संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 878, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४९
एक दिव्य विमान तुम्हें शिवधाममें ले जानेके लिये आयेगा। यह काशीपुरीके भलीभाँति सेवनका फल है।'
यह सब सुनकर प्रतापी राजा दिवोदास बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्राह्मणके चरणोंमें बारंबार प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा—'भगवन्! आपने मुझे संसार-सागरसे पार उतार दिया।' तत्पश्चात् ब्राह्मणवेषधारी विष्णुने भी राजासे पूछकर काशीपुरीका भलीभाँति निरीक्षण करके परम पवित्र पंचनद कुण्ड (पंचगंगा)-को देखा और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके वहीं निवास किया। फिर भगवान् शंकरके शुभागमनकी शीघ्र प्रतीक्षा करते हुए माधवने राजा दिवोदासके वृत्तान्तको जाननेवाले गरुड़जीको वहाँ भेजा।
उधर राजा दिवोदासने भी अपने गुरु विप्रवर पुण्यकीर्तिकी महिमाका बखान करते हुए समस्त प्रजाओं, मन्त्रियों तथा मण्डलेश्वरोंको बुलाया। खजाना, घोड़े और हाथी आदिकी देख-रेखके लिये नियुक्त सब अध्यक्षोंको, अपने पाँच सौ पुत्रोंको, ज्येष्ठ पुत्र समरंजयको, पुरोहित, प्रतीहार, ऋत्विज्, ज्योतिषी, ब्राह्मण, सामन्त, राजकुमार, रसोइये, चिकित्सक तथा नाना कार्योंके लिये आये हुए विदेशी मनुष्योंको भी एकत्र किया। इन सबको हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त राजाने ब्राह्मणकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं और यह भी बताया कि 'सात दिनतक और मुझे इस लोकमें रहना है।' सब लोग विषादवश मुर्झाये हुए मुखसे यह आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुन रहे थे। राजाने स्वयं ही कुमार समरंजयको राजमहलमें ले जाकर उन्हें राजाके पदपर अभिषिक्त किया। फिर नगर और राज्यके लोगोंको भी दान आदिसे प्रसन्न करके पुण्यात्मा राजाने गंगाके पश्चिम तटपर एक विशाल मन्दिर बनवाया। संग्राममें शत्रुओंको जीतकर उन्होंने जितनी सम्पत्ति संग्रह की थी वह सब लगाकर राजाने शिवमन्दिरका निर्माण कराया। राजाकी सम्पूर्ण सम्पत्ति वहाँ लगा दी गयी थी, इसलिये वह शुभ भूमि 'भूपालश्री' नामसे विख्यात हुई। राजा रिपुंजयने दिवोदासेश्वर लिंगकी स्थापना करके अपने-आपको कृतार्थ माना। तदनन्तर एक दिन विधिपूर्वक उस शिवलिंगकी पूजा और वन्दना करके ज्यों ही स्तुति करना प्रारम्भ किया त्यों ही आकाशसे एक दिव्य विमान उतरा जो हाथमें शूल और खट्वांग धारण करनेवाले शिव-पार्षदोंसे घिरा हुआ था। तत्पश्चात् उन पार्षदोंने राजाको दिव्य माला, दिव्य गन्ध, दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत किया और उन्हें शिवधाममें पहुँचा दिया। तबसे वह तीर्थ 'भूपालश्री' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ श्राद्ध आदि करके अपनी शक्तिके अनुसार दान देकर जो दिवोदासेश्वरका दर्शन और भक्तिपूर्वक पूजन करता है तथा राजाकी इस कथाको भी सुनता है वह फिर गर्भमें नहीं आता। जहाँ सब पातकोंका नाश करनेवाली दिवोदासकी कथा होती है वहाँ अनावृष्टि और अकालमृत्युका भय नहीं होता। इस माहात्म्य कथाके पाठसे सबके मनोरथ पूर्ण होंगे।