष्टक नामक महास्तोत्रसे स्तवन करके सूर्यदेवने महादेवजी तथा मंगलागौरीको बारंबार प्रणाम किया और उन दोनोंके सामने चुपचाप पड़े रहे।
तब महादेवजीने कहा—सूर्यदेव! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। महामते! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मित्र! तुम तो सदा मेरे नेत्रमें ही स्थित हो, जिससे मैं समस्त चराचर जगत्को देखता हूँ। तुम मेरी आठ मूर्तियोंमेंसे एक हो। आजसे तुम सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण तेजोंका समुदाय तथा सबके सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता होओ। अपने सब भक्तोंके समस्त दुःखोंको दूर करो। तुमने मेरे चौंसठ नामोंके द्वारा जो यह अष्टकस्तोत्र सुनाया है, इसके द्वारा मेरी स्तुति करके मनुष्य मेरी भक्ति प्राप्त कर लेगा। यह मंगलागौरीका अष्टकस्तोत्र मंगलाष्टक नामसे विख्यात होगा। इसके द्वारा मंगलागौरीकी स्तुति करके मनुष्य मंगल प्राप्त करेगा। ये नामचतुःषष्ट्यष्टक तथा मंगलाष्टक नामक दोनों स्तोत्र श्रेष्ठ, पुण्यमय तथा सब पातकोंके नाशक हैं। जो काशीसे दूरदेशमें रहता है, वह भी यदि प्रतिदिन तीनों समय इन दोनों स्तोत्रोंका जप करे तो वह श्रेष्ठ एवं शुद्धचित्त होकर दुर्लभ काशीको प्राप्त
रविरुवाच
* देवि त्वदीयचरणाम्बुजरेणुगौरैं भालस्थलीं वहति यः प्रणतिप्रवीणः।
जन्मान्तरेऽपि रजनीचरचारुलेखा तां गौरयत्यतितरां किल तस्य पुंसः॥
श्रीमङ्गले सकलमङ्गलजन्मभूमे श्रीमङ्गले सकलकल्मषतूलवस्त्रे।
श्रीमङ्गले सकलदानवदर्पहन्त्रिश्रीमङ्गलेऽखिलमिदं परिपाहि विश्वम्॥
विश्वेश्वरि त्वमसि विश्वजनस्य कर्त्री त्वं पालयिष्यसि तथा प्रलयेऽपि हन्त्री।
त्वन्नामकीर्तनसमुल्लसदच्छपुण्या स्रोतस्विनी हरति पातककूलवृक्षान्॥
मातर्भवानि भवती भवतीव्रदुःखसंहारहारिणि शरण्यमिहास्ति नान्या।
धन्यास्त एव भुवनेषु त एव मान्या येषु स्फुरेत्तव शुभः करुणाकटाक्षः॥
ये त्वां स्मरन्ति सततं सहजप्रकाशां काशीपुरीस्थितिमतीं नतमोक्षलक्ष्मीम्।
तान् संस्मरेत्स्मरहरो धृतशुद्धबुद्धीन् निर्वाणरक्षणविचक्षणपात्रभूतान्॥
मातस्तवाङ्घ्रियुगलं विमलं हृदिस्थं यस्यास्ति तस्य भुवनं सकलं करस्थम्।
यो नाम ते जपति मङ्गलगौरि नित्यं सिद्ध्यष्टकं न परिमुञ्चति तस्य गेहम्॥
त्वं देवि वेदजननी प्रणवस्वरूपा गायत्र्यसि त्वमसि वै द्विजकामधेनुः।
त्वं व्याहृतित्रयमिहाखिलकर्मसिद्धयै स्वाहा स्वधासि सुमनःपितृतृप्तिहेतुः॥
गौरि त्वमेव शशिमौलिनि वेधसि त्वं सावित्र्यसि त्वमसि चक्रिणि चारुलक्ष्मीः।
काश्यां त्वमस्यमलरूपिणि मोक्षलक्ष्मीस्त्वं मे शरण्यमिह मङ्गलगौरि मातः॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९।५५–६२)