भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 870

* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४१

देखता। चतुर्दशी तिथि, भरणी नक्षत्र और मंगलवारका योग होनेपर यमतीर्थमें स्नान, तर्पण और पिण्डदान करके मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है। नरकनिवासी पितर सदा यह अभिलाषा करते हैं कि 'मंगल, भरणी और चतुर्दशीका उत्तम योग आनेपर क्या कोई हमारे कुलका परम बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होगा जो काशीपुरीके भीतर यमतीर्थमें स्नान करके हमारी मुक्तिके लिये तिलसहित तर्पण करेगा।' यमतीर्थमें पितरोंका श्राद्ध, यमेश्वरका दर्शन-पूजन तथा यमादित्यको नमस्कार करके मनुष्य पितरोंके ऋणसे मुक्त हो जाता है।

मुने! इस प्रकार तुम्हें काशीके बारह आदित्योंका परिचय दिया गया जो पापोंका नाश करनेवाले हैं। इन सबकी उत्पत्ति या प्राकट्यकी कथा सुनकर मनुष्य कभी नरकमें नहीं पड़ता।


ब्रह्माजीका दिवोदासकी सहायतासे काशीमें यज्ञ करना और दशाश्वमेधतीर्थकी महिमा

स्कन्दजी कहते हैं—मुने! जब अंशुमाली सूर्य त्रिभुवनमोहिनी काशीपुरीको चले गये, तब मन्दराचल पर्वतपर विराजमान भगवान् शिव पुनः इस प्रकार विचार करने लगे—'अहो! अभीतक वहाँसे लौटकर न तो योगिनियाँ आयीं और न अबतक सूर्यदेव ही आये। काशीका समाचार भी मेरे लिये अत्यन्त दुर्लभ हो गया, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। अब काशीकी वार्ता जाननेके लिये किसको यहाँसे भेजूँ? वहाँकी बातोंको ठीक-ठीक जाननेमें ब्रह्माजी ही समर्थ हैं।' यह विचारकर ब्रह्माजीको बुलाकर महादेवजीने कहा—'कमलोद्भव! मैंने काशीका समाचार जाननेके लिये पहले तो योगिनियोंको भेजा था, फिर सूर्यदेवको भी प्रस्थापित किया था, किंतु अभीतक वे वहाँसे लौट नहीं रहे हैं। अतः अब आप जाइये, आपका मार्ग कल्याणमय एवं उसका भविष्य मंगलमय हो।'

भगवान् शिवकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके ब्रह्माजी काशीपुरीको गये। काशीका दर्शन करके ब्रह्माजीका मन हर्षोल्लाससे भर गया। वे वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके राजा दिवोदाससे मिले और हाथमें जल और अक्षत लेकर राजाके लिये स्वस्तिवाचन किया। राजाने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। राजा दिवोदासने अभ्युत्थान और आसन आदिके द्वारा मुनिका यथावत् सत्कार किया और उनके शुभागमनका कारण पूछा।

तब ब्राह्मणने कहा—राजन्! मैं बहुत समय पहलेका पुराना हूँ, दीर्घकालसे यहाँ रहता हूँ। तुम मुझे नहीं जानते, परंतु मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारा पहला नाम रिपुंजय है। मैंने सैकड़ों ऐसे राजा देखे हैं जो छहों* शत्रुओंको जीत चुके थे। सुशील, सत्त्वसम्पन्न, वेद-शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्, रणनीतिकुशल, दया और उदारतामें निपुण, सत्यव्रतपरायण, पृथ्वीके समान क्षमाशील तथा समुद्रसे भी अधिक गम्भीर थे। परंतु राजर्षे! तुम्हारे भीतर जो परम पवित्र दो-तीन सद्गुण हैं, वे उन राजाओंमें प्रायः मुझे देखनेको नहीं मिले हैं। तुम प्रजाजनोंको अपने कुटुम्बके लोगोंकी भाँति मानते हो। ब्राह्मण तुम्हारे देवता हैं और तुम बड़े-बड़े तपस्वी लोगोंके तपमें सहायक होते हो। ये बातें जैसी तुम्हारे भीतर हैं, वैसी औरोंमें नहीं देखी जातीं। अतः अन्य राजा तुम्हारे समान नहीं हैं। दिवोदास! तुम अपने सद्गुणोंके कारण धन्य हो, मान्य हो तथा सत्पुरुषोंके द्वारा भी आदरणीय हो। तुम्हारे डरसे देवता भी कुमार्गमें


* काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—ये छः शत्रु हैं। बिना जीते हुए पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसहित मनको भी छः शत्रुओंके समान माना गया है।