संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कृपादृष्टि करती हैं। प्रणतजनोंके विघ्नका विनाश करनेमें चतुर तथा पार्वतीजीके हृदयकमलको विकसित करनेमें सूर्यस्वरूप गणेश! जो लोग आपकी स्तुति करते हैं, वे इस संसारमें प्रसिद्ध होते हैं। यह कोई अद्भुत बात नहीं है। जो सदा आपके युगल चरणोंकी सेवा करते हैं, वे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और समृद्धिके भागी होते हैं। बहुत-से भृत्य (दास-दासी आदि) उनके चरण-कमलोंकी सेवामें रहते हैं तथा वे राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य निर्मल लक्ष्मीकी प्राप्ति करते हैं। हे परमकारण! आप कारणोंके भी कारण हैं, वेदके विद्वानोंद्वारा सदा एकमात्र आप ही जाननेयोग्य हैं। आप ही वेदवाणीमें अनुसन्धान करनेयोग्य अनिर्वचनीय तत्त्व हैं, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके दिव्य स्वरूपका एक अंश है तथा आप वाणीके अविषय हैं। ढुण्ढिराज विनायक! आप समस्त पुरुषार्थोंको ढूँढ़ चुके हैं, इसलिये आपका नाम 'ढुण्ढि' है। आपको सन्तुष्ट किये बिना कौन देहधारी प्राणी इस काशीमें प्रवेश पा सकता है?
भगवान् विष्णुका काशी-गमन, केशव एवं पादोदकतीर्थकी महिमा, धर्मक्षेत्रमें पुण्य-कीर्तिका उपदेश तथा राजा दिवोदासकी निर्वाणप्राप्ति
**स्कन्दजी कहते हैं—**मुने! जब गणेशजी भी काशीमें आकर विलम्ब करने लगे तब भगवान् शिवने श्रीविष्णुजीकी ओर देखा और बड़े आदरके साथ कहा—'माधव! आप भी वैसा ही न कीजियेगा, जैसा कि पहलेके गये हुए लोगोंने किया है।'
**भगवान् विष्णु बोले—**गिरीश! इस लोकमें मनुष्य जो कुछ भी थोड़ा या अधिक कर्म करता है वह आपके चरणारविन्दोंके चिन्तनसे ही सिद्ध होता है। आपकी भक्तिरूपी सम्पदासे सम्पन्न हुए हमलोगोंका उद्योग प्रायः सफल ही होता है। शिव! अपनी बुद्धि, बल और पुरुषार्थसे जो कार्य अत्यन्त असाध्य होता है वह भी आपके निरन्तर स्मरणसे भलीभाँति सिद्ध हो जाता है। अतः आप अपनेद्वारा निश्चित किये हुए इस कार्यको सिद्ध हुआ ही जानें।
यों कहकर भगवान् विष्णुने शिवजीकी परिक्रमा की और बार-बार उन्हें प्रणाम करके लक्ष्मीजीके साथ मन्दराचलसे प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने गंगा तथा वरणा नदीके संगममें हाथ-पाँव धोकर स्नान किया। पीताम्बरधारी श्रीहरिने पहले कल्याण प्रदान करनेवाले अपने दोनों चरण वहाँ धोये थे, इसलिये तभीसे उस तीर्थका नाम 'पादोदक' तीर्थ हो गया। जो मानव उस पादोदकतीर्थमें स्नान करते हैं, उनके सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ तिल और जलसे तर्पण करके पितरोंका श्राद्ध करेगा वह अपने वंशकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देगा। जिसने पादोदकतीर्थमें स्नान किया है, पादोदकतीर्थके जलको पी लिया है तथा पादोदकतीर्थके जलसे पितरोंका तर्पण किया है, ऐसे मनुष्यको कभी नरक छू भी नहीं सकता। जो पादोदकतीर्थके जलको शंखमें रखकर उसके द्वारा नहलाये हुए गोमतीचक्रसहित श्रीशालग्रामके चरणामृतको पान करता है, वह अमृतपदको प्राप्त होता है।
वहाँ लक्ष्मी और गरुड़के साथ नित्यकर्म करके केशवने अपने हाथसे अपनी ही प्रस्तरमय मूर्ति बनायी और समस्त सिद्धियों तथा समृद्धियोंको देनेवाली उस मूर्तिको स्वयं ही पूजन किया। जो मनुष्य केशव नामसे प्रसिद्ध उस परमेश्वरमूर्तिका भलीभाँति पूजन करता है वह वैकुण्ठधामको अपने घरके आँगनमें ही उतरा हुआ समझे। काशीकी सीमामें वह स्थान श्वेतद्वीप कहलाता है। उस केशवमूर्तिकी सेवा करनेवाले मनुष्य श्वेतद्वीपमें ही निवास करते हैं। केशवके आगे क्षीरसागर नामसे प्रसिद्ध दूसरा तीर्थ है, उसमें स्नान और तर्पण आदि कार्य करनेवाला मनुष्य