भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 872
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४३

दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष यम-यातनाको कभी नहीं देखता। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक गंगादशहराके दिन दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके दशाश्वमेधेश्वर नामक उत्तम लिंगका पूजन करता है, उसको गर्भदशा छू भी नहीं सकती। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें वहाँकी वार्षिक यात्रा करके पंद्रह दिनोंतक रुद्रसरोवरमें स्नान करनेवाला पुरुष कभी विघ्नोंसे तिरस्कृत नहीं होता।

महाराज दिवोदासने यज्ञ पूर्ण करनेवाले वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी ब्रह्माजीके लिये वहाँ एक ब्रह्मशाला बनवा दी। उसीमें वेद-मन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनिसे आकाशको गुँजाते हुए ब्रह्माजीने निवास किया।

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पिशाचमोचनतीर्थकी महिमा

स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! भगवान् शिवके अत्यन्त प्रिय कपर्दी नामक गणाधीशने पितृरीश्वरलिंगके उत्तरभागमें एक शिवलिंग स्थापित किया और उसके आगे ‘विमलोदक’ नामसे प्रसिद्ध एक कुण्ड भी खुदवाया, जिसके जलका स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य निर्मल हो जाता है। प्राचीन त्रेतायुगकी बात है। शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकि नामक एक मुनि थे जो काशीमें प्रतिदिन कपर्दीश्वरकी पूजा करते हुए तपस्या करते थे। एक दिन हेमन्तके मार्गशीर्ष मासमें तपस्वी वाल्मीकिने मध्याह्नके समय विमलोदक नामवाले महातीर्थमें स्नान करके सिरसे लेकर पैरतक भस्म लगाया। फिर कपर्दीश्वरके दक्षिणभागमें बैठकर मध्याह्नकालोचित नित्य-कर्म प्रारम्भ किया। मस्तकपर भस्म रमाये हुए उन्होंने आध्यात्मिक सन्ध्याका चिन्तन किया और पंचाक्षर मन्त्र-( नमः शिवाय) का जप करते हुए जटाजूटधारी भगवान् शिवका ध्यान किया। तत्पश्चात् संहार-क्रम (वामावर्त)-से परिक्रमा करके तीन बार उच्चस्वरसे ‘हुडुम्’ ‘हुडुम्’ ‘हुडुम्’ का उच्चारण किया। तदनन्तर प्रणवको ही सामने रखकर उसका षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद—इन स्वरोंके भेदसे गान किया। गान करके आनन्दपूर्वक हस्तसंचालन करते हुए नृत्य भी किया। अंग-संचालनद्वारा मनोहर ढंगसे मण्डलयुक्त नृत्य करके वे महातपस्वी कुछ क्षणोंतक उस सरोवरके ही तटपर बैठे रहे। इसी समय उन्होंने अत्यन्त विकराल आकृतिवाले एक भयानक पिशाचको देखा। उसकी आँखें कुछ-कुछ पीली थीं। उस प्रेतको देखकर बूढ़े तपस्वीने धैर्यपूर्वक पूछा—'तू कौन है?' तपस्वीका यह प्रेमपूर्वक वचन सुनकर पिशाचने हाथ जोड़कर कहा—'भगवन्! गोदावरी नदीके तटपर प्रतिष्ठान नामक एक देश है। वहाँ मैं तीर्थोंमें दान लेनेकी रुचि रखनेवाला एक ब्राह्मण था। उसी कर्मके फलस्वरूप मैं ऐसी दुर्गतिको प्राप्त हुआ हूँ। जल और वृक्षसे रहित महाभयंकर मरुस्थलमें निवास करते हुए मुझे बहुत समय