संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जानेका साहस नहीं करते। हम धन आदिकी कामनाओंसे रहित ब्राह्मण हैं, हमें किसीकी स्तुति-प्रशंसासे क्या प्रयोजन है। किंतु क्या करें, तुम्हारे सद्गुण ही हम-जैसे लोगोंको भी स्तुतिमें लगा देते हैं। राजन्! मैं इस समय यहाँ यज्ञ करना चाहता हूँ और इस कार्यमें तुम्हें सहायक बनाना चाहता हूँ। तुम्हारी यह राजधानी कर्मभूमिमें सबसे अधिक उत्तम है। न्याय और सन्मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंद्वारा जो धन संचय किया गया हो, उसका काशीमें सद्धर्मके कार्यमें उपयोग करना चाहिये; अन्यथा वह धन क्लेशका ही कारण होता है। भूपाल! सबको ज्ञान प्रदान करनेवाले त्रिनेत्रधारी शिवको छोड़कर दूसरा कोई भी काशीकी उत्तम महिमाको यथार्थ रूपसे नहीं जानता। मैं समझता हूँ, तुम परम धन्य हो जो कि सैकड़ों जन्मोंके पुण्यसे काशीपुरीका पालन कर रहे हो। 'काशी तीनों लोकोंका सार है, काशी तीनों वेदोंका सार है, काशी त्रिवर्ग— धर्म, अर्थ और कामसे परे सब पुरुषार्थोंका सारभूत मोक्ष है।' ऐसा महर्षियोंने निर्णय किया है। भगवान् विश्वनाथके अनुग्रहसे ही तुम्हारे द्वारा इस पुरीका पालन हो रहा है।
इतना कहकर जब ब्राह्मण देवता चुप हो गये, तब राजाने इस प्रकार उत्तर दिया—विप्रवर! मैंने आपकी कही हुई सब बातें हृदयमें धारण कर ली है। आप यज्ञ करनेके इच्छुक हैं, अतः आपकी सहायताके कार्यमें मैं आपका दास हूँ। आप मेरे कोषागारसे समस्त यज्ञ-सामग्रियोंको ले जायँ और एकाग्रचित्त होकर यज्ञ करें। ब्रह्मन्! मैं जो राज्य करता हूँ, उसमें थोड़ा-सा भी मेरा स्वार्थ नहीं है। मैं तो अपने पुत्र, कलत्र तथा शरीरद्वारा भी परोपकारके लिये ही यत्न करता हूँ। मनीषी महर्षियोंने राजाओंके लिये प्रजावर्गका यथावत् पालन ही एकमात्र महान् धर्म बताया है। द्विजोत्तम! मैं ब्राह्मणोंके मुखमें जो हवन करता हूँ, उसे यज्ञकर्मोंसे भी बढ़कर मानता हूँ। यह मेरे लिये बड़े आनन्दकी बात है कि आप मेरे घर कुछ माँगनेके लिये आये हैं।
धर्मात्मा राजा दिवोदासका यह वचन सुनकर ब्रह्माजी अपने मनमें बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने यज्ञ-सामग्रियोंका संग्रह किया और राजर्षि दिवोदासकी सहायता पाकर काशीमें दस अश्वमेध नामक महायज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन किया। तभीसे वहाँ वाराणसीपुरीमें मंगलदायक दशाश्वमेध नामक तीर्थ प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है। कुम्भज! पहले उस तीर्थका नाम ‘रुद्रसरोवर’ था, पीछेसे वह दशाश्वमेधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके बाद भगीरथके साथ स्वर्गलोककी नदी भागीरथी गंगाका वहाँ आगमन हुआ, इससे वह तीर्थ अत्यन्त पुण्यजनक हो गया। ब्रह्माजी वहाँ दशाश्वमेधेश्वर लिंगकी स्थापना करके स्थित हो गये। धर्मानुरागी राजा दिवोदासमें कोई भी छिद्र उन्हें नहीं मिला, अतः वे महादेवजीके सम्मुख जाकर क्या कहते। उस क्षेत्रके प्रभावको जानकर भगवान् विश्वनाथका ध्यान करते हुए ब्रह्मेश्वरकी स्थापना करके ब्रह्माजी भी काशीपुरीमें ही रह गये।
अगस्त्य! सब तीर्थोंमें उत्तम दशाश्वमेध है। वहाँ जाकर जो कुछ भी पुण्यकर्म किया जाता है, वह अक्षय कहा गया है। स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा, सन्ध्योपासन, तर्पण, श्राद्ध तथा पितरोंकी पूजा आदि सभी सत्कर्म वहाँ सफल एवं अक्षय होते हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य दशाश्वमेधतीर्थमें एक बार स्नान करके दशाश्वमेधेश्वरका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिको दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके मनुष्य जन्मभरके पातकोंसे मुक्त हो जाता है। ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीयाको रुद्रसरोवरमें स्नान करनेसे मनुष्यके दो जन्मोंके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार शुक्ल पक्षकी दशमीतक प्रत्येक तिथिमें क्रमशः स्नान करनेवाला मनुष्य प्रत्येक जन्मके पापको त्याग देता है। दस जन्मोंका पाप हर लेनेवाली गंगादशहरा तिथिको