भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 874, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 874
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४५

गणेशजीका काशीमें जाना और लोकप्रिय होना, गणेशजीका स्तवन

स्कन्दजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा लेकर उनके काशीमें आनेके उपायका विचार करते हुए गणेशजी मन्दराचल पर्वतसे चले और ब्राह्मणका स्वरूप धारण करके काशीपुरीमें जा पहुँचे। वे बूढ़े ज्योतिषी बनकर प्रत्येक घरके भीतर जाते और नगरनिवासियोंको प्रसन्न करते थे। रनिवासमें प्रवेश करके अपनी दिव्य दृष्टिसे देखी हुई वस्तुको बता-बताकर स्त्रियोंके विश्वासपात्र हो गये। एक दिन अवसर पाकर महाराज दिवोदासकी रानी लीलावतीने महाराजसे उनके सम्बन्धमें निवेदन किया—'राजन्! एक बड़े विद्वान् एवं सुवक्ता वृद्ध ब्राह्मण आये हैं, जो अपने गुणोंके कारण बहुत बढ़े-चढ़े हैं। वे वेदोंकी मूर्तिमान् निधि हैं, आपको भी उनका दर्शन करना चाहिये।' राजाने प्रातःकाल उन वृद्ध ब्राह्मणको बुलवाया और भक्तिपूर्वक उत्तम वस्त्र आदि देकर उनका यथावत् सत्कार किया। तदनन्तर एकान्तमें राजाने अपने हृदयमें स्थित प्रश्नको उनसे इस प्रकार पूछा—'ब्रह्मन्! निश्चय ही आप एक श्रेष्ठ द्विज प्रतीत होते हैं। आपकी बुद्धि जिस प्रकार तत्त्वज्ञानसे सम्पन्न है, वैसी दूसरेकी नहीं है, ऐसी मेरी समझ है। इस समय मेरा मन सब कर्मोंसे विरक्त-सा हो रहा है; अतः आप भलीभाँति विचार करके मेरे शुभ भविष्यका वर्णन करें।'

ब्राह्मणने कहा—राजन्! आजके अठारहवें दिन कोई उत्तर दिशाका ब्राह्मण आकर निश्चय ही तुम्हें उपदेश करेगा। तुम्हें बिना विचारे उसके वचनको मानना और उसका पालन करना चाहिये। महामते! ऐसा करनेसे तुम्हारा सब मनोरथ सिद्ध होगा।

ऐसा कहकर राजाकी अनुमति ले वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने आश्रमको चले गये। इस प्रकार विघ्नविजयी गणेशजीने समस्त काशीपुरीको अपने वशमें कर लिया और ऐसा करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य-सा माना। जब दिवोदास काशीके राजा नहीं थे, उस समय गणेशजीके जो-जो स्थान थे, उन-उन स्थानोंको गणेशजीने अनेक रूप धारण करके पुनः सुशोभित किया।

(गणेशजीकी पूजाके पश्चात् इस प्रकार उनकी स्तुति करे—) भक्तोंके विघ्नका निवारण करनेवाले! आपकी जय हो। विघ्नरहित! विघ्नशमन! आपकी जय हो। सम्पूर्ण गणोंके अधीश्वर! आपकी जय हो। समस्त गणोंके अग्रगण्य! आपकी जय हो। गणोंसे अभिवन्दित चरणारविन्दवाले देव! आपकी जय हो। असंख्य सद्गुणोंसे विभूषित गणेश! आपकी जय हो। सर्वव्यापी सर्वेश्वर तथा समस्त बुद्धियोंके एकमात्र निधान! आपकी जय हो। सम्पूर्ण मायाप्रपंचके ज्ञाता तथा सब कर्मोंमें सबसे प्रथम पूजित देव! आपकी जय हो। सब मंगलोंके लिये भी मंगलस्वरूप तथा सर्व-मंगलकारी गणाधीश! आपकी जय हो। अमंगलकी शान्ति करनेवाले तथा मंगलके हेतुभूत देव! आपकी जय हो। सृष्टिकर्ताओंके वन्दनीय! आपकी जय हो। सिद्धिदायक! आपकी जय हो। सम्पूर्ण सिद्धियोंके एकमात्र निवास-स्थान! आपकी जय हो। महाऋद्धि-सिद्धिके सूचक! आपकी जय हो। समस्त गुणोंका निर्माण करनेवाले, गुणोंसे परे तथा गुणोंद्वारा अग्रगण्य गणेश! आपकी जय हो। गुणवर्णित! सर्वबलाधीश्वर तथा इन्द्रको बल प्रदान करनेवाले गणाध्यक्ष! आपकी जय हो। अनन्त महिमाके आधार तथा पर्वतोंको विदीर्ण करनेवाले गणेश! आपकी जय हो। करुणामय! दिव्यमूर्ते! जो आपको नमस्कार करते हैं, वे भूमण्डलमें सम्पूर्ण पापोंके भाजन होकर भी अन्तमें मोक्षके भागी होते हैं। आप सदैव उनके बड़े-बड़े विघ्नों और उपद्रवोंका निवारण करते हैं तथा उन्हें उनकी रुचिके अनुसार स्वर्ग एवं मोक्ष भी देते हैं। विघ्नराज! जो लोग इस पृथ्वीपर क्षणभर भी आपके कृपाकटाक्षके द्वारा देखे जाते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उन श्रेष्ठ पुरुषोंपर भगवती लक्ष्मी अपनी