संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * । ८३५
हैं। मात:! जिसके हृदयमें आपके अत्यन्त निर्मल युगलचरणारविन्द सतत विराजमान हैं, यह सम्पूर्ण विश्व उसके हाथमें ही है। मंगलगौरि! जो प्रतिदिन आपके नामका जप करता है, उसके घरको अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ कभी नहीं छोड़ती हैं। देवि! आप ही प्रणवस्वरूपा वेदमाता गायत्री हैं। आप ही द्विजोंके लिये कामधेनु हैं। आप ही तीनों व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) हैं और आप ही सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये देवताओं और पितरोंकी तृप्तिमें कारणभूत स्वाहा और स्वधा हैं। माता मंगलागौरी! आप ही भगवान् चन्द्रशेखरके समीप गौरीरूपसे विराजमान हैं। आप ही ब्रह्माजीके निकट सावित्री होकर रहती हैं। आप ही चक्रपाणि भगवान् विष्णुके यहाँ मनोहर लक्ष्मी रूपसे निवास करती हैं तथा आप ही काशीमें मोक्षलक्ष्मी हैं। निर्मल स्वरूप धारण करनेवाली देवि! आप ही इस जगत्में मुझ शरणागतकी रक्षा करनेवाली हैं*।
इस प्रकार भगवान् शिवके आधे शरीरकी शोभास्वरूपा मंगलादेवीका इस मंगलाष्टक नामक महास्तोत्रसे स्तवन करके सूर्यदेवने महादेवजी तथा मंगलागौरीको बारंबार प्रणाम किया और उन दोनोंके सामने चुपचाप पड़े रहे।
तब महादेवजीने कहा—सूर्यदेव! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। महामते! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मित्र! तुम तो सदा मेरे नेत्रमें ही स्थित हो, जिससे मैं समस्त चराचर जगत्को देखता हूँ। तुम मेरी आठ मूर्तियोंमेंसे एक हो। आजसे तुम सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण तेजोंका समुदाय तथा सबके सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता होओ। अपने सब भक्तोंके समस्त दुःखोंको दूर करो। तुमने मेरे चौंसठ नामोंके द्वारा जो यह अष्टकस्तोत्र सुनाया है, इसके द्वारा मेरी स्तुति करके मनुष्य मेरी भक्ति प्राप्त कर लेगा। यह मंगलागौरीका अष्टकस्तोत्र मंगलाष्टक नामसे विख्यात होगा। इसके द्वारा मंगलागौरीकी स्तुति करके मनुष्य मंगल प्राप्त करेगा। ये नामचतुःषष्ट्यष्टक तथा मंगलाष्टक नामक दोनों स्तोत्र श्रेष्ठ, पुण्यमय तथा सब पातकोंके नाशक हैं। जो काशीसे दूरदेशमें रहता है, वह भी यदि प्रतिदिन तीनों समय इन दोनों स्तोत्रोंका जप करे तो वह श्रेष्ठ एवं शुद्धचित्त होकर दुर्लभ काशीको प्राप्त
रविरुवाच
* देवि त्वदीयचरणाम्बुजरेणुगौरैं भालस्थलीं वहति यः प्रणतिप्रवीणः।
जन्मान्तरेऽपि रजनीचरचारुलेखा तां गौरयत्यतितरां किल तस्य पुंसः॥
श्रीमङ्गले सकलमङ्गलजन्मभूमे श्रीमङ्गले सकलकल्मषतूलवस्त्रे।
श्रीमङ्गले सकलदानवदर्पहन्त्रिश्रीमङ्गलेऽखिलमिदं परिपाहि विश्वम्॥
विश्वेश्वरि त्वमसि विश्वजनस्य कर्त्री त्वं पालयिष्यसि तथा प्रलयेऽपि हन्त्री।
त्वन्नामकीर्तनसमुल्लसदच्छपुण्या स्रोतस्विनी हरति पातककूलवृक्षान्॥
मातर्भवानि भवती भवतीव्रदुःखसंहारहारिणि शरण्यमिहास्ति नान्या।
धन्यास्त एव भुवनेषु त एव मान्या येषु स्फुरेत्तव शुभः करुणाकटाक्षः॥
ये त्वां स्मरन्ति सततं सहजप्रकाशां काशीपुरीस्थितिमतीं नतमोक्षलक्ष्मीम्।
तान् संस्मरेत्स्मरहरो धृतशुद्धबुद्धीन् निर्वाणरक्षणविचक्षणपात्रभूतान्॥
मातस्तवाङ्घ्रियुगलं विमलं हृदिस्थं यस्यास्ति तस्य भुवनं सकलं करस्थम्।
यो नाम ते जपति मङ्गलगौरि नित्यं सिद्ध्यष्टकं न परिमुञ्चति तस्य गेहम्॥
त्वं देवि वेदजननी प्रणवस्वरूपा गायत्र्यसि त्वमसि वै द्विजकामधेनुः।
त्वं व्याहृतित्रयमिहाखिलकर्मसिद्धयै स्वाहा स्वधासि सुमनःपितृतृप्तिहेतुः॥
गौरि त्वमेव शशिमौलिनि वेधसि त्वं सावित्र्यसि त्वमसि चक्रिणि चारुलक्ष्मीः।
काश्यां त्वमस्यमलरूपिणि मोक्षलक्ष्मीस्त्वं मे शरण्यमिह मङ्गलगौरि मातः॥
(स्क० पु०, का० पू० ४९।५५–६२)
| ८३६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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करेगा। ये दोनों स्तोत्र काशीमें मोक्षसम्पत्ति प्रदान करते हैं। अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक अनेक स्तोत्रोंका परित्याग करके भी इन दोनों स्तोत्रोंका पाठ एवं जप करना चाहिये। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह गभस्तीश्वरलिंग भक्तिभावसे सेवित होनेपर सब सिद्धियोंका दाता होगा। तुमने भक्तिभावसे चम्पा और कमलके समान कान्तिवाली गभस्तिमालाओं (किरणों)से जो इस ईश्वरलिंगका पूजन किया है, उससे इसका नाम गभस्तीश्वर लिंग होगा। पंचगंगामें स्नान करके गभस्तीश्वरका पूजन करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे रहित होकर कभी भी माताके गर्भमें जन्म धारण नहीं करेगा। जो स्त्री या पुरुष चैत्र शुक्ला तृतीयाको उपवास करके वस्त्र, आभूषण आदि महान् उपचारोंसे इन महादेवी मङ्गलागौरीकी पूजा करेगा और प्रातःकाल व्रत पूर्ण करके पारण करेगा, वह कभी दुर्भाग्य एवं दरिद्रताको नहीं प्राप्त होगा। उसके सारे पाप नष्ट हो जायँगे और वह पुण्यकी राशि प्राप्त करेगा। वन्ध्या भी इस मंगलागौरीव्रतको करके बालकको जन्म देती है। यहाँ तपस्या करते हुए तुम्हारे मयूखसमूह (किरणपुंज) ही देखे गये हैं, शरीर नहीं दिखायी दिया है। अतः अदितिनन्दन! तुम्हारा नाम मयूखादित्य होगा। तुम्हारी पूजा करनेसे मनुष्योंको कोई रोग-व्याधि नहीं होगी। रविवारको तुम्हारे दर्शनसे दरिद्रताका नाश होगा।
इस प्रकार मयूखादित्यको बहुत-से वर देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और सूर्यदेवने वहीं निवास किया।
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गरुडेश्वर लिंग तथा खखोल्कादित्यकी प्रादुर्भाव-कथा, काशीमें गरुड और विनताकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति
स्कन्दजी कहते हैं— अगस्त्य! त्रिलोचन स्थानके उत्तरभागमें खखोल्क नामक आदित्यकी स्थिति बतायी गयी है। वे सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। पूर्वकालमें कद्रू और विनता—ये दोनों बहनें परस्पर खेल रही थीं। ये दक्ष प्रजापतिकी कन्याएँ और मरीचिनन्दन कश्यपकी धर्मपत्नयाँ थीं। उस खेलमें कद्रूने अपनी बहनसे कहा—‘विनते! सूर्यके रथमें जो उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा सुना जाता है, उसका रूप कैसा है, जानती हो तो कहो। हम दोनों शर्त रखकर इसका निर्णय करें, जो जिससे पराजित हो, वह उसकी दासी हो। हमारी इस प्रतिज्ञामें ये सब सखियाँ साक्षी हैं।' इस प्रकार आपसमें शर्त बदकर कद्रूने सूर्यके घोड़ेको चितकबरा बताया और विनताने श्वेत कहा। विनताके चले जानेपर कद्रूने अपने पुत्रोंको बुलाकर कहा—‘तुम मेरे वचनसे शीघ्र ही उच्चैःश्रवा घोड़ेके समीप जाओ और उसे श्याम रंगसे युक्त चितकबरा कर दो।' कद्रूके बुद्धिमान् पुत्रोंने उच्चैःश्रवाके पास जाकर उसके शरीरको जगह-जगहसे काले केशके समान चितकबरा कर दिया। कद्रू और विनता दोनोंने सूर्यके रथमें घोड़ेको कुछ-कुछ काले रंगसे युक्त अर्थात् चितकबरा देखा। तब विनताने कहा—‘बहन! तुम्हारी ही बात सत्य निकली, अतः तुमने मुझे जीत लिया।' तबसे विनता कद्रूकी दासी हो गयी। तदनन्तर विनताके पुत्र गरुड़ने नागोंको अमृत देकर अपनी माताको दासीभावसे मुक्त किया। दासीपनसे छुटकारा मिलनेपर विनताने गरुड़से कहा—बेटा! मैं दास्यजनित दुष्कृतको दूर करनेके लिये काशीपुरी जाऊँगी, वहाँ साक्षात्
| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८३७ |
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भगवान् विश्वनाथ चन्द्रमाका आभूषण धारण किये तारकमन्त्ररूपी नौकाके द्वारा दुस्तर संसारसागरसे सबको पार लगा देते हैं। जिनपर भगवान् विश्वनाथकी कृपा होती है और जिनके समस्त कर्मबन्धन टूट जाते हैं, उन्हीं मनुष्योंकी बुद्धि काशीपुरीमें निवास करनेकी होती है। समस्त पाप धुल जानेके कारण जिनका मन काशीपुरीमें निवास करनेके लिये उत्सुक होता है, वे ही इस संसारमें वस्तुतः मनुष्य हैं। दूसरे लोग तो मनुष्यके रूपमें पशु ही हैं।'
माताकी यह बात सुनकर गरुड़ने नमस्कार करके कहा—मैं भी भगवान् शिवसे सम्मानित काशीपुरीका दर्शन करनेके लिये चलूँगा। तत्पश्चात् माताकी आज्ञा पाकर पक्षिराज गरुड़ उन्हींके साथ क्षणभरमें मोक्षभूमि वाराणसीपुरीमें आ पहुँचे। वहाँ इन दोनोंने बड़ी भारी तपस्या की। अविचल इन्द्रियोंवाले पक्षिराज गरुड़ने शिवलिंगकी स्थापना की और विनताने खखोल्क* नामक 'आदित्य' को स्थापित किया। थोड़े ही दिनोंमें उन दोनोंकी तीव्र तपस्यासे काशीमें भगवान् शंकर और सूर्यदेव दोनों प्रसन्न हो गये। गरुड़द्वारा स्थापित शिवलिंगसे उमानाथ भगवान् शिव प्रकट हुए और उन्होंने गरुड़को बहुत-से अत्यन्त दुर्लभ वरदान दिये—'पक्षिराज ! मेरे यथार्थ रहस्यको, जिसे देवता भी नहीं जान सके हैं, तुम जान लोगे। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह लिंग गरुडेश्वरके नामसे विख्यात होगा। इसका दर्शन, स्पर्श और पूजन मनुष्योंको परम ज्ञान देनेवाला होगा। हम ही वह विष्णु हैं और वह विष्णु ही हम हैं, हम दोनोंमें तुम्हारी भेददृष्टि नहीं होनी चाहिये। तुम भगवान् विष्णुके श्रेष्ठ वाहन होकर स्वयं भी पूजनीय हो जाओगे।' अपने भक्त गरुड़को इस प्रकार वरदान देकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये और गरुड़जी भी भगवान् विष्णुके वाहन होकर भूमण्डलमें सबके लिये पूजनीय हो गये।
तदनन्तर एक दिन तपस्यामें संलग्न हुई विनताको देखकर शिवके ही दूसरे स्वरूप 'खखोल्कादित्य' नामक सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने विनताको शिवज्ञानसे युक्त पापनाशक वरदान दिया। वरदान देकर वे काशीमें ही रह गये और विनतादित्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार काशीके विघ्नस्वरूप अन्धकारका नाश करनेवाले खखोल्क नामक आदित्य वहाँ निवास करते हैं। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। काशीमें पैशंगिल (पिलपिला) तीर्थमें भगवान् खखोल्कादित्यका दर्शन करनेसे मनुष्य क्षणभरमें नीरोग हो जाता है और मनोवांछित वस्तुको प्राप्त करता है।
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काशीखण्ड पूर्वार्ध सम्पूर्ण।
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* एक बार गरुड़की माता विनता सर्पोंकी माता कद्रूको पीठपर चढ़ाकर सूर्य-मण्डलके समीप ले गयी। कद्रू सूर्यका ताप सहन न कर सकनेके कारण मूर्च्छित-सी होने लगी और घबराहटमें बोल उठी—'खखोल्का निपतेत्।' वह कहना चाहती थी, 'सखी उल्का निपतेत्'—'सखी! उल्का गिरेगी' परंतु निकल गया—'खखोल्का' तबसे सूर्यकी 'खखोल्क' संज्ञा हो गयी।
८३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
काशीखण्ड ( उत्तरार्ध )
अरुणादित्य, वृद्धादित्य, केशवादित्य, विमलादित्य, गंगादित्य तथा यमादित्यकी महिमाका वर्णन
स्कन्दजी कहते हैं—महामते! विनतानन्दन अरुणने काशीमें तपस्या करके भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे प्रसन्न होकर आदित्यने अरुणको अनेक वर दिये और उन्हींके नामपर अरुणादित्य नामसे विख्यात हुए।
सूर्यदेव बोले—विनतानन्दन! तुम जगत्के हितके लिये घोर अन्धकारका नाश करते हुए सदा मेरे रथपर आगे सारथिके स्थानपर बैठा करो। जो यहाँ अरुणादित्य नामसे प्रसिद्ध मेरा निरन्तर पूजन करेंगे, उन्हें दुःख, दरिद्रता और पापकी प्राप्ति नहीं होगी। वे न तो रोगोंसे पीड़ित होंगे और न उन्हें कोई उपद्रव ही सतावेंगे।
ऐसा कहकर भगवान् सूर्य उन्हें रथपर बिठाकर अपने साथ ले गये। तबसे लेकर आज भी प्रातःकाल सूर्यके रथपर अरुणका उदय होता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन सूर्यसहित अरुणको नमस्कार करता है, उसे दुःखका भय कहाँसे हो सकता है। जो श्रेष्ठ मनुष्य अरुणादित्यका माहात्म्य सुनेगा, उसे किसी प्रकारके पापकी प्राप्ति नहीं होगी।
अगस्त्य! अब वृद्धादित्यका माहात्म्य सुनो। प्राचीन कालमें काशीपुरीमें महातपस्वी वृद्ध हारीतने भगवान् सूर्यकी आराधना की। विशालाक्षी-देवीके दक्षिण भागमें सूर्यदेवकी शुभ लक्षणोंसे युक्त शुभदायिनी मूर्ति स्थापित करके दृढ़भक्तिके साथ उन्होंने सूर्यदेवका आराधन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने वृद्धतपस्वी हारीतसे कहा—'माँगो, तुम्हें कौन-सा वर अभीष्ट है, जो दिया जाय?'
मुनिने कहा—मुझको पुनः युवावस्था प्रदान कीजिये। युवावस्था प्राप्त होनेपर मैं उत्तम तपस्या करूँगा; क्योंकि तपस्या ही श्रेष्ठ धर्म है, तपस्या ही श्रेष्ठ धन है, तपस्या ही श्रेष्ठ काम है और तपस्या ही श्रेष्ठ मोक्ष है। जितेन्द्रिय पुरुष दीर्घकालतक तपस्या करनेके लिये ही चिरस्थायी आयु चाहते हैं। दान करनेके लिये ही धन चाहते हैं, पुत्र प्राप्त करनेके लिये ही स्त्री चाहते हैं और मोक्षके लिये ही उत्तम ज्ञान चाहते हैं। तब सूर्यदेवने तत्काल ही वृद्धहारीतका बुढ़ापा दूर करके उन्हें रमणीयताकी हेतु और पुण्यकी साधनभूता युवावस्था प्रदान की। इस प्रकार महामुनि वृद्धहारीतने काशीमें सूर्यदेवसे युवावस्था प्राप्त करके उग्र तपस्या की। वृद्धसे पूजित होनेके कारण वहाँ भगवान् सूर्य वृद्धादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। कुम्भज! बुढ़ापा, दुर्गति तथा रोगका नाश करनेवाले वृद्धादित्यकी काशीमें आराधना करके बहुतोंने सिद्धि प्राप्त की है। काशीमें रविवारके दिन वृद्धादित्यको नमस्कार करके मनुष्य मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसकी कभी भी दुर्गति नहीं होती।
मुने! इसके बाद मैं तुम्हें केशवादित्यका उत्तम माहात्म्य सुनाता हूँ, सुनो। जिस प्रकार भगवान् केशवके समीप पहुँचकर सूर्यदेवने ज्ञान प्राप्त किया था, वह प्रसंग इस प्रकार है। एक दिन आकाशमें विचरण करते हुए सूर्यदेवने काशीमें भगवान् केशवको विश्वनाथजीकी पूजा करते देखा। तब वे कौतूहलवश दूसरे रूपसे आकाशसे उतर आये और भगवान् केशवके समीप बैठे। उस समय वे मौन होकर अविचल भावसे स्थित हो महान् आश्चर्यमें डूबे हुए अवसरकी प्रतीक्षा करते रहे। जब भगवान् विष्णुने पूजा समाप्त की, तब सूर्यदेवने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। श्रीहरिने
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८३९
सूर्यदेवको अपने समीप बैठा लिया। तत्पश्चात् नमस्कार करके सूर्यदेवने कहा—'जगत्पते ! आप सम्पूर्ण विश्वके पालक तथा समस्त जगत्के अन्तरात्मा हैं। जगत्पूज्य माधव ! क्या इस काशीपुरीमें आपके लिये भी कोई पूजनीय है? यह समस्त संसार आपसे ही प्रकट होता और आपमें ही लयको प्राप्त होता है। आप ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। नाथ ! समस्त संसारका सन्ताप दूर करनेवाले आप यह किसकी पूजा कर रहे हैं? आपके इस आश्चर्ययुक्त कार्यको देखकर ही मैं आपके समीप आया हूँ।'
सहस्रों किरणोंसे सुशोभित श्रीसूर्यदेवका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णुने हाथके संकेतसे उन्हें मना किया कि 'जोरसे न बोलो।' तत्पश्चात् श्रीसूर्यको समझाते हुए कहा—'इस काशीपुरीमें समस्त कारणोंके कारणभूत एकमात्र देवदेव, नीलकण्ठ, उमानाथ महादेवजी ही पूजनीय हैं। जन्म-मृत्यु और जराका नाश करनेवाले एकमात्र मृत्युंजय ही पूज्य देवता हैं। राजा श्वेत भगवान् मृत्युंजयकी पूजा करके स्वयं भी मृत्युंजय हो गये थे। कालके भी काल महाकालकी आराधना करके भृंगीने भी कालपर विजय पायी। मृत्युंजयकी पूजा करनेवाले शिलादपुत्र नन्दीको भी मृत्युने छोड़ दिया है। जिन्होंने लीलापूर्वक एक ही बाणके प्रहारसे त्रिपुरासुरपर विजय पायी, उन भगवान् भूतनाथकी आराधना करके कौन पुरुष पूजनीय नहीं हो सकता। वे भगवान् शिव तीनों लोकोंपर विजय पानेवाले सबके सार तत्त्व हैं; उनकी उत्तम आराधना कौन नहीं करेगा। जिनके नेत्रोंकी पलकके संकोचमात्रसे सम्पूर्ण जगत्का संकोच (प्रलय) हो जाता है और जिनके नेत्रोंके खुलनेसे ही समस्त संसारकी सृष्टि होती है, वे भगवान् शिव किसके परम पूजनीय नहीं हैं। यहाँ भगवान् शिवके शिवविग्रहकी पूजा करके मनुष्य शीघ्र ही चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है। काशीमें शिवलिंगकी आराधना करके मनुष्य क्षणभरमें सौ जन्मोंके संचित पाप-समूहको भी त्याग देता है। सूर्य ! तुम भी अपने महान् तेजको बढ़ानेवाली परम शोभा-सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये भगवान् महेश्वरके श्रीविग्रहकी पूजा करो।'
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर श्रीसूर्यदेव स्फटिक मणिका शिवलिंग बनाकर आज भी इसकी पूजा करते हैं। वे भगवान् केशवको गुरु मानकर उनके उत्तर भागमें आज भी स्थित हैं। इसीलिये वे केशवादित्यके नामसे विख्यात हैं। वे काशीमें अपने भक्तोंके अज्ञानमय अन्धकारको दूर करते हैं और पूजित होनेसे मनोवांछित फल देते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य काशीमें केशवादित्यकी आराधना करके उस परम ज्ञानको पा लेता है, जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ पादोदकतीर्थमें स्नान, सन्ध्या और तर्पण आदि करके जो केशवादित्यका दर्शन करता है, वह जन्मभरके पातकोंसे छूट जाता है। अगस्त्य ! यदि माघमासकी रथसप्तमी (अचला सप्तमी)—को रविवारका योग प्राप्त हो तो आदि-केशवके समीप पादोदकतीर्थमें प्रातःकाल स्नान करके केशवादित्यकी पूजा करनेसे मनुष्य सात जन्मोंके पातकोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। सप्तमीकी अधिष्ठात्री देवीसे यह प्रार्थना करे—'मैंने पहलेके सात जन्मोंमें जन्मभर जो-जो पातक किये हैं, उन सबको तथा मेरे रोग और शोकको भी माघमासकी सप्तमी नष्ट कर दे। हे माघकी सप्तमी! इस जन्मके किये हुए, दूसरे जन्मोंके किये हुए, मनसे, वाणीसे और शरीरसे किये हुए, जानकर या अनजानमें किये हुए—इन सात प्रकारके पापोंको, जो सात रोगोंसे युक्त हैं, तुम आजके स्नानसे हर लो।' इस प्रकार तीन मन्त्रोंका जप (मन्त्रार्थकी भावना) करके मनुष्य पादोदकतीर्थमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्रीकेशवादित्यका दर्शन करके वह क्षणभरमें पापमुक्त हो जाता है। केशवादित्यके माहात्म्यका श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेवाला मनुष्य पापसे लिप्त नहीं होता और भगवान् शिवकी भक्ति पा लेता है।
मुने ! इसके पश्चात् अब विमलादित्यका उत्तम माहात्म्य सुनो। काशीके परम सुन्दर हरिकेश—
८४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वनमें भगवान् विमलादित्य विराजमान हैं। प्राचीन कालकी बात है, उच्च देशमें कोई विमल नामक क्षत्रिय था। यद्यपि वह निर्मल मार्ग (सदाचार)-में ही स्थित था, तो भी पूर्वजन्मके किसी कर्मके योगसे उसको कोढ़का रोग हो गया। उसने स्त्री, गृह और धन सबका परित्याग करके काशीमें आकर सूर्यदेवकी आराधना की। वह विधिपूर्वक अर्घ्य देता और सूर्यदेवता-सम्बन्धी स्तोत्रोंका जप करता था। इस प्रकार आराधना करनेवाले विमलपर प्रसन्न हो भगवान् सूर्य उसे वर देनेको उद्यत हुए
और बोले—'विमल! तुम्हारा यह कुष्ठरोग दूर हो जाय, इसके सिवा तुम कोई और भी वर माँगो।' तब विमलने प्रणाम करके कहा—'भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। जो लोग आपमें भक्ति रखते हों, उनके कुलमें कभी कोई कोढ़ी न हो। इतना ही नहीं, उन्हें अन्य प्रकारके रोग भी न हों और उनके घरमें कभी दरिद्रता न रहे। आपके भक्तजनोंके मनमें कभी किसी प्रकारका सन्ताप न हो।'
भगवान् सूर्यने कहा—महाप्राज्ञ! ऐसा ही होगा, इसके सिवा दूसरा भी उत्तम वर तुम्हें दिया जाता है, सुनो। तुमने काशीमें मेरी जिस मूर्तिका पूजन किया है, उसका सान्निध्य मैं कभी नहीं छोड़ूँगा, यह प्रतिमा तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगी। इसका नाम विमलादित्य होगा। यह प्रतिमा सदा भक्तोंको वर देनेवाली तथा सब रोगोंका नाश और समस्त पापोंका संहार करनेवाली होगी।
ऐसा वरदान दे भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये। विमल भी निर्मल-शरीर होकर अपने घर चला गया। इस प्रकार काशीमें विमलादित्य सबका कल्याण प्रदान करनेवाले हैं। उनके दर्शनमात्रसे कोढ़का रोग नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य विमलादित्यकी इस माहात्म्य-कथाको सुनता है, वह निर्मल शुद्धिको प्राप्त होता है और उसके मनकी मैल धुल जाती है।
भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें गंगादित्य हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य यहाँ शुद्धिको प्राप्त होता है। जब राजा भगीरथको आगे करके गंगाजी काशीपुरीमें आयीं, उस समय भगवान् सूर्य गंगाजीकी स्तुति करनेके लिये वहीं स्थित हुए। इस समय भी वे गंगाजीको अपने सम्मुख करके दिन-रात उनकी स्तुति करते रहते हैं और प्रसन्नचित्त हो गंगाजीके भक्तोंको वरदान देते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य काशीमें गंगादित्यकी आराधना करके कभी दुर्गतिको नहीं पाता और न रोगका ही भागी होता है।
महाभाग! अब यमादित्यके प्रकट होनेकी कथा सुनो। यमेशसे पश्चिम और वीरेशसे पूर्वकी दिशामें यमादित्यकी स्थिति है, उनका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य कभी यमलोकको नहीं देखता। पूर्वकालमें यमने यमतीर्थमें बड़ी भारी निर्मल तपस्या करके भक्तोंके सिद्धिदाता यमेश और यमादित्यको स्थापित किया है। कुम्भज! वहाँ साक्षात् यमने आदित्यकी स्थापना की है, इसलिये वे 'यमादित्य' कहलाते हैं। यमादित्य जीवोंकी यमयातनाको हर लेते हैं। जो यमतीर्थमें स्नान करके यमके द्वारा स्थापित यमेश्वर और यमादित्यको नमस्कार करता है, वह कभी यमलोकको नहीं
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४१
देखता। चतुर्दशी तिथि, भरणी नक्षत्र और मंगलवारका योग होनेपर यमतीर्थमें स्नान, तर्पण और पिण्डदान करके मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है। नरकनिवासी पितर सदा यह अभिलाषा करते हैं कि 'मंगल, भरणी और चतुर्दशीका उत्तम योग आनेपर क्या कोई हमारे कुलका परम बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होगा जो काशीपुरीके भीतर यमतीर्थमें स्नान करके हमारी मुक्तिके लिये तिलसहित तर्पण करेगा।' यमतीर्थमें पितरोंका श्राद्ध, यमेश्वरका दर्शन-पूजन तथा यमादित्यको नमस्कार करके मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है।
मुने! इस प्रकार तुम्हें काशीके बारह आदित्योंका परिचय दिया गया जो पापोंका नाश करनेवाले हैं। इन सबकी उत्पत्ति या प्राकट्यकी कथा सुनकर मनुष्य कभी नरकमें नहीं पड़ता।
ब्रह्माजीका दिवोदासकी सहायतासे काशीमें यज्ञ करना और दशाश्वमेधतीर्थकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! जब अंशुमाली सूर्य त्रिभुवनमोहिनी काशीपुरीको चले गये, तब मन्दराचल पर्वतपर विराजमान भगवान् शिव पुनः इस प्रकार विचार करने लगे—'अहो! अभीतक वहाँसे लौटकर न तो योगिनियाँ आयीं और न अबतक सूर्यदेव ही आये। काशीका समाचार भी मेरे लिये अत्यन्त दुर्लभ हो गया, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। अब काशीकी वार्ता जाननेके लिये किसको यहाँसे भेजूँ? वहाँकी बातोंको ठीक-ठीक जाननेमें ब्रह्माजी ही समर्थ हैं।' यह विचारकर ब्रह्माजीको बुलाकर महादेवजीने कहा—'कमलोद्भव! मैंने काशीका समाचार जाननेके लिये पहले तो योगिनियोंको भेजा था, फिर सूर्यदेवको भी प्रस्थापित किया था, किंतु अभीतक वे वहाँसे लौट नहीं रहे हैं। अतः अब आप जाइये, आपका मार्ग कल्याणमय एवं उसका भविष्य मंगलमय हो।'
भगवान् शिवकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके ब्रह्माजी काशीपुरीको गये। काशीका दर्शन करके ब्रह्माजीका मन हर्षोल्लाससे भर गया। वे वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके राजा दिवोदाससे मिले और हाथमें जल और अक्षत लेकर राजाके लिये स्वस्तिवाचन किया। राजाने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। राजा दिवोदासने अभ्युत्थान और आसन आदिके द्वारा मुनिका यथावत् सत्कार किया और उनके शुभागमनका कारण पूछा।
तब ब्राह्मणने कहा—राजन्! मैं बहुत समय पहलेका पुराना हूँ, दीर्घकालसे यहाँ रहता हूँ। तुम मुझे नहीं जानते, परंतु मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारा पहला नाम रिपुंजय है। मैंने सैकड़ों ऐसे राजा देखे हैं जो छहों* शत्रुओंको जीत चुके थे। सुशील, सत्त्वसम्पन्न, वेद-शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्, रणनीतिकुशल, दया और उदारतामें निपुण, सत्यव्रतपरायण, पृथ्वीके समान क्षमाशील तथा समुद्रसे भी अधिक गम्भीर थे। परंतु राजर्षे! तुम्हारे भीतर जो परम पवित्र दो-तीन सद्गुण हैं, वे उन राजाओंमें प्रायः मुझे देखनेको नहीं मिले हैं। तुम प्रजाजनोंको अपने कुटुम्बके लोगोंकी भाँति मानते हो। ब्राह्मण तुम्हारे देवता हैं और तुम बड़े-बड़े तपस्वी लोगोंके तपमें सहायक होते हो। ये बातें जैसी तुम्हारे भीतर हैं, वैसी औरोंमें नहीं देखी जातीं। अतः अन्य राजा तुम्हारे समान नहीं हैं। दिवोदास! तुम अपने सद्गुणोंके कारण धन्य हो, मान्य हो तथा सत्पुरुषोंके द्वारा भी आदरणीय हो। तुम्हारे डरसे देवता भी कुमार्गमें
* काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—ये छः शत्रु हैं। बिना जीते हुए पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसहित मनको भी छः शत्रुओंके समान माना गया है।
८४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जानेका साहस नहीं करते। हम धन आदिकी कामनाओंसे रहित ब्राह्मण हैं, हमें किसीकी स्तुति-प्रशंसासे क्या प्रयोजन है। किंतु क्या करें, तुम्हारे सद्गुण ही हम-जैसे लोगोंको भी स्तुतिमें लगा देते हैं। राजन्! मैं इस समय यहाँ यज्ञ करना चाहता हूँ और इस कार्यमें तुम्हें सहायक बनाना चाहता हूँ। तुम्हारी यह राजधानी कर्मभूमिमें सबसे अधिक उत्तम है। न्याय और सन्मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंद्वारा जो धन संचय किया गया हो, उसका काशीमें सद्धर्मके कार्यमें उपयोग करना चाहिये; अन्यथा वह धन क्लेशका ही कारण होता है। भूपाल! सबको ज्ञान प्रदान करनेवाले त्रिनेत्रधारी शिवको छोड़कर दूसरा कोई भी काशीकी उत्तम महिमाको यथार्थ रूपसे नहीं जानता। मैं समझता हूँ, तुम परम धन्य हो जो कि सैकड़ों जन्मोंके पुण्यसे काशीपुरीका पालन कर रहे हो। 'काशी तीनों लोकोंका सार है, काशी तीनों वेदोंका सार है, काशी त्रिवर्ग— धर्म, अर्थ और कामसे परे सब पुरुषार्थोंका सारभूत मोक्ष है।' ऐसा महर्षियोंने निर्णय किया है। भगवान् विश्वनाथके अनुग्रहसे ही तुम्हारे द्वारा इस पुरीका पालन हो रहा है।
इतना कहकर जब ब्राह्मण देवता चुप हो गये, तब राजाने इस प्रकार उत्तर दिया—विप्रवर! मैंने आपकी कही हुई सब बातें हृदयमें धारण कर ली है। आप यज्ञ करनेके इच्छुक हैं, अतः आपकी सहायताके कार्यमें मैं आपका दास हूँ। आप मेरे कोषागारसे समस्त यज्ञ-सामग्रियोंको ले जायँ और एकाग्रचित्त होकर यज्ञ करें। ब्रह्मन्! मैं जो राज्य करता हूँ, उसमें थोड़ा-सा भी मेरा स्वार्थ नहीं है। मैं तो अपने पुत्र, कलत्र तथा शरीरद्वारा भी परोपकारके लिये ही यत्न करता हूँ। मनीषी महर्षियोंने राजाओंके लिये प्रजावर्गका यथावत् पालन ही एकमात्र महान् धर्म बताया है। द्विजोत्तम! मैं ब्राह्मणोंके मुखमें जो हवन करता हूँ, उसे यज्ञकर्मोंसे भी बढ़कर मानता हूँ। यह मेरे लिये बड़े आनन्दकी बात है कि आप मेरे घर कुछ माँगनेके लिये आये हैं।
धर्मात्मा राजा दिवोदासका यह वचन सुनकर ब्रह्माजी अपने मनमें बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने यज्ञ-सामग्रियोंका संग्रह किया और राजर्षि दिवोदासकी सहायता पाकर काशीमें दस अश्वमेध नामक महायज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया। तभीसे वहाँ वाराणसीपुरीमें मंगलदायक दशाश्वमेध नामक तीर्थ प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है। कुम्भज! पहले उस तीर्थका नाम ‘रुद्रसरोवर’ था, पीछेसे वह दशाश्वमेधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके बाद भगीरथके साथ स्वर्गलोककी नदी भागीरथी गंगाका वहाँ आगमन हुआ, इससे वह तीर्थ अत्यन्त पुण्यजनक हो गया। ब्रह्माजी वहाँ दशाश्वमेधेश्वर लिंगकी स्थापना करके स्थित हो गये। धर्मानुरागी राजा दिवोदासमें कोई भी छिद्र उन्हें नहीं मिला, अतः वे महादेवजीके सम्मुख जाकर क्या कहते। उस क्षेत्रके प्रभावको जानकर भगवान् विश्वनाथका ध्यान करते हुए ब्रह्मेश्वरकी स्थापना करके ब्रह्माजी भी काशीपुरीमें ही रह गये।
अगस्त्य! सब तीर्थोंमें उत्तम दशाश्वमेध है। वहाँ जाकर जो कुछ भी पुण्यकर्म किया जाता है, वह अक्षय कहा गया है। स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा, सन्ध्योपासन, तर्पण, श्राद्ध तथा पितरोंकी पूजा आदि सभी सत्कर्म वहाँ सफल एवं अक्षय होते हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य दशाश्वमेधतीर्थमें एक बार स्नान करके दशाश्वमेधेश्वरका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिको दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके मनुष्य जन्मभरके पातकोंसे मुक्त हो जाता है। ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीयाको रुद्रसरोवरमें स्नान करनेसे मनुष्यके दो जन्मोंके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार शुक्ल पक्षकी दशमीतक प्रत्येक तिथिमें क्रमशः स्नान करनेवाला मनुष्य प्रत्येक जन्मके पापको त्याग देता है। दस जन्मोंका पाप हर लेनेवाली गंगादशहरा तिथिको
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४३
दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष यम-यातनाको कभी नहीं देखता। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक गंगादशहराके दिन दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके दशाश्वमेधेश्वर नामक उत्तम लिंगका पूजन करता है, उसको गर्भदशा छू भी नहीं सकती। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें वहाँकी वार्षिक यात्रा करके पंद्रह दिनोंतक रुद्रसरोवरमें स्नान करनेवाला पुरुष कभी विघ्नोंसे तिरस्कृत नहीं होता।
महाराज दिवोदासने यज्ञ पूर्ण करनेवाले वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी ब्रह्माजीके लिये वहाँ एक ब्रह्मशाला बनवा दी। उसीमें वेद-मन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनिसे आकाशको गुँजाते हुए ब्रह्माजीने निवास किया।
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पिशाचमोचनतीर्थकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! भगवान् शिवके अत्यन्त प्रिय कपर्दी नामक गणाधीशने पितृरीश्वरलिंगके उत्तरभागमें एक शिवलिंग स्थापित किया और उसके आगे ‘विमलोदक’ नामसे प्रसिद्ध एक कुण्ड भी खुदवाया, जिसके जलका स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य निर्मल हो जाता है। प्राचीन त्रेतायुगकी बात है। शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकि नामक एक मुनि थे जो काशीमें प्रतिदिन कपर्दीश्वरकी पूजा करते हुए तपस्या करते थे। एक दिन हेमन्तके मार्गशीर्ष मासमें तपस्वी वाल्मीकिने मध्याह्नके समय विमलोदक नामवाले महातीर्थमें स्नान करके सिरसे लेकर पैरतक भस्म लगाया। फिर कपर्दीश्वरके दक्षिणभागमें बैठकर मध्याह्नकालोचित नित्य-कर्म प्रारम्भ किया। मस्तकपर भस्म रमाये हुए उन्होंने आध्यात्मिक सन्ध्याका चिन्तन किया और पंचाक्षर मन्त्र-( नमः शिवाय) का जप करते हुए जटाजूटधारी भगवान् शिवका ध्यान किया। तत्पश्चात् संहार-क्रम (वामावर्त)-से परिक्रमा करके तीन बार उच्चस्वरसे ‘हुडुम्’ ‘हुडुम्’ ‘हुडुम्’ का उच्चारण किया। तदनन्तर प्रणवको ही सामने रखकर उसका षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद—इन स्वरोंके भेदसे गान किया। गान करके आनन्दपूर्वक हस्तसंचालन करते हुए नृत्य भी किया। अंग-संचालनद्वारा मनोहर ढंगसे मण्डलयुक्त नृत्य करके वे महातपस्वी कुछ क्षणोंतक उस सरोवरके ही तटपर बैठे रहे। इसी समय उन्होंने अत्यन्त विकराल आकृतिवाले एक भयानक पिशाचको देखा। उसकी आँखें कुछ-कुछ पीली थीं। उस प्रेतको देखकर बूढ़े तपस्वीने धैर्यपूर्वक पूछा—'तू कौन है?' तपस्वीका यह प्रेमपूर्वक वचन सुनकर पिशाचने हाथ जोड़कर कहा—'भगवन्! गोदावरी नदीके तटपर प्रतिष्ठान नामक एक देश है। वहाँ मैं तीर्थोंमें दान लेनेकी रुचि रखनेवाला एक ब्राह्मण था। उसी कर्मके फलस्वरूप मैं ऐसी दुर्गतिको प्राप्त हुआ हूँ। जल और वृक्षसे रहित महाभयंकर मरुस्थलमें निवास करते हुए मुझे बहुत समय
८४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बीत गया है। वहाँ मैं भूख-प्याससे पीड़ित होकर सर्दी और गरमीका कष्ट भोगता रहा हूँ। मरुभूमिमें दीर्घकाल व्यतीत होनेके पश्चात् एक दिन मैंने किसी ब्राह्मणके पुत्रको देखा। उसने धोतीकी लाँग नहीं बाँध रखी थी। वह अपवित्र और सन्ध्याकर्मसे हीन था। उसे देखकर उसीके द्वारा कुछ भोग मिलनेकी आशासे मैं उसके शरीरमें समा गया। मुने! वह ब्राह्मण धनके लोभसे किसी वणिक्के साथ इस पुण्यमयी पुरीमें आ गया। मुनिश्रेष्ठ! इस पुरीके भीतर उसके प्रवेश करते ही मैं और उसके पाप क्षणभरमें एक ही साथ शरीरसे बाहर निकल गये। दयालो! इस समय सहसा शिव नामकी ध्वनि कानमें पड़नेसे मेरा पाप कुछ क्षीण हो गया है, इसलिये मैं काशीके अन्तर्गृहकी सीमामें प्रवेश कर पाया हूँ। अब आपका दर्शन हो जानेसे मैं अपनेको बड़ा भाग्यवान् समझता हूँ। आप कृपा करके मुझे इस भयंकर योनिसे निकालिये। मेरा उद्धार कीजिये।'
प्रेतका यह वचन सुनकर उन दयालु तपस्वीने इस प्रकार विचार किया—'अपना पेट तो पशु, पक्षी, मृग आदि सभी जीव भर लेते हैं। संसारमें वही धन्य है, जो सदा दूसरोंका उपकार करनेके लिये उद्यत रहता है। अतः आज मैं अपनी तपस्यासे मेरी शरणमें आये हुए इस पापातुर प्रेतका अवश्य उद्धार करूँगा।' इस प्रकार मन-ही-मन निश्चय करके उन साधुशिरोमणि तपस्वीने पिशाचसे कहा—'अरे ओ पिशाच! तू इस विमलोद नामक सरोवरमें स्नान कर ले। इस तीर्थके प्रभावसे तथा भगवान् कपर्दीश्वरके दर्शनसे तेरी पिशाचता आज क्षणभरमें नष्ट हो जायगी।'
यह सुनकर प्रेतने नमस्कारपूर्वक कहा—मुनिश्रेष्ठ! पानी तो मैं पीनेके लिये भी नहीं पाता, स्नान करनेकी तो बात ही क्या है? मेरे लिये तो यहाँके जलका स्पर्श भी दुर्लभ है।
तपस्वीने कहा—तू यह विभूति ले और अपने ललाटमें धारण कर, फिर तुझे कहीं कोई भी बाधा नहीं है। पापीका भी विभूतिसे उज्ज्वल ललाट देखकर यमराजके दूत पाशुपतास्त्रसे भयभीत होकर भाग जाते हैं।
ऐसा कहकर मुनिने भस्म ले प्रेतके हाथमें दे दिया और उसने भी आदरपूर्वक लेकर उसे ललाटमें लगा लिया। पिशाचको विभूति धारण किये देख जलके देवताओंने उसे जलमें स्नान करनेसे नहीं रोका। स्नान और जलपान करके वह ज्यों ही जलाशयसे बाहर निकला त्यों ही उसकी पिशाचता दूर हो गयी और उसने दिव्य शरीर धारण कर लिया। उसी समय दिव्य विमानपर बैठकर वह आकाशमार्गको प्राप्त हुआ। जाते समय उसने तपस्वीको नमस्कार करके उच्चस्वरसे कहा—'भगवन्! आपने मुझे इस अत्यन्त निन्दित पिशाच-योनिसे मुक्त किया है, इसलिये आजसे इस तीर्थका नाम पिशाचमोचन तीर्थ होगा। यहाँ स्नान करनेसे यह तीर्थ दूसरोंके भी पिशाचभावको हर लेगा। जो मनुष्य इस परम पुण्यमय तीर्थमें स्नान और सन्ध्या-तर्पण करके यहाँ पिण्डदान करेंगे, उनके पिता-पितामह यदि दैववश पिशाच-योनिको प्राप्त हुए हों तो उस योनिका परित्याग करके परम गतिको प्राप्त होंगे। आज मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथि है, आजके दिन यहाँ स्नान आदि करना चाहिये। आजका स्नान पिशाच-योनिसे सर्वथा मुक्त करनेवाला है। जो लोग इस तिथिपर यहाँकी वार्षिक यात्रा करेंगे, वे तीर्थमें दान लेनेके पापसे मुक्त हो जायँगे।'
यों कहकर उस दिव्य पुरुषने बार-बार तपोधनको नमस्कार किया और दिव्य गति प्राप्त कर ली। तपस्वी वाल्मीकि भी उस महान् आश्चर्यको देखकर कपर्दीश्वरकी आराधनामें लगे रहे और समयानुसार मोक्ष प्राप्त कर लिया। महामुने! तबसे लेकर यह सब पापोंका अपहरण करनेवाला पिशाचमोचन तीर्थ काशीमें अत्यन्त प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ।
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४५
गणेशजीका काशीमें जाना और लोकप्रिय होना, गणेशजीका स्तवन
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा लेकर उनके काशीमें आनेके उपायका विचार करते हुए गणेशजी मन्दराचल पर्वतसे चले और ब्राह्मणका स्वरूप धारण करके काशीपुरीमें जा पहुँचे। वे बूढ़े ज्योतिषी बनकर प्रत्येक घरके भीतर जाते और नगरनिवासियोंको प्रसन्न करते थे। रनिवासमें प्रवेश करके अपनी दिव्य दृष्टिसे देखी हुई वस्तुको बता-बताकर स्त्रियोंके विश्वासपात्र हो गये। एक दिन अवसर पाकर महाराज दिवोदासकी रानी लीलावतीने महाराजसे उनके सम्बन्धमें निवेदन किया—'राजन्! एक बड़े विद्वान् एवं सुवक्ता वृद्ध ब्राह्मण आये हैं, जो अपने गुणोंके कारण बहुत बढ़े-चढ़े हैं। वे वेदोंकी मूर्तिमान् निधि हैं, आपको भी उनका दर्शन करना चाहिये।' राजाने प्रातःकाल उन वृद्ध ब्राह्मणको बुलवाया और भक्तिपूर्वक उत्तम वस्त्र आदि देकर उनका यथावत् सत्कार किया। तदनन्तर एकान्तमें राजाने अपने हृदयमें स्थित प्रश्नको उनसे इस प्रकार पूछा—'ब्रह्मन्! निश्चय ही आप एक श्रेष्ठ द्विज प्रतीत होते हैं। आपकी बुद्धि जिस प्रकार तत्त्वज्ञानसे सम्पन्न है, वैसी दूसरेकी नहीं है, ऐसी मेरी समझ है। इस समय मेरा मन सब कर्मोंसे विरक्त-सा हो रहा है; अतः आप भलीभाँति विचार करके मेरे शुभ भविष्यका वर्णन करें।'
ब्राह्मणने कहा—राजन्! आजके अठारहवें दिन कोई उत्तर दिशाका ब्राह्मण आकर निश्चय ही तुम्हें उपदेश करेगा। तुम्हें बिना विचारे उसके वचनको मानना और उसका पालन करना चाहिये। महामते! ऐसा करनेसे तुम्हारा सब मनोरथ सिद्ध होगा।
ऐसा कहकर राजाकी अनुमति ले वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने आश्रमको चले गये। इस प्रकार विघ्नविजयी गणेशजीने समस्त काशीपुरीको अपने वशमें कर लिया और ऐसा करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य-सा माना। जब दिवोदास काशीके राजा नहीं थे, उस समय गणेशजीके जो-जो स्थान थे, उन-उन स्थानोंको गणेशजीने अनेक रूप धारण करके पुनः सुशोभित किया।
(गणेशजीकी पूजाके पश्चात् इस प्रकार उनकी स्तुति करे—) भक्तोंके विघ्नका निवारण करनेवाले! आपकी जय हो। विघ्नरहित! विघ्नशमन! आपकी जय हो। सम्पूर्ण गणोंके अधीश्वर! आपकी जय हो। समस्त गणोंके अग्रगण्य! आपकी जय हो। गणोंसे अभिवन्दित चरणारविन्दवाले देव! आपकी जय हो। असंख्य सद्गुणोंसे विभूषित गणेश! आपकी जय हो। सर्वव्यापी सर्वेश्वर तथा समस्त बुद्धियोंके एकमात्र निधान! आपकी जय हो। सम्पूर्ण मायाप्रपंचके ज्ञाता तथा सब कर्मोंमें सबसे प्रथम पूजित देव! आपकी जय हो। सब मंगलोंके लिये भी मंगलस्वरूप तथा सर्व-मंगलकारी गणाधीश! आपकी जय हो। अमंगलकी शान्ति करनेवाले तथा मंगलके हेतुभूत देव! आपकी जय हो। सृष्टिकर्ताओंके वन्दनीय! आपकी जय हो। सिद्धिदायक! आपकी जय हो। सम्पूर्ण सिद्धियोंके एकमात्र निवास-स्थान! आपकी जय हो। महाऋद्धि-सिद्धिके सूचक! आपकी जय हो। समस्त गुणोंका निर्माण करनेवाले, गुणोंसे परे तथा गुणोंद्वारा अग्रगण्य गणेश! आपकी जय हो। गुणवर्णित! सर्वबलाधीश्वर तथा इन्द्रको बल प्रदान करनेवाले गणाध्यक्ष! आपकी जय हो। अनन्त महिमाके आधार तथा पर्वतोंको विदीर्ण करनेवाले गणेश! आपकी जय हो। करुणामय! दिव्यमूर्ते! जो आपको नमस्कार करते हैं, वे भूमण्डलमें सम्पूर्ण पापोंके भाजन होकर भी अन्तमें मोक्षके भागी होते हैं। आप सदैव उनके बड़े-बड़े विघ्नों और उपद्रवोंका निवारण करते हैं तथा उन्हें उनकी रुचिके अनुसार स्वर्ग एवं मोक्ष भी देते हैं। विघ्नराज! जो लोग इस पृथ्वीपर क्षणभर भी आपके कृपाकटाक्षके द्वारा देखे जाते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उन श्रेष्ठ पुरुषोंपर भगवती लक्ष्मी अपनी
८४६ । * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कृपादृष्टि करती हैं। प्रणतजनोंके विघ्नका विनाश करनेमें चतुर तथा पार्वतीजीके हृदयकमलको विकसित करनेमें सूर्यस्वरूप गणेश! जो लोग आपकी स्तुति करते हैं, वे इस संसारमें प्रसिद्ध होते हैं। यह कोई अद्भुत बात नहीं है। जो सदा आपके युगल चरणोंकी सेवा करते हैं, वे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और समृद्धिके भागी होते हैं। बहुत-से भृत्य (दास-दासी आदि) उनके चरण-कमलोंकी सेवामें रहते हैं तथा वे राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य निर्मल लक्ष्मीकी प्राप्ति करते हैं। हे परमकारण! आप कारणोंके भी कारण हैं, वेदके विद्वानोंद्वारा सदा एकमात्र आप ही जाननेयोग्य हैं। आप ही वेदवाणीमें अनुसन्धान करनेयोग्य अनिर्वचनीय तत्त्व हैं, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके दिव्य स्वरूपका एक अंश है तथा आप वाणीके अविषय हैं। ढुण्ढिराज विनायक! आप समस्त पुरुषार्थोंको ढूँढ़ चुके हैं, इसलिये आपका नाम 'ढुण्ढि' है। आपको सन्तुष्ट किये बिना कौन देहधारी प्राणी इस काशीमें प्रवेश पा सकता है?
भगवान् विष्णुका काशी-गमन, केशव एवं पादोदकतीर्थकी महिमा, धर्मक्षेत्रमें पुण्य-कीर्तिका उपदेश तथा राजा दिवोदासकी निर्वाणप्राप्ति
**स्कन्दजी कहते हैं—**मुने! जब गणेशजी भी काशीमें आकर विलम्ब करने लगे तब भगवान् शिवने श्रीविष्णुजीकी ओर देखा और बड़े आदरके साथ कहा—'माधव! आप भी वैसा ही न कीजियेगा, जैसा कि पहलेके गये हुए लोगोंने किया है।'
**भगवान् विष्णु बोले—**गिरीश! इस लोकमें मनुष्य जो कुछ भी थोड़ा या अधिक कर्म करता है वह आपके चरणारविन्दोंके चिन्तनसे ही सिद्ध होता है। आपकी भक्तिरूपी सम्पदासे सम्पन्न हुए हमलोगोंका उद्योग प्रायः सफल ही होता है। शिव! अपनी बुद्धि, बल और पुरुषार्थसे जो कार्य अत्यन्त असाध्य होता है वह भी आपके निरन्तर स्मरणसे भलीभाँति सिद्ध हो जाता है। अतः आप अपनेद्वारा निश्चित किये हुए इस कार्यको सिद्ध हुआ ही जानें।
यों कहकर भगवान् विष्णुने शिवजीकी परिक्रमा की और बार-बार उन्हें प्रणाम करके लक्ष्मीजीके साथ मन्दराचलसे प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने गंगा तथा वरणा नदीके संगममें हाथ-पाँव धोकर स्नान किया। पीताम्बरधारी श्रीहरिने पहले कल्याण प्रदान करनेवाले अपने दोनों चरण वहाँ धोये थे, इसलिये तभीसे उस तीर्थका नाम 'पादोदक' तीर्थ हो गया। जो मानव उस पादोदकतीर्थमें स्नान करते हैं, उनके सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ तिल और जलसे तर्पण करके पितरोंका श्राद्ध करेगा वह अपने वंशकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देगा। जिसने पादोदकतीर्थमें स्नान किया है, पादोदकतीर्थके जलको पी लिया है तथा पादोदकतीर्थके जलसे पितरोंका तर्पण किया है, ऐसे मनुष्यको कभी नरक छू भी नहीं सकता। जो पादोदकतीर्थके जलको शंखमें रखकर उसके द्वारा नहलाये हुए गोमतीचक्रसहित श्रीशालग्रामके चरणामृतको पान करता है, वह अमृतपदको प्राप्त होता है।
वहाँ लक्ष्मी और गरुड़के साथ नित्यकर्म करके केशवने अपने हाथसे अपनी ही प्रस्तरमय मूर्ति बनायी और समस्त सिद्धियों तथा समृद्धियोंको देनेवाली उस मूर्तिको स्वयं ही पूजन किया। जो मनुष्य केशव नामसे प्रसिद्ध उस परमेश्वरमूर्तिका भलीभाँति पूजन करता है वह वैकुण्ठधामको अपने घरके आँगनमें ही उतरा हुआ समझे। काशीकी सीमामें वह स्थान श्वेतद्वीप कहलाता है। उस केशवमूर्तिकी सेवा करनेवाले मनुष्य श्वेतद्वीपमें ही निवास करते हैं। केशवके आगे क्षीरसागर नामसे प्रसिद्ध दूसरा तीर्थ है, उसमें स्नान और तर्पण आदि कार्य करनेवाला मनुष्य
| * काशीखण्ड-उत्तरार्ध * | ८४७ |
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क्षीरसमुद्रके तटपर निवास करता है। वहीं त्रिभुवनवन्दित महालक्ष्मीकी मूर्ति है, उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेवाला मनुष्य कभी रोगी नहीं होता। भगवान् केशव उस मूर्तिमें अपने ही व्यापक स्वरूपको समाविष्ट करके पुनः भगवान् शंकरका कार्य सिद्ध करनेके लिये अंशांशसे बाहर निकले और काशीसे कुछ उत्तर जाकर उन चक्रधारी विष्णुने अपने रहनेके लिये एक स्थान निश्चित किया, जो ‘धर्मक्षेत्र’ (धर्मचक्र स्थान—सारनाथ)—के नामसे प्रसिद्ध है।
तदनन्तर भगवान् लक्ष्मीपतिने परम सुन्दर त्रिभुवन-मोहन रूप धारण किया और गरुड़जी भी अलौकिक रूप धारण करके उनके शिष्य हो गये। वे बड़ी अद्भुत मेधाशक्तिसे सम्पन्न, सब वस्तुओंकी ओरसे निःस्पृह तथा गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने अपने हाथके अग्रभागमें एक पुस्तक रख ली थी। भगवान्ने अपना नाम पुण्यकीर्ति और गरुड़का नाम विनयकीर्ति रखा। पुण्यकीर्तिने विनयकीर्तिको इस प्रकार उपदेश दिया।
पुण्यकीर्ति बोले—महामते विनयकीर्ते! तुमने जो सनातन धर्मके विषयमें प्रश्न किया है वह सब पूर्णरूपसे बतलाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। इहलोक और परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके शास्त्रोंका विचार करके महर्षियोंने चार प्रकारके दानोंका उपदेश दिया है। भयभीत पुरुषोंको अभयदान, रोगियोंको औषधदान, विद्यार्थियोंको विद्यादान तथा भूखसे व्याकुल मनुष्योंको अन्नदान देना चाहिये। वासनासहित क्लेशका उच्छेद हो जानेपर विज्ञानकी उपरति (अविद्याकी निवृत्ति) ही मोक्ष है, यह तत्त्वका विचार करनेवाले पुरुषोंको जानना चाहिये। वेदवादियोंके द्वारा यह प्रामाणिक श्रुति पढ़ी जाती है कि ‘मा हिंस्यात्सर्वभूतानि'—किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये।
इस प्रकार पुण्यकीर्तिके धर्मोपदेश करनेपर क्रमशः पुरवासी एक-दूसरेसे सुनकर वहाँ भगवान्के निकट आने लगे। उपदेशका क्रम चालू था—‘जबतक यह शरीर स्वस्थ है, जबतक इन्द्रियोंमें शिथिलता नहीं आती और जबतक बुढ़ापा दूर है, तबतक ही परम आनन्द (मोक्ष)-के लिये साधन कर लेना चाहिये। अस्वस्थता, इन्द्रियोंकी विकलता और वृद्धावस्थामें कैसे सुख हो सकता है। अतः परम सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको याचकोंके लिये अपना शरीर भी दे डालना चाहिये*। शरीर शीघ्र जानेवाला है, सभी संग्रह नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसा समझकर विज्ञ पुरुष इस शरीरके रहते हुए नित्यसुखके लिये साधन करे। अन्तमें यह शरीर कुत्तों और कौओंका भोजन बन जाता है। वेदमें यह सत्य ही कहा गया है कि शरीर अन्तमें भस्म हो जानेवाला है।'
मुने! इधर, विघ्नराज गणेशने दूर रहकर भी शत्रुविजयी राजा दिवोदासके चित्तको राज्यकी ओरसे विरक्त कर दिया। वे अठारह दिनोंकी
* यावत्स्वस्थमिदं वर्म यावन्नेन्द्रियविकलवः। यावज्जरा च दूरेऽस्ति तावत्सौख्यं प्रसाधयेत् ॥
अस्वास्थ्येन्द्रियवैकल्ये वार्धके तु कुतः सुखम्। शरीरमपि दातव्यमर्थिभ्योऽतः सुखेप्सुभिः ॥
(स्क० पु०, का० उ० ५८। १५-१६)
८४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अवधिको गिनने लगे और मन-ही-मन सोचने लगे कि 'ब्राह्मण देवता कब आयेंगे जो मुझे उपदेश करेंगे।' इस प्रकार अठारहवाँ दिन प्राप्त होनेपर दोपहरके समय वे पुण्यकीर्ति नामवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण ही धर्मक्षेत्रसे राजाके द्वारपर आये। उन्हें दूरसे आते देख उत्कण्ठित हुए नरेशने अपने मनमें मान लिया कि ये मुझे उपदेश देने योग्य गुरु हैं। फिर वे उनके समीप गये और उन्हें बार-बार प्रणाम करके आशीर्वाद ले उन्हें अपने अन्तःपुरमें लिवा ले गये। वहाँ राजाने शास्त्रोक्त विधानसे भलीभाँति उनका पूजन किया और जब वे मार्गकी थकावटसे रहित, स्वस्थ एवं प्रसन्नमुख हो गये तब उन्हें भोजनके लिये नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं। उन्हें ग्रहण करके जब पुण्यकीर्ति पूर्णतः तृप्त हो गये और सुखपूर्वक आसनपर जा बैठे, तब राजाने कहा—'विप्रवर! मैं राज्यका भार ढोते-ढोते बहुत खिन्न हो गया हूँ, अब उसकी ओरसे वैराग्य-सा हो रहा है। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कैसे मुझे शान्ति प्राप्त होगी। यह सब सोचते-विचारते मेरा एक मास व्यतीत हो गया। मैंने अपने सगे पुत्रोंकी भाँति प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन किया है और प्रतिदिन नाना प्रकारके धन देकर ब्राह्मणोंको तृप्त किया है। राज्यशासन करते समय मेरे द्वारा एक ही अपराध हुआ है, वह यह कि मैंने अपने तपोबलके अभिमानसे सम्पूर्ण देवताओंको तिनकेके समान समझा है। यद्यपि प्रजाके उपकारके लिये ही ऐसा किया है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं। यह मैं आपसे शपथ खाकर कहता हूँ, मेरे शासनकालमें कोई भी पापवृत्तिका सेवन नहीं करता, सभी लोग धर्मपरायण और सुखी हैं। सबमें उत्तम विद्याका व्यसन है और सब लोग सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, तथापि मुझे संसारके सभी भोग ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे एक बारके चबाये हुए अन्नको फिरसे चबाना। यह राज्य भी क्या है? पीसे हुएको पीसना। इसे लेकर क्या करना है। विप्रवर! आप ज्ञानी पुरुष हैं, मुझे कोई ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे पुनः गर्भवासका कष्ट न भोगना पड़े। आप जो कुछ कहेंगे, निःसन्देह मैं वही करूँगा। इस समय आपके दर्शनसे मेरी सब इन्द्रियाँ विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गयी हैं और उपरतिका यह उत्तम सुख मुझे प्राप्त हुआ है। इस समय मुझे कोई ऐसा उपाय बताइये जो कर्मबन्धनका नाश करनेमें समर्थ हो।'
**स्कन्दजी कहते हैं—**राजाका ऐसा कथन सुनकर ब्राह्मणवेषधारी श्रीविष्णु बोले—'महाप्राज्ञ! राजशिरोमणे! मुझे जो कुछ उपदेश करना है वह सब तो तुम्हींने कह दिया। तुम तो पहलेसे ही कृतार्थ हो, मुझसे उपदेश लेकर मुझे सम्मान दे रहे हो। तुमने अपनी उत्तम तपस्याके निर्मल जलसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी मलिनताको धो डाला है। भूपाल! तुमने जो कुछ कहा है वह सब सत्य है। तुम्हारे समान राजा इस पृथ्वीपर न हुआ है और न होगा। तुममें जो मुमुक्षा (मुक्तिकी इच्छा) जाग्रत् हुई है वह उचित ही है। तुम्हारे इस राज्यमें अधर्मका प्रवेश भी नहीं हुआ है। धर्मज्ञ! तुम्हारे द्वारा धर्ममें लगायी गयी प्रजाने जो धर्मका अनुष्ठान किया है उससे सम्पूर्ण देवता तृप्त हुए हैं। मेरे हृदयमें तुम्हारा एक ही दोष प्रतीत होता है कि तुमने भगवान् विश्वनाथको काशीसे दूर कर दिया है। मेरी समझमें तुम्हारा सबसे महान् अपराध यही है। इस पापकी शान्तिके लिये मैं तुम्हें बहुत उत्तम उपाय बतलाता हूँ। जिसने भगवान् शिवमें भक्ति रखकर यहाँ काशीमें एक शिवलिंगकी भी स्थापना की है, उसने अपनेसहित सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठाका पुण्य प्राप्त किया है। इसलिये तुम सर्वथा प्रयत्नपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना करो, इससे कृतार्थ हो जाओगे। दिवोदास! तुम्हारे समीप होनेसे हमलोग भी धन्य-धन्य हो गये हैं। इस मर्त्यलोकमें जो तुम्हारा नाम लेते हैं वे भी परम धन्य हैं। राजन्! तुम्हारा मनोरथरूप महान् वृक्ष आज फलित हुआ है, तुम इसी शरीरसे परम पदको प्राप्त होओगे। भगवान् शिवके लिंगमय विग्रहकी स्थापना कर लेनेपर आजसे सातवें दिन
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४९
एक दिव्य विमान तुम्हें शिवधाममें ले जानेके लिये आयेगा। यह काशीपुरीके भलीभाँति सेवनका फल है।'
यह सब सुनकर प्रतापी राजा दिवोदास बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्राह्मणके चरणोंमें बारंबार प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा—'भगवन्! आपने मुझे संसार-सागरसे पार उतार दिया।' तत्पश्चात् ब्राह्मणवेषधारी विष्णुने भी राजासे पूछकर काशीपुरीका भलीभाँति निरीक्षण करके परम पवित्र पंचनद कुण्ड (पंचगंगा)-को देखा और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके वहीं निवास किया। फिर भगवान् शंकरके शुभागमनकी शीघ्र प्रतीक्षा करते हुए माधवने राजा दिवोदासके वृत्तान्तको जाननेवाले गरुड़जीको वहाँ भेजा।
उधर राजा दिवोदासने भी अपने गुरु विप्रवर पुण्यकीर्तिकी महिमाका बखान करते हुए समस्त प्रजाओं, मन्त्रियों तथा मण्डलेश्वरोंको बुलाया। खजाना, घोड़े और हाथी आदिकी देख-रेखके लिये नियुक्त सब अध्यक्षोंको, अपने पाँच सौ पुत्रोंको, ज्येष्ठ पुत्र समरंजयको, पुरोहित, प्रतीहार, ऋत्विज्, ज्योतिषी, ब्राह्मण, सामन्त, राजकुमार, रसोइये, चिकित्सक तथा नाना कार्योंके लिये आये हुए विदेशी मनुष्योंको भी एकत्र किया। इन सबको हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त राजाने ब्राह्मणकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं और यह भी बताया कि 'सात दिनतक और मुझे इस लोकमें रहना है।' सब लोग विषादवश मुर्झाये हुए मुखसे यह आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुन रहे थे। राजाने स्वयं ही कुमार समरंजयको राजमहलमें ले जाकर उन्हें राजाके पदपर अभिषिक्त किया। फिर नगर और राज्यके लोगोंको भी दान आदिसे प्रसन्न करके पुण्यात्मा राजाने गंगाके पश्चिम तटपर एक विशाल मन्दिर बनवाया। संग्राममें शत्रुओंको जीतकर उन्होंने जितनी सम्पत्ति संग्रह की थी वह सब लगाकर राजाने शिवमन्दिरका निर्माण कराया। राजाकी सम्पूर्ण सम्पत्ति वहाँ लगा दी गयी थी, इसलिये वह शुभ भूमि 'भूपालश्री' नामसे विख्यात हुई। राजा रिपुंजयने दिवोदासेश्वर लिंगकी स्थापना करके अपने-आपको कृतार्थ माना। तदनन्तर एक दिन विधिपूर्वक उस शिवलिंगकी पूजा और वन्दना करके ज्यों ही स्तुति करना प्रारम्भ किया त्यों ही आकाशसे एक दिव्य विमान उतरा जो हाथमें शूल और खट्वांग धारण करनेवाले शिव-पार्षदोंसे घिरा हुआ था। तत्पश्चात् उन पार्षदोंने राजाको दिव्य माला, दिव्य गन्ध, दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत किया और उन्हें शिवधाममें पहुँचा दिया। तबसे वह तीर्थ 'भूपालश्री' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ श्राद्ध आदि करके अपनी शक्तिके अनुसार दान देकर जो दिवोदासेश्वरका दर्शन और भक्तिपूर्वक पूजन करता है तथा राजाकी इस कथाको भी सुनता है वह फिर गर्भमें नहीं आता। जहाँ सब पातकोंका नाश करनेवाली दिवोदासकी कथा होती है वहाँ अनावृष्टि और अकालमृत्युका भय नहीं होता। इस माहात्म्य कथाके पाठसे सबके मनोरथ पूर्ण होंगे।
८५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
धर्मनदतीर्थके पंचनद नाम पड़नेका कारण, अग्निबिन्दुके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति, भगवान्के मुखसे पंचनद एवं विन्दुमाधवतीर्थकी महिमाका निरूपण
**अगस्त्यजी बोले—**पार्वतीनन्दन! आपने यह कहा है कि काशी परम पावन है, उसमें भी भगवान् विष्णुने पंचनद (पंचगंगा) तीर्थको बहुत उत्तम जाना। अतः हम जानना चाहते हैं कि उसका नाम पंचनदतीर्थ क्यों हुआ और वह सब तीर्थोंसे बढ़कर परम पावन क्योंकर हुआ? जो निराकार होकर भी साकार हैं, रूपहीन होते हुए भी रूपवान् हैं, अव्यक्त होकर भी व्यक्त हैं, प्रपंचसे परे होकर भी प्रपंचसेवी हैं, अजन्मा होकर भी जिन्होंने अनेक जन्म धारण किये हैं, नामरहित होकर भी स्पष्ट नाम धारण करनेवाले हैं, आलम्बशून्य होकर भी सबके परम आलम्ब हैं, निर्गुण होकर भी सगुणरूपसे प्रकट हैं और इन्द्रियरहित होकर भी इन्द्रियोंके स्वामी हैं तथा बिना पैरके भी सर्वत्र गमन करनेवाले हैं, उन सर्वव्यापी भगवान् जनार्दनके सर्वात्मभावसे परम उत्तम पंचनदतीर्थमें निवास करनेका क्या कारण है?
**स्कन्दजीने कहा—**एक समय काशीमें सूर्यदेवने बड़ी भारी तपस्या की। उस तीर्थमें तपस्या करते हुए मयूखादित्य नामक सूर्यकी किरणोंसे बहुत पसीना प्रकट हुआ। वह महास्वेदकी धारा किरणा नामसे प्रसिद्ध पुण्यमयी नदी बन गयी। फिर वह धूतपापा नदीसे मिली। धूतपापासे मिली हुई किरणा स्नानमात्रसे महापापरूपी घोर अन्धकारका नाश कर देती है। तदनन्तर दिलीपनन्दन भगीरथके साथ भागीरथी गंगा यमुना और सरस्वतीके साथ वहाँ आयीं। इस प्रकार उस तीर्थमें किरणा, धूतपापा, पुण्यसलिला सरस्वती, गंगा और यमुना—ये पाँच नदियाँ मिली हुई बतायी गयी हैं। इसीलिये वह त्रिभुवनविख्यात तीर्थ पंचनद (पंचगंगा)-के नामसे प्रसिद्ध है। उसमें डुबकी लगानेवाला मनुष्य पांचभौतिक शरीर नहीं ग्रहण करता। पाँच नदियोंका यह संगम समस्त पापराशिको विदीर्ण करनेवाला है। इसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्माण्डमण्डलका भेदन करके ऊर्ध्वलोकको चला जाता है। काशीमें पग-पगपर अनेक बड़े-बड़े तीर्थ हैं, किंतु वे पंचनदतीर्थके करोड़वें अंशके समान भी नहीं हैं। पूरे माघभर प्रयाग तीर्थमें भलीभाँति स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह काशीके पंचनदतीर्थमें एक ही दिनके स्नानसे निश्चय ही प्राप्त हो जाता है। पंचनदतीर्थमें स्नान और पितरोंका तर्पण करके भगवान् विन्दुमाधवकी पूजा करनेसे मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जिन्होंने पंचनद नामक शुभ तीर्थमें श्राद्ध किया है, उनके पितर अनेक योनियोंमें गये हों तो भी मुक्त हो जाते हैं। वस्त्रसे छाने हुए पंचगंगाके पुण्यजलसे जो अपने इष्टदेवको स्नान कराता है वह महान् फलका भागी होता है। संतोंको महान् सुख देनेवाले पंचनद तीर्थके जलसे अभिषेक जितना प्रिय है उतना स्वर्गके राज्यपर यदि उनका अभिषेक किया जाय तो वह भी प्रिय नहीं है। सत्ययुगमें इस तीर्थका नाम धर्मनद, त्रेतामें धूतपाप, द्वापरमें विन्दुतीर्थ और कलियुगमें पंचनद कहा गया है। पुण्यमय धर्मनदतीर्थमें विधिपूर्वक अग्निको प्रज्वलित करके यदि उसमें एक भी आहुति दी जाय तो कोटि बार होमका फल मिलता है।
पंचनदतीर्थमें स्थित हुए भगवान् लक्ष्मीपतिने गरुड़को शिवजीके आगे सब वृत्तान्त निवेदन करनेके लिये भेजकर वहाँ एक दुर्बल शरीरवाले तपस्वीको देखा। उस तपस्वी मुनिने निकट आकर भगवान्का दर्शन किया। भगवान् लक्ष्मीपति गलेमें धारण की हुई वनमालासे सुशोभित थे। उनके पास ही भगवती लक्ष्मी विराजित थीं। चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, पद्म, गदा और चक्र चमक रहे थे। वक्षःस्थल कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हो रहा था। उन्होंने
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८५१
| अपने श्रीअंगमें दिव्य रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था। उनकी अंगकान्ति सुन्दर नील कमलके समान श्याम थी। आकृति अत्यन्त स्निग्ध एवं मधुर प्रतीत होती थी। नाभिकुण्डमें कमल शोभा पा रहा था। ओठ बड़े ही सुन्दर और लाल थे, दाँत अनारके दानोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ थे। उनके किरीटकी द्युतिसे आकाश प्रकाशित हो रहा था, देवराज इन्द्र जिनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, सनक आदि महात्मा जिनकी स्तुति करते हैं, नारद आदि देवर्षियोंने जिनके महान् अभ्युदयका गीत गाया है तथा प्रह्लाद आदि भगवद्भक्त जिनके मनको सदा आनन्दित करते रहते हैं, जिन्होंने शार्ङ्ग नामक धनुषका दण्ड हाथमें ले रखा है, जो इन्द्रियोंके अविषय, निराकार और कैवल्यस्वरूप परब्रह्म हैं, वे ही प्रभु भक्तोंकी भक्तिके कारण यहाँ पुरुषरूपमें प्रकट हुए थे। जिनके उपनिषद्वर्णित स्वरूपको वेद भी नहीं जानते, ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं समझ पाते, उन्हीं भगवान् विष्णुका उन तपस्वी मुनिने अपने नेत्रोंसे प्रत्यक्ष दर्शन किया और आनन्दमें भरकर पृथ्वीपर मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया। उन महर्षिका नाम अग्निविन्दु था। महातपस्वी अग्निविन्दुने मस्तकके समीप अंजलि बाँधकर भगवान् विष्णुका भलीभाँति स्तवन किया।<br><br>अग्निविन्दु बोले-ॐ कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् नारायण! आप बाहर और भीतरको पवित्र करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं। आप अन्तर्यामी पुरुष हैं, आपके दोनों चरण सब प्रकारके द्वन्द्वोंका निवारण करनेवाले हैं। इन्द्रादि देवताओंसे वन्दित विष्णो! आपके उन चरणोंको मैं द्वन्द्व-रहित शान्त बुद्धिसे प्रणाम करता हूँ। बृहस्पतिकी वाणी भी जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पाती, उन भगवान्की स्तुति करनेके लिये इस | लोकमें कौन समर्थ हो सकता है। परंतु यहाँ भक्ति ही प्रबल है (भगवान् केवल भक्तिसे ही प्रसन्न हो जाते हैं)। जो भगवान् विष्णु पुरातन ब्रह्मा आदिके भी मन-वाणीके अगोचर हैं, उनकी स्तुति मेरे-जैसे अल्पबुद्धि पुरुष कैसे कर सकते हैं। जहाँ वाणीका प्रवेश नहीं है, मन जिनका मनन नहीं कर सकता, जो मन और वाणीसे सर्वथा परे हैं, उन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ होगा। छः अंग, पद और क्रमसहित वेद जिनके निःश्वाससे प्रकट हुए हैं, उन भगवान् विष्णुकी महान् महिमाका यथावत् ज्ञान किनको हो सकता है? जिनकी मन-बुद्धि सदा जाग्रत् रहती हैं, वे सनकादि महर्षि अपने हृदयाकाशमें जिनका निरन्तर ध्यान करते रहनेपर भी उन्हें यथार्थरूपसे उपलब्ध नहीं कर पाते, आबालब्रह्मचारी नारद आदि मुनीश्वर जिनके चरित्रको सदा गाते रहते हैं, तो भी सम्यक्रूपसे जिनके तत्त्वका ज्ञान नहीं हो पाता, जो चराचरस्वरूप होकर भी चराचर जगत्से सर्वथा भिन्न हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जो अजन्मा, अविकारी, एक, आदिकारण, ब्रह्मा आदिके अगोचर, अजेय, अनन्तशक्ति, निरामय, नित्य, निराकार एवं अचिन्त्यस्वरूप हैं, उन आप परमेश्वरको पूर्णरूपसे कौन जान सकता है? भगवन्, मुरारे, मुकुन्द, मधुसूदन, माधव इत्यादि रूपसे आपके एक-एक नामका भी यदि जप किया जाय तो वह पापियोंके जन्मभरके उपार्जित पापपुंजको उनकी महाविपत्तियोंके साथ हर लेता है और बड़े-बड़े यज्ञोंका महत्त्वपूर्ण फल प्रदान करता है। नारायण, नरकार्णवतारण, दामोदर, मधुसूदन, चतुर्भुज, विश्वम्भर, विरज और जनार्दन इत्यादि नामोंका जप करनेवाले पुरुषोंका इस संसारमें कहाँ जन्म हो सकता है तथा उन्हें कालका भय भी कहाँ प्राप्त हो सकता है *। त्रिविक्रम ! आपकी कान्ति |
* एकैकमेव तव नाम हरेन्नुरारे जन्माजिताघमघिनां च महापदाद्यम्।
दद्यात्फलं च महितं महतो मखस्य जप्तं मुकुन्द मधुसूदन माधवेति॥
नारायणेति नरकार्णवतारणेति दामोदरेति मधुहेति चतुर्भुजेति।
विश्वम्भरेति विरजेति जनार्दनेति कास्तीह जन्म जपतां क्व कृतान्तभीतिः॥ (स्क० पु०, का० उ० ६०। ३४-३५)
८५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मेघमालाके समान सुन्दर एवं श्याम है। आपका श्रीअंग विद्युत्की भाँति प्रकाशमान पीताम्बरसे आवृत है और आपके नेत्र कमलदलके समान परम सुन्दर हैं। जो लोग आपकी इस छविका अपने हृदयमें सदा चिन्तन करते हैं, वे भी आपकी अचिन्त्य कान्तिको प्राप्त कर लेते हैं। श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित श्रीहरे! अच्युत! कैटभारे! गोविन्द! गरुड़वाहन! केशव! चक्रपाणे! लक्ष्मीपते! दैत्यसूदन! शाङ्गपाणे! आपके प्रति भक्ति रखनेवाले पुरुषोंको कहीं भी भय नहीं प्राप्त होता। कमलनयन! जिनकी जिह्वापर आपका मनोवांछित फल देनेवाला नाम शोभा पाता है, जिनके कानोंमें आपकी कथाके सुमधुर अक्षर पड़ते हैं तथा जिनके हृदयरूपी भित्तिपर आपका स्वरूप अंकित होता है, उनके लिये राजाका पद दुर्लभ नहीं है। प्रभो! ब्रह्माजी आपके युगल चरणारविन्दोंकी वन्दना करते हैं। आप लीलासे ही अनेक प्रकारके लीलामय स्वरूप धारण करते हैं। आप ही क्षणभरमें जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। आप ही विश्व हैं, आप ही विश्वसे परे विश्वनाथ हैं तथा आप ही इस विश्वके बीज (आदिकारण) हैं, मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप ही स्तुति करनेवाले हैं, आप ही स्तुति हैं और आप ही स्तवन करनेयोग्य देवता हैं। इस जगत्में जो कुछ है, वह सब एकमात्र आप ही हैं। विष्णो! आपसे भिन्न किसी भी वस्तुको मैं नहीं जानता, आप संसारबन्धनका नाश करनेवाले हैं, सांसारिक विषयोंके प्रति होनेवाली मेरी तृष्णाका सदाके लिये नाश कीजिये।
इस प्रकार भगवान् विष्णुकी स्तुति करके महातपस्वी अग्निविन्दु चुप हो गये। तब वर देनेवाले भगवान् विष्णुने मुनिसे इस प्रकार कहा— 'अग्निविन्दो! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'
अग्निविन्दु बोले—भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगता हूँ कि आप सर्वव्यापी होकर भी समस्त जन्तुओं, विशेषतः मुमुक्षु जीवोंके हितके लिये यहाँ पंचनदतीर्थमें निवास करें। साथ ही मुझे आपके चरणारविन्दोंमें भक्ति प्राप्त हो। इसके सिवा मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता हूँ।
इस प्रकार दूसरोंके उपकारके लिये माँगे हुए अग्निविन्दुके वरको सुनकर भगवान् मधुसूदन बड़े प्रसन्न हुए और बोले—मुनिश्रेष्ठ! तथास्तु, तुम जैसा चाहते हो वैसा ही होगा। मैं काशीपुरीके प्रति भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको मुक्तिमार्गका उपदेश करता हुआ इस तीर्थमें निश्चय ही निवास करूँगा। मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो। मुने! यह काशीपुरी जबतक यहाँ विद्यमान है, तबतक मैं यहाँ रहूँगा।
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर महामुनि अग्निविन्दु फिर बोले—माधव! इस कल्याणमय पंचनदतीर्थमें मेरे नामसे स्थित होकर आप भक्त और अभक्त सभी जीवोंको सदा मुक्ति प्रदान करें। जो इस पंचनदतीर्थमें स्नान करके यहाँसे जाकर देशान्तरमें भी मृत्युको प्राप्त हों उनको भी आप निश्चय ही मुक्ति दें।
भगवान् विष्णु बोले—मुने! तुमने जो वर
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * | ८५३ ---|---
माँगा है वह पूर्ण होगा। तुम्हारे नामके आधे भागके साथ और लक्ष्मीजीके नामके साथ मेरा नाम प्रसिद्ध होगा अर्थात् तीनों लोकोंमें विन्दुमाधवके नामसे मेरी ख्याति होगी। मेरा यह नाम काशीमें महान् पापोंका नाश करनेवाला होगा। जो पुण्यात्मा पुरुष इस पुण्यमय पंचनद कुण्डमें सदा मेरी पूजा करेंगे उन्हें संसारका भय कहाँ है। जिनके हृदयमें मुझ पंचनदतीर्थवासी विन्दुमाधवका निवास है, उनके पास सदा धनस्वरूपा लक्ष्मी और मोक्ष-लक्ष्मीका भी वास होता है। अग्निबिन्दो! सब पातकोंका नाश करनेवाला यह श्रेष्ठ तीर्थ तुम्हारे नामसे विन्दुतीर्थ कहलायेगा। जो कार्तिक मासमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सूर्योदयसे पहले ही विन्दुतीर्थमें स्नान करेगा उसे यमराजसे कहाँ भय है। मनुष्य मोहवश सहस्रों पाप करके भी यदि कार्तिकमें धर्मनदतीर्थमें स्नान कर लेता है तो क्षणभरमें पापहीन हो जाता है। यह शरीर अपवित्र मल-मूत्र आदिका भण्डार है। इसका एकभक्तव्रत, नक्तव्रत, अयाचितव्रत तथा उपवासव्रतके द्वारा भलीभाँति शोधन करना चाहिये। जो मनुष्य मेरे आगे उज्ज्वल बत्तीके साथ दीप जलाता है वह चराचर जीवोंसहित समस्त त्रिलोकीको अपने लिये प्रकाशमय देखता है। जो कार्तिकमें पंचामृतके कलशोंसे मुझको स्नान कराता है वह पुण्यात्मा एक कल्पतक क्षीरसागरके तटपर निवास करता है। जो मेरी भक्ति करते हुए भी भगवान् विश्वनाथसे द्वेष करते हैं उन्हें मेरा ही द्वेषी जानना चाहिये। वे पिशाचपदको प्राप्त होते हैं। कालभैरवके शासनसे पिशाचयोनिको प्राप्त होकर वे तीस हजार वर्षोंतक दुःखके सागरमें डूबे रहते हैं। तदनन्तर विश्वनाथजीकी कृपासे ही उन्हें मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो अधम मनुष्य मनसे भी भगवान् विश्वनाथसे द्वेष रखते हैं, वे काशीसे अन्यत्र मृत्युको प्राप्त होकर सदा अन्धतामिस्र नरकमें निवास करते हैं। मुने! यह काशीपुरी भगवान् पशुपति (शिव) अथवा शिवभक्तोंकी निवासस्थली है। अतः यहाँ परम कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा भगवान् शिवकी सेवा करनी चाहिये। महामुने! प्रथम तो यह आनन्दकानन ही परम पवित्र है, उसमें भी पंचनदतीर्थ अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा अधिक पवित्र है और वहाँ भी मेरा सान्निध्य होना उससे भी अधिक पुण्यमय है। इसी अनुमानसे तुम पंचनद-तीर्थकी महिमा सब तीर्थोंसे अधिक उत्तम जानो। पंचनदके इस माहात्म्यको सुनकर बुद्धिमान् मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है।
भगवान् विष्णुके मुखसे यह वचन सुनकर महामुनि अग्निबिन्दुने श्रीविन्दुमाधवके चरणोंमें प्रणाम करके पुनः पूछा—‘भगवन्! काशीमें आपके जितने स्वरूप हैं, उनका वर्णन कीजिये।’
## भगवान् विष्णुद्वारा अपने आदिकेशव प्रभृति स्वरूपोंका वर्णन तथा अग्निबिन्दुकी मुक्ति
श्रीविन्दुमाधवजी बोले—अग्निबिन्दो! पहले तो पादोदकतीर्थमें मैं आदिकेशवके नामसे निवास करता हूँ, ऐसा जानो। पादोदकतीर्थसे दक्षिणमें जो श्वेतद्वीप नामक परम महान् तीर्थ है वहाँ मैं ज्ञानकेशवके नामसे रहकर मनुष्योंको ज्ञान प्रदान करता हूँ। तार्क्ष्यतीर्थमें मैं ही तार्क्ष्यकेशवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। वहीं नारदतीर्थमें मैं नारदकेशव कहलाता हूँ। वहीं प्रह्लादतीर्थ भी है, जहाँ मैं प्रह्लादकेशवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। भक्त पुरुषोंको वहाँ मेरे स्वरूपकी भलीभाँति आराधना करनी चाहिये। अम्बरीषतीर्थमें मेरा नाम आदित्यकेशव है। दत्तात्रेयेश्वरसे दक्षिण मेरा नाम आदिगदाधर है। वहीं भार्गवतीर्थमें मैं भृगुकेशवके नामसे विख्यात हूँ। वामन नामक मंगलकारी महातीर्थमें मैं वामनकेशव हूँ। नरनारायणतीर्थमें मैं नर-नारायणस्वरूप हूँ। यज्ञवाराह नामक तीर्थमें मेरा
८५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नाम यज्ञवाराह है। विदारनारसिंह नामवाले तीर्थमें मैं विदारनारसिंह नामसे ही सेवन करने योग्य हूँ। गोपीगोविन्द नामक तीर्थमें मैं गोपीगोविन्द नामसे ही प्रसिद्ध हूँ। लक्ष्मीनृसिंह नामवाले पावन तीर्थमें मैं लक्ष्मीनृसिंह हूँ। पापहारी शेषतीर्थमें मैं शेषमाधव हूँ। शंखमाधवतीर्थमें मेरा नाम शंखमाधव है। हयग्रीव महातीर्थमें हयग्रीवकेशव नामसे मेरी प्रसिद्धि है। वृद्धिकालेश्वरसे पश्चिम मैं भीष्मकेशव नामसे प्रसिद्ध हूँ। लोलार्कसे उत्तर भागमें मेरा नाम निर्वाणकेशव है। त्रिपुरसुन्दरी देवीसे दक्षिण भागमें जो त्रिभुवनकेशव नामसे मेरी पूजा करेगा वह फिर कभी गर्भमें नहीं आवेगा। ज्ञानवापीके पूर्वभागमें मैं ज्ञानमाधवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। विशालाक्षी देवीके समीप मैं श्वेतमाधवके नामसे स्थित हूँ। दशाश्वमेधसे उत्तरमें स्थित मुझ प्रयागमाधवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार जब भगवान् विन्दुमाधव अग्निविन्दु मुनिको काशीमें स्थित अपने विभिन्न स्वरूपोंका परिचय देते हुए माहात्म्य-कथा सुना रहे थे, उसी समय उन्हें गरुड़जी दिखायी दिये। गरुड़ने भगवान्को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीके शुभागमनकी सूचना दी।
भगवान्ने पूछा—महादेवजी कहाँ हैं?
गरुड़ बोले—जिसकी ध्वजापर महान् वृषभका चिह्न शोभा पाता है तथा जिसके रत्नमय ध्वजकी प्रभा इस पृथ्वी और आकाशको परिपूर्ण किये दे रही है, वह यह महादेवजीका रथ आ रहा है। उसका प्रत्यक्ष दर्शन कीजिये। तब श्रीहरिने भगवान् त्रिलोचनके वृषभ-ध्वजका दर्शन करके उसे दूरसे ही प्रणाम किया और अग्निविन्दु मुनिसे कहा—'मुने! तुम अपने दाहिने हाथसे इस सुदर्शनचक्रका स्पर्श कर लो।' भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर उन्होंने ज्यों ही सुदर्शनका स्पर्श किया त्यों ही श्रीहरिके महान् अनुग्रहसे वे 'सुदर्शन' हो गये।
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! फिर अग्निविन्दु मुनि ज्योतिःस्वरूप होकर भगवान् विन्दुमाधवकी सेवाके प्रभावसे उनकी दिव्य चिन्मय ज्योतिस्स्वरूपा कौस्तुभमणिमें मिलकर एकीभूत हो गये। जिन्होंने विन्दुमाधवके चरणारविन्दोंमें अपने चित्तको चंचरीककी भाँति लगा रखा है, वे भी अग्निविन्दु की भाँति निश्चय ही भगवत्स्वरूपको प्राप्त होते हैं। इसलिये सदा काशीमें निवास, श्रीविन्दुमाधवका दर्शन और इस माहात्म्य-कथाका श्रवण करना चाहिये तथा ऐसा करके लौकिक गतिपर विजय पानी चाहिये। पंचनदकी उत्पत्ति-कथा पुण्यमयी है। भगवान् विन्दुमाधवकी कथा भी परम पवित्र है और काशीका निवास भी अतिशय पुण्यजनक है—ये तीनों बातें पुण्यात्माओंको ही सुलभ हैं।
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भगवान् शिवका स्वागत या वृषभध्वजतीर्थकी महिमा तथा शिवका काशीपुरीमें प्रवेश
स्कन्दजी कहते हैं—तदनन्तर श्रीहरि ब्रह्माजीको आगे करके भगवान् शंकरकी अगवानीके लिये आगे बढ़े। देवाधिदेव भगवान् वृषभध्वजको देखकर श्रीविष्णुने उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् फलसहित भीगे अक्षतोंको दिखाते हुए ब्रह्माजीने स्वस्तिवाचनके लिये हाथ ऊँचे करके रुद्रसूक्तोंसे भगवान् शिवका स्तवन किया। श्रीगणेशजीने उनके चरणारविन्दोंमें मस्तक रखकर शीघ्रतापूर्वक नमस्कार किया। तब महादेवजीने हर्षमें भरकर गणेशजीका मस्तक सूंघा और उन्हें हृदयसे लगाकर अपने आसनपर बिठा लिया। सोम और नन्दी आदि गणोंने साष्टांग प्रणाम किया। योगिनियोंने भी महेश्वरको प्रणाम करके मंगलगान किया। तत्पश्चात् सूर्यदेवने शिवजीको नमस्कार किया। चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवने श्रीहरिको अपने सिंहासनके समीप ही वामभागमें बड़े आदरके साथ बिठाया और ब्रह्माजीको