भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 877

८४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अवधिको गिनने लगे और मन-ही-मन सोचने लगे कि 'ब्राह्मण देवता कब आयेंगे जो मुझे उपदेश करेंगे।' इस प्रकार अठारहवाँ दिन प्राप्त होनेपर दोपहरके समय वे पुण्यकीर्ति नामवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण ही धर्मक्षेत्रसे राजाके द्वारपर आये। उन्हें दूरसे आते देख उत्कण्ठित हुए नरेशने अपने मनमें मान लिया कि ये मुझे उपदेश देने योग्य गुरु हैं। फिर वे उनके समीप गये और उन्हें बार-बार प्रणाम करके आशीर्वाद ले उन्हें अपने अन्तःपुरमें लिवा ले गये। वहाँ राजाने शास्त्रोक्त विधानसे भलीभाँति उनका पूजन किया और जब वे मार्गकी थकावटसे रहित, स्वस्थ एवं प्रसन्नमुख हो गये तब उन्हें भोजनके लिये नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं। उन्हें ग्रहण करके जब पुण्यकीर्ति पूर्णतः तृप्त हो गये और सुखपूर्वक आसनपर जा बैठे, तब राजाने कहा—'विप्रवर! मैं राज्यका भार ढोते-ढोते बहुत खिन्न हो गया हूँ, अब उसकी ओरसे वैराग्य-सा हो रहा है। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कैसे मुझे शान्ति प्राप्त होगी। यह सब सोचते-विचारते मेरा एक मास व्यतीत हो गया। मैंने अपने सगे पुत्रोंकी भाँति प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन किया है और प्रतिदिन नाना प्रकारके धन देकर ब्राह्मणोंको तृप्त किया है। राज्यशासन करते समय मेरे द्वारा एक ही अपराध हुआ है, वह यह कि मैंने अपने तपोबलके अभिमानसे सम्पूर्ण देवताओंको तिनकेके समान समझा है। यद्यपि प्रजाके उपकारके लिये ही ऐसा किया है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं। यह मैं आपसे शपथ खाकर कहता हूँ, मेरे शासनकालमें कोई भी पापवृत्तिका सेवन नहीं करता, सभी लोग धर्मपरायण और सुखी हैं। सबमें उत्तम विद्याका व्यसन है और सब लोग सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, तथापि मुझे संसारके सभी भोग ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे एक बारके चबाये हुए अन्नको फिरसे चबाना। यह राज्य भी क्या है? पीसे हुएको पीसना। इसे लेकर क्या करना है। विप्रवर! आप ज्ञानी पुरुष हैं, मुझे कोई ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे पुनः गर्भवासका कष्ट न भोगना पड़े। आप जो कुछ कहेंगे, निःसन्देह मैं वही करूँगा। इस समय आपके दर्शनसे मेरी सब इन्द्रियाँ विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गयी हैं और उपरतिका यह उत्तम सुख मुझे प्राप्त हुआ है। इस समय मुझे कोई ऐसा उपाय बताइये जो कर्मबन्धनका नाश करनेमें समर्थ हो।'

**स्कन्दजी कहते हैं—**राजाका ऐसा कथन सुनकर ब्राह्मणवेषधारी श्रीविष्णु बोले—'महाप्राज्ञ! राजशिरोमणे! मुझे जो कुछ उपदेश करना है वह सब तो तुम्हींने कह दिया। तुम तो पहलेसे ही कृतार्थ हो, मुझसे उपदेश लेकर मुझे सम्मान दे रहे हो। तुमने अपनी उत्तम तपस्याके निर्मल जलसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी मलिनताको धो डाला है। भूपाल! तुमने जो कुछ कहा है वह सब सत्य है। तुम्हारे समान राजा इस पृथ्वीपर न हुआ है और न होगा। तुममें जो मुमुक्षा (मुक्तिकी इच्छा) जाग्रत् हुई है वह उचित ही है। तुम्हारे इस राज्यमें अधर्मका प्रवेश भी नहीं हुआ है। धर्मज्ञ! तुम्हारे द्वारा धर्ममें लगायी गयी प्रजाने जो धर्मका अनुष्ठान किया है उससे सम्पूर्ण देवता तृप्त हुए हैं। मेरे हृदयमें तुम्हारा एक ही दोष प्रतीत होता है कि तुमने भगवान् विश्वनाथको काशीसे दूर कर दिया है। मेरी समझमें तुम्हारा सबसे महान् अपराध यही है। इस पापकी शान्तिके लिये मैं तुम्हें बहुत उत्तम उपाय बतलाता हूँ। जिसने भगवान् शिवमें भक्ति रखकर यहाँ काशीमें एक शिवलिंगकी भी स्थापना की है, उसने अपनेसहित सम्पूर्ण जगत्‌की प्रतिष्ठाका पुण्य प्राप्त किया है। इसलिये तुम सर्वथा प्रयत्नपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना करो, इससे कृतार्थ हो जाओगे। दिवोदास! तुम्हारे समीप होनेसे हमलोग भी धन्य-धन्य हो गये हैं। इस मर्त्यलोकमें जो तुम्हारा नाम लेते हैं वे भी परम धन्य हैं। राजन्! तुम्हारा मनोरथरूप महान् वृक्ष आज फलित हुआ है, तुम इसी शरीरसे परम पदको प्राप्त होओगे। भगवान् शिवके लिंगमय विग्रहकी स्थापना कर लेनेपर आजसे सातवें दिन