भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 876
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध *८४७

क्षीरसमुद्रके तटपर निवास करता है। वहीं त्रिभुवनवन्दित महालक्ष्मीकी मूर्ति है, उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेवाला मनुष्य कभी रोगी नहीं होता। भगवान् केशव उस मूर्तिमें अपने ही व्यापक स्वरूपको समाविष्ट करके पुनः भगवान् शंकरका कार्य सिद्ध करनेके लिये अंशांशसे बाहर निकले और काशीसे कुछ उत्तर जाकर उन चक्रधारी विष्णुने अपने रहनेके लिये एक स्थान निश्चित किया, जो ‘धर्मक्षेत्र’ (धर्मचक्र स्थान—सारनाथ)—के नामसे प्रसिद्ध है।

तदनन्तर भगवान् लक्ष्मीपतिने परम सुन्दर त्रिभुवन-मोहन रूप धारण किया और गरुड़जी भी अलौकिक रूप धारण करके उनके शिष्य हो गये। वे बड़ी अद्भुत मेधाशक्तिसे सम्पन्न, सब वस्तुओंकी ओरसे निःस्पृह तथा गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने अपने हाथके अग्रभागमें एक पुस्तक रख ली थी। भगवान्ने अपना नाम पुण्यकीर्ति और गरुड़का नाम विनयकीर्ति रखा। पुण्यकीर्तिने विनयकीर्तिको इस प्रकार उपदेश दिया।

पुण्यकीर्ति बोले—महामते विनयकीर्ते! तुमने जो सनातन धर्मके विषयमें प्रश्न किया है वह सब पूर्णरूपसे बतलाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। इहलोक और परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके शास्त्रोंका विचार करके महर्षियोंने चार प्रकारके दानोंका उपदेश दिया है। भयभीत पुरुषोंको अभयदान, रोगियोंको औषधदान, विद्यार्थियोंको विद्यादान तथा भूखसे व्याकुल मनुष्योंको अन्नदान देना चाहिये। वासनासहित क्लेशका उच्छेद हो जानेपर विज्ञानकी उपरति (अविद्याकी निवृत्ति) ही मोक्ष है, यह तत्त्वका विचार करनेवाले पुरुषोंको जानना चाहिये। वेदवादियोंके द्वारा यह प्रामाणिक श्रुति पढ़ी जाती है कि ‘मा हिंस्यात्सर्वभूतानि'—किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये।

इस प्रकार पुण्यकीर्तिके धर्मोपदेश करनेपर क्रमशः पुरवासी एक-दूसरेसे सुनकर वहाँ भगवान्के निकट आने लगे। उपदेशका क्रम चालू था—‘जबतक यह शरीर स्वस्थ है, जबतक इन्द्रियोंमें शिथिलता नहीं आती और जबतक बुढ़ापा दूर है, तबतक ही परम आनन्द (मोक्ष)-के लिये साधन कर लेना चाहिये। अस्वस्थता, इन्द्रियोंकी विकलता और वृद्धावस्थामें कैसे सुख हो सकता है। अतः परम सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको याचकोंके लिये अपना शरीर भी दे डालना चाहिये*। शरीर शीघ्र जानेवाला है, सभी संग्रह नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसा समझकर विज्ञ पुरुष इस शरीरके रहते हुए नित्यसुखके लिये साधन करे। अन्तमें यह शरीर कुत्तों और कौओंका भोजन बन जाता है। वेदमें यह सत्य ही कहा गया है कि शरीर अन्तमें भस्म हो जानेवाला है।'

मुने! इधर, विघ्नराज गणेशने दूर रहकर भी शत्रुविजयी राजा दिवोदासके चित्तको राज्यकी ओरसे विरक्त कर दिया। वे अठारह दिनोंकी


* यावत्स्वस्थमिदं वर्म यावन्नेन्द्रियविकलवः। यावज्जरा च दूरेऽस्ति तावत्सौख्यं प्रसाधयेत् ॥
अस्वास्थ्येन्द्रियवैकल्ये वार्धके तु कुतः सुखम्। शरीरमपि दातव्यमर्थिभ्योऽतः सुखेप्सुभिः ॥
(स्क० पु०, का० उ० ५८। १५-१६)

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