संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 873, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें८४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बीत गया है। वहाँ मैं भूख-प्याससे पीड़ित होकर सर्दी और गरमीका कष्ट भोगता रहा हूँ। मरुभूमिमें दीर्घकाल व्यतीत होनेके पश्चात् एक दिन मैंने किसी ब्राह्मणके पुत्रको देखा। उसने धोतीकी लाँग नहीं बाँध रखी थी। वह अपवित्र और सन्ध्याकर्मसे हीन था। उसे देखकर उसीके द्वारा कुछ भोग मिलनेकी आशासे मैं उसके शरीरमें समा गया। मुने! वह ब्राह्मण धनके लोभसे किसी वणिक्के साथ इस पुण्यमयी पुरीमें आ गया। मुनिश्रेष्ठ! इस पुरीके भीतर उसके प्रवेश करते ही मैं और उसके पाप क्षणभरमें एक ही साथ शरीरसे बाहर निकल गये। दयालो! इस समय सहसा शिव नामकी ध्वनि कानमें पड़नेसे मेरा पाप कुछ क्षीण हो गया है, इसलिये मैं काशीके अन्तर्गृहकी सीमामें प्रवेश कर पाया हूँ। अब आपका दर्शन हो जानेसे मैं अपनेको बड़ा भाग्यवान् समझता हूँ। आप कृपा करके मुझे इस भयंकर योनिसे निकालिये। मेरा उद्धार कीजिये।'
प्रेतका यह वचन सुनकर उन दयालु तपस्वीने इस प्रकार विचार किया—'अपना पेट तो पशु, पक्षी, मृग आदि सभी जीव भर लेते हैं। संसारमें वही धन्य है, जो सदा दूसरोंका उपकार करनेके लिये उद्यत रहता है। अतः आज मैं अपनी तपस्यासे मेरी शरणमें आये हुए इस पापातुर प्रेतका अवश्य उद्धार करूँगा।' इस प्रकार मन-ही-मन निश्चय करके उन साधुशिरोमणि तपस्वीने पिशाचसे कहा—'अरे ओ पिशाच! तू इस विमलोद नामक सरोवरमें स्नान कर ले। इस तीर्थके प्रभावसे तथा भगवान् कपर्दीश्वरके दर्शनसे तेरी पिशाचता आज क्षणभरमें नष्ट हो जायगी।'
यह सुनकर प्रेतने नमस्कारपूर्वक कहा—मुनिश्रेष्ठ! पानी तो मैं पीनेके लिये भी नहीं पाता, स्नान करनेकी तो बात ही क्या है? मेरे लिये तो यहाँके जलका स्पर्श भी दुर्लभ है।
तपस्वीने कहा—तू यह विभूति ले और अपने ललाटमें धारण कर, फिर तुझे कहीं कोई भी बाधा नहीं है। पापीका भी विभूतिसे उज्ज्वल ललाट देखकर यमराजके दूत पाशुपतास्त्रसे भयभीत होकर भाग जाते हैं।
ऐसा कहकर मुनिने भस्म ले प्रेतके हाथमें दे दिया और उसने भी आदरपूर्वक लेकर उसे ललाटमें लगा लिया। पिशाचको विभूति धारण किये देख जलके देवताओंने उसे जलमें स्नान करनेसे नहीं रोका। स्नान और जलपान करके वह ज्यों ही जलाशयसे बाहर निकला त्यों ही उसकी पिशाचता दूर हो गयी और उसने दिव्य शरीर धारण कर लिया। उसी समय दिव्य विमानपर बैठकर वह आकाशमार्गको प्राप्त हुआ। जाते समय उसने तपस्वीको नमस्कार करके उच्चस्वरसे कहा—'भगवन्! आपने मुझे इस अत्यन्त निन्दित पिशाच-योनिसे मुक्त किया है, इसलिये आजसे इस तीर्थका नाम पिशाचमोचन तीर्थ होगा। यहाँ स्नान करनेसे यह तीर्थ दूसरोंके भी पिशाचभावको हर लेगा। जो मनुष्य इस परम पुण्यमय तीर्थमें स्नान और सन्ध्या-तर्पण करके यहाँ पिण्डदान करेंगे, उनके पिता-पितामह यदि दैववश पिशाच-योनिको प्राप्त हुए हों तो उस योनिका परित्याग करके परम गतिको प्राप्त होंगे। आज मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथि है, आजके दिन यहाँ स्नान आदि करना चाहिये। आजका स्नान पिशाच-योनिसे सर्वथा मुक्त करनेवाला है। जो लोग इस तिथिपर यहाँकी वार्षिक यात्रा करेंगे, वे तीर्थमें दान लेनेके पापसे मुक्त हो जायँगे।'
यों कहकर उस दिव्य पुरुषने बार-बार तपोधनको नमस्कार किया और दिव्य गति प्राप्त कर ली। तपस्वी वाल्मीकि भी उस महान् आश्चर्यको देखकर कपर्दीश्वरकी आराधनामें लगे रहे और समयानुसार मोक्ष प्राप्त कर लिया। महामुने! तबसे लेकर यह सब पापोंका अपहरण करनेवाला पिशाचमोचन तीर्थ काशीमें अत्यन्त प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ।