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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८४५

गणेशजीका काशीमें जाना और लोकप्रिय होना, गणेशजीका स्तवन

स्कन्दजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा लेकर उनके काशीमें आनेके उपायका विचार करते हुए गणेशजी मन्दराचल पर्वतसे चले और ब्राह्मणका स्वरूप धारण करके काशीपुरीमें जा पहुँचे। वे बूढ़े ज्योतिषी बनकर प्रत्येक घरके भीतर जाते और नगरनिवासियोंको प्रसन्न करते थे। रनिवासमें प्रवेश करके अपनी दिव्य दृष्टिसे देखी हुई वस्तुको बता-बताकर स्त्रियोंके विश्वासपात्र हो गये। एक दिन अवसर पाकर महाराज दिवोदासकी रानी लीलावतीने महाराजसे उनके सम्बन्धमें निवेदन किया—'राजन्! एक बड़े विद्वान् एवं सुवक्ता वृद्ध ब्राह्मण आये हैं, जो अपने गुणोंके कारण बहुत बढ़े-चढ़े हैं। वे वेदोंकी मूर्तिमान् निधि हैं, आपको भी उनका दर्शन करना चाहिये।' राजाने प्रातःकाल उन वृद्ध ब्राह्मणको बुलवाया और भक्तिपूर्वक उत्तम वस्त्र आदि देकर उनका यथावत् सत्कार किया। तदनन्तर एकान्तमें राजाने अपने हृदयमें स्थित प्रश्नको उनसे इस प्रकार पूछा—'ब्रह्मन्! निश्चय ही आप एक श्रेष्ठ द्विज प्रतीत होते हैं। आपकी बुद्धि जिस प्रकार तत्त्वज्ञानसे सम्पन्न है, वैसी दूसरेकी नहीं है, ऐसी मेरी समझ है। इस समय मेरा मन सब कर्मोंसे विरक्त-सा हो रहा है; अतः आप भलीभाँति विचार करके मेरे शुभ भविष्यका वर्णन करें।'

ब्राह्मणने कहा—राजन्! आजके अठारहवें दिन कोई उत्तर दिशाका ब्राह्मण आकर निश्चय ही तुम्हें उपदेश करेगा। तुम्हें बिना विचारे उसके वचनको मानना और उसका पालन करना चाहिये। महामते! ऐसा करनेसे तुम्हारा सब मनोरथ सिद्ध होगा।

ऐसा कहकर राजाकी अनुमति ले वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने आश्रमको चले गये। इस प्रकार विघ्नविजयी गणेशजीने समस्त काशीपुरीको अपने वशमें कर लिया और ऐसा करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य-सा माना। जब दिवोदास काशीके राजा नहीं थे, उस समय गणेशजीके जो-जो स्थान थे, उन-उन स्थानोंको गणेशजीने अनेक रूप धारण करके पुनः सुशोभित किया।

(गणेशजीकी पूजाके पश्चात् इस प्रकार उनकी स्तुति करे—) भक्तोंके विघ्नका निवारण करनेवाले! आपकी जय हो। विघ्नरहित! विघ्नशमन! आपकी जय हो। सम्पूर्ण गणोंके अधीश्वर! आपकी जय हो। समस्त गणोंके अग्रगण्य! आपकी जय हो। गणोंसे अभिवन्दित चरणारविन्दवाले देव! आपकी जय हो। असंख्य सद्गुणोंसे विभूषित गणेश! आपकी जय हो। सर्वव्यापी सर्वेश्वर तथा समस्त बुद्धियोंके एकमात्र निधान! आपकी जय हो। सम्पूर्ण मायाप्रपंचके ज्ञाता तथा सब कर्मोंमें सबसे प्रथम पूजित देव! आपकी जय हो। सब मंगलोंके लिये भी मंगलस्वरूप तथा सर्व-मंगलकारी गणाधीश! आपकी जय हो। अमंगलकी शान्ति करनेवाले तथा मंगलके हेतुभूत देव! आपकी जय हो। सृष्टिकर्ताओंके वन्दनीय! आपकी जय हो। सिद्धिदायक! आपकी जय हो। सम्पूर्ण सिद्धियोंके एकमात्र निवास-स्थान! आपकी जय हो। महाऋद्धि-सिद्धिके सूचक! आपकी जय हो। समस्त गुणोंका निर्माण करनेवाले, गुणोंसे परे तथा गुणोंद्वारा अग्रगण्य गणेश! आपकी जय हो। गुणवर्णित! सर्वबलाधीश्वर तथा इन्द्रको बल प्रदान करनेवाले गणाध्यक्ष! आपकी जय हो। अनन्त महिमाके आधार तथा पर्वतोंको विदीर्ण करनेवाले गणेश! आपकी जय हो। करुणामय! दिव्यमूर्ते! जो आपको नमस्कार करते हैं, वे भूमण्डलमें सम्पूर्ण पापोंके भाजन होकर भी अन्तमें मोक्षके भागी होते हैं। आप सदैव उनके बड़े-बड़े विघ्नों और उपद्रवोंका निवारण करते हैं तथा उन्हें उनकी रुचिके अनुसार स्वर्ग एवं मोक्ष भी देते हैं। विघ्नराज! जो लोग इस पृथ्वीपर क्षणभर भी आपके कृपाकटाक्षके द्वारा देखे जाते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उन श्रेष्ठ पुरुषोंपर भगवती लक्ष्मी अपनी

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कृपादृष्टि करती हैं। प्रणतजनोंके विघ्नका विनाश करनेमें चतुर तथा पार्वतीजीके हृदयकमलको विकसित करनेमें सूर्यस्वरूप गणेश! जो लोग आपकी स्तुति करते हैं, वे इस संसारमें प्रसिद्ध होते हैं। यह कोई अद्भुत बात नहीं है। जो सदा आपके युगल चरणोंकी सेवा करते हैं, वे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और समृद्धिके भागी होते हैं। बहुत-से भृत्य (दास-दासी आदि) उनके चरण-कमलोंकी सेवामें रहते हैं तथा वे राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य निर्मल लक्ष्मीकी प्राप्ति करते हैं। हे परमकारण! आप कारणोंके भी कारण हैं, वेदके विद्वानोंद्वारा सदा एकमात्र आप ही जाननेयोग्य हैं। आप ही वेदवाणीमें अनुसन्धान करनेयोग्य अनिर्वचनीय तत्त्व हैं, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके दिव्य स्वरूपका एक अंश है तथा आप वाणीके अविषय हैं। ढुण्ढिराज विनायक! आप समस्त पुरुषार्थोंको ढूँढ़ चुके हैं, इसलिये आपका नाम 'ढुण्ढि' है। आपको सन्तुष्ट किये बिना कौन देहधारी प्राणी इस काशीमें प्रवेश पा सकता है?


भगवान् विष्णुका काशी-गमन, केशव एवं पादोदकतीर्थकी महिमा, धर्मक्षेत्रमें पुण्य-कीर्तिका उपदेश तथा राजा दिवोदासकी निर्वाणप्राप्ति

**स्कन्दजी कहते हैं—**मुने! जब गणेशजी भी काशीमें आकर विलम्ब करने लगे तब भगवान् शिवने श्रीविष्णुजीकी ओर देखा और बड़े आदरके साथ कहा—'माधव! आप भी वैसा ही न कीजियेगा, जैसा कि पहलेके गये हुए लोगोंने किया है।'

**भगवान् विष्णु बोले—**गिरीश! इस लोकमें मनुष्य जो कुछ भी थोड़ा या अधिक कर्म करता है वह आपके चरणारविन्दोंके चिन्तनसे ही सिद्ध होता है। आपकी भक्तिरूपी सम्पदासे सम्पन्न हुए हमलोगोंका उद्योग प्रायः सफल ही होता है। शिव! अपनी बुद्धि, बल और पुरुषार्थसे जो कार्य अत्यन्त असाध्य होता है वह भी आपके निरन्तर स्मरणसे भलीभाँति सिद्ध हो जाता है। अतः आप अपनेद्वारा निश्चित किये हुए इस कार्यको सिद्ध हुआ ही जानें।

यों कहकर भगवान् विष्णुने शिवजीकी परिक्रमा की और बार-बार उन्हें प्रणाम करके लक्ष्मीजीके साथ मन्दराचलसे प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने गंगा तथा वरणा नदीके संगममें हाथ-पाँव धोकर स्नान किया। पीताम्बरधारी श्रीहरिने पहले कल्याण प्रदान करनेवाले अपने दोनों चरण वहाँ धोये थे, इसलिये तभीसे उस तीर्थका नाम 'पादोदक' तीर्थ हो गया। जो मानव उस पादोदकतीर्थमें स्नान करते हैं, उनके सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ तिल और जलसे तर्पण करके पितरोंका श्राद्ध करेगा वह अपने वंशकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देगा। जिसने पादोदकतीर्थमें स्नान किया है, पादोदकतीर्थके जलको पी लिया है तथा पादोदकतीर्थके जलसे पितरोंका तर्पण किया है, ऐसे मनुष्यको कभी नरक छू भी नहीं सकता। जो पादोदकतीर्थके जलको शंखमें रखकर उसके द्वारा नहलाये हुए गोमतीचक्रसहित श्रीशालग्रामके चरणामृतको पान करता है, वह अमृतपदको प्राप्त होता है।

वहाँ लक्ष्मी और गरुड़के साथ नित्यकर्म करके केशवने अपने हाथसे अपनी ही प्रस्तरमय मूर्ति बनायी और समस्त सिद्धियों तथा समृद्धियोंको देनेवाली उस मूर्तिको स्वयं ही पूजन किया। जो मनुष्य केशव नामसे प्रसिद्ध उस परमेश्वरमूर्तिका भलीभाँति पूजन करता है वह वैकुण्ठधामको अपने घरके आँगनमें ही उतरा हुआ समझे। काशीकी सीमामें वह स्थान श्वेतद्वीप कहलाता है। उस केशवमूर्तिकी सेवा करनेवाले मनुष्य श्वेतद्वीपमें ही निवास करते हैं। केशवके आगे क्षीरसागर नामसे प्रसिद्ध दूसरा तीर्थ है, उसमें स्नान और तर्पण आदि कार्य करनेवाला मनुष्य

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क्षीरसमुद्रके तटपर निवास करता है। वहीं त्रिभुवनवन्दित महालक्ष्मीकी मूर्ति है, उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेवाला मनुष्य कभी रोगी नहीं होता। भगवान् केशव उस मूर्तिमें अपने ही व्यापक स्वरूपको समाविष्ट करके पुनः भगवान् शंकरका कार्य सिद्ध करनेके लिये अंशांशसे बाहर निकले और काशीसे कुछ उत्तर जाकर उन चक्रधारी विष्णुने अपने रहनेके लिये एक स्थान निश्चित किया, जो ‘धर्मक्षेत्र’ (धर्मचक्र स्थान—सारनाथ)—के नामसे प्रसिद्ध है।

तदनन्तर भगवान् लक्ष्मीपतिने परम सुन्दर त्रिभुवन-मोहन रूप धारण किया और गरुड़जी भी अलौकिक रूप धारण करके उनके शिष्य हो गये। वे बड़ी अद्भुत मेधाशक्तिसे सम्पन्न, सब वस्तुओंकी ओरसे निःस्पृह तथा गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाले थे। उन्होंने अपने हाथके अग्रभागमें एक पुस्तक रख ली थी। भगवान्ने अपना नाम पुण्यकीर्ति और गरुड़का नाम विनयकीर्ति रखा। पुण्यकीर्तिने विनयकीर्तिको इस प्रकार उपदेश दिया।

पुण्यकीर्ति बोले—महामते विनयकीर्ते! तुमने जो सनातन धर्मके विषयमें प्रश्न किया है वह सब पूर्णरूपसे बतलाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। इहलोक और परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारके शास्त्रोंका विचार करके महर्षियोंने चार प्रकारके दानोंका उपदेश दिया है। भयभीत पुरुषोंको अभयदान, रोगियोंको औषधदान, विद्यार्थियोंको विद्यादान तथा भूखसे व्याकुल मनुष्योंको अन्नदान देना चाहिये। वासनासहित क्लेशका उच्छेद हो जानेपर विज्ञानकी उपरति (अविद्याकी निवृत्ति) ही मोक्ष है, यह तत्त्वका विचार करनेवाले पुरुषोंको जानना चाहिये। वेदवादियोंके द्वारा यह प्रामाणिक श्रुति पढ़ी जाती है कि ‘मा हिंस्यात्सर्वभूतानि'—किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये।

इस प्रकार पुण्यकीर्तिके धर्मोपदेश करनेपर क्रमशः पुरवासी एक-दूसरेसे सुनकर वहाँ भगवान्के निकट आने लगे। उपदेशका क्रम चालू था—‘जबतक यह शरीर स्वस्थ है, जबतक इन्द्रियोंमें शिथिलता नहीं आती और जबतक बुढ़ापा दूर है, तबतक ही परम आनन्द (मोक्ष)-के लिये साधन कर लेना चाहिये। अस्वस्थता, इन्द्रियोंकी विकलता और वृद्धावस्थामें कैसे सुख हो सकता है। अतः परम सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको याचकोंके लिये अपना शरीर भी दे डालना चाहिये*। शरीर शीघ्र जानेवाला है, सभी संग्रह नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसा समझकर विज्ञ पुरुष इस शरीरके रहते हुए नित्यसुखके लिये साधन करे। अन्तमें यह शरीर कुत्तों और कौओंका भोजन बन जाता है। वेदमें यह सत्य ही कहा गया है कि शरीर अन्तमें भस्म हो जानेवाला है।'

मुने! इधर, विघ्नराज गणेशने दूर रहकर भी शत्रुविजयी राजा दिवोदासके चित्तको राज्यकी ओरसे विरक्त कर दिया। वे अठारह दिनोंकी


* यावत्स्वस्थमिदं वर्म यावन्नेन्द्रियविकलवः। यावज्जरा च दूरेऽस्ति तावत्सौख्यं प्रसाधयेत् ॥
अस्वास्थ्येन्द्रियवैकल्ये वार्धके तु कुतः सुखम्। शरीरमपि दातव्यमर्थिभ्योऽतः सुखेप्सुभिः ॥
(स्क० पु०, का० उ० ५८। १५-१६)

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अवधिको गिनने लगे और मन-ही-मन सोचने लगे कि 'ब्राह्मण देवता कब आयेंगे जो मुझे उपदेश करेंगे।' इस प्रकार अठारहवाँ दिन प्राप्त होनेपर दोपहरके समय वे पुण्यकीर्ति नामवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण ही धर्मक्षेत्रसे राजाके द्वारपर आये। उन्हें दूरसे आते देख उत्कण्ठित हुए नरेशने अपने मनमें मान लिया कि ये मुझे उपदेश देने योग्य गुरु हैं। फिर वे उनके समीप गये और उन्हें बार-बार प्रणाम करके आशीर्वाद ले उन्हें अपने अन्तःपुरमें लिवा ले गये। वहाँ राजाने शास्त्रोक्त विधानसे भलीभाँति उनका पूजन किया और जब वे मार्गकी थकावटसे रहित, स्वस्थ एवं प्रसन्नमुख हो गये तब उन्हें भोजनके लिये नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं। उन्हें ग्रहण करके जब पुण्यकीर्ति पूर्णतः तृप्त हो गये और सुखपूर्वक आसनपर जा बैठे, तब राजाने कहा—'विप्रवर! मैं राज्यका भार ढोते-ढोते बहुत खिन्न हो गया हूँ, अब उसकी ओरसे वैराग्य-सा हो रहा है। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कैसे मुझे शान्ति प्राप्त होगी। यह सब सोचते-विचारते मेरा एक मास व्यतीत हो गया। मैंने अपने सगे पुत्रोंकी भाँति प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन किया है और प्रतिदिन नाना प्रकारके धन देकर ब्राह्मणोंको तृप्त किया है। राज्यशासन करते समय मेरे द्वारा एक ही अपराध हुआ है, वह यह कि मैंने अपने तपोबलके अभिमानसे सम्पूर्ण देवताओंको तिनकेके समान समझा है। यद्यपि प्रजाके उपकारके लिये ही ऐसा किया है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं। यह मैं आपसे शपथ खाकर कहता हूँ, मेरे शासनकालमें कोई भी पापवृत्तिका सेवन नहीं करता, सभी लोग धर्मपरायण और सुखी हैं। सबमें उत्तम विद्याका व्यसन है और सब लोग सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, तथापि मुझे संसारके सभी भोग ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे एक बारके चबाये हुए अन्नको फिरसे चबाना। यह राज्य भी क्या है? पीसे हुएको पीसना। इसे लेकर क्या करना है। विप्रवर! आप ज्ञानी पुरुष हैं, मुझे कोई ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे पुनः गर्भवासका कष्ट न भोगना पड़े। आप जो कुछ कहेंगे, निःसन्देह मैं वही करूँगा। इस समय आपके दर्शनसे मेरी सब इन्द्रियाँ विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गयी हैं और उपरतिका यह उत्तम सुख मुझे प्राप्त हुआ है। इस समय मुझे कोई ऐसा उपाय बताइये जो कर्मबन्धनका नाश करनेमें समर्थ हो।'

**स्कन्दजी कहते हैं—**राजाका ऐसा कथन सुनकर ब्राह्मणवेषधारी श्रीविष्णु बोले—'महाप्राज्ञ! राजशिरोमणे! मुझे जो कुछ उपदेश करना है वह सब तो तुम्हींने कह दिया। तुम तो पहलेसे ही कृतार्थ हो, मुझसे उपदेश लेकर मुझे सम्मान दे रहे हो। तुमने अपनी उत्तम तपस्याके निर्मल जलसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी मलिनताको धो डाला है। भूपाल! तुमने जो कुछ कहा है वह सब सत्य है। तुम्हारे समान राजा इस पृथ्वीपर न हुआ है और न होगा। तुममें जो मुमुक्षा (मुक्तिकी इच्छा) जाग्रत् हुई है वह उचित ही है। तुम्हारे इस राज्यमें अधर्मका प्रवेश भी नहीं हुआ है। धर्मज्ञ! तुम्हारे द्वारा धर्ममें लगायी गयी प्रजाने जो धर्मका अनुष्ठान किया है उससे सम्पूर्ण देवता तृप्त हुए हैं। मेरे हृदयमें तुम्हारा एक ही दोष प्रतीत होता है कि तुमने भगवान् विश्वनाथको काशीसे दूर कर दिया है। मेरी समझमें तुम्हारा सबसे महान् अपराध यही है। इस पापकी शान्तिके लिये मैं तुम्हें बहुत उत्तम उपाय बतलाता हूँ। जिसने भगवान् शिवमें भक्ति रखकर यहाँ काशीमें एक शिवलिंगकी भी स्थापना की है, उसने अपनेसहित सम्पूर्ण जगत्‌की प्रतिष्ठाका पुण्य प्राप्त किया है। इसलिये तुम सर्वथा प्रयत्नपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना करो, इससे कृतार्थ हो जाओगे। दिवोदास! तुम्हारे समीप होनेसे हमलोग भी धन्य-धन्य हो गये हैं। इस मर्त्यलोकमें जो तुम्हारा नाम लेते हैं वे भी परम धन्य हैं। राजन्! तुम्हारा मनोरथरूप महान् वृक्ष आज फलित हुआ है, तुम इसी शरीरसे परम पदको प्राप्त होओगे। भगवान् शिवके लिंगमय विग्रहकी स्थापना कर लेनेपर आजसे सातवें दिन

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एक दिव्य विमान तुम्हें शिवधाममें ले जानेके लिये आयेगा। यह काशीपुरीके भलीभाँति सेवनका फल है।'

यह सब सुनकर प्रतापी राजा दिवोदास बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्राह्मणके चरणोंमें बारंबार प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा—'भगवन्! आपने मुझे संसार-सागरसे पार उतार दिया।' तत्पश्चात् ब्राह्मणवेषधारी विष्णुने भी राजासे पूछकर काशीपुरीका भलीभाँति निरीक्षण करके परम पवित्र पंचनद कुण्ड (पंचगंगा)-को देखा और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके वहीं निवास किया। फिर भगवान् शंकरके शुभागमनकी शीघ्र प्रतीक्षा करते हुए माधवने राजा दिवोदासके वृत्तान्तको जाननेवाले गरुड़जीको वहाँ भेजा।

उधर राजा दिवोदासने भी अपने गुरु विप्रवर पुण्यकीर्तिकी महिमाका बखान करते हुए समस्त प्रजाओं, मन्त्रियों तथा मण्डलेश्वरोंको बुलाया। खजाना, घोड़े और हाथी आदिकी देख-रेखके लिये नियुक्त सब अध्यक्षोंको, अपने पाँच सौ पुत्रोंको, ज्येष्ठ पुत्र समरंजयको, पुरोहित, प्रतीहार, ऋत्विज्, ज्योतिषी, ब्राह्मण, सामन्त, राजकुमार, रसोइये, चिकित्सक तथा नाना कार्योंके लिये आये हुए विदेशी मनुष्योंको भी एकत्र किया। इन सबको हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त राजाने ब्राह्मणकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं और यह भी बताया कि 'सात दिनतक और मुझे इस लोकमें रहना है।' सब लोग विषादवश मुर्झाये हुए मुखसे यह आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुन रहे थे। राजाने स्वयं ही कुमार समरंजयको राजमहलमें ले जाकर उन्हें राजाके पदपर अभिषिक्त किया। फिर नगर और राज्यके लोगोंको भी दान आदिसे प्रसन्न करके पुण्यात्मा राजाने गंगाके पश्चिम तटपर एक विशाल मन्दिर बनवाया। संग्राममें शत्रुओंको जीतकर उन्होंने जितनी सम्पत्ति संग्रह की थी वह सब लगाकर राजाने शिवमन्दिरका निर्माण कराया। राजाकी सम्पूर्ण सम्पत्ति वहाँ लगा दी गयी थी, इसलिये वह शुभ भूमि 'भूपालश्री' नामसे विख्यात हुई। राजा रिपुंजयने दिवोदासेश्वर लिंगकी स्थापना करके अपने-आपको कृतार्थ माना। तदनन्तर एक दिन विधिपूर्वक उस शिवलिंगकी पूजा और वन्दना करके ज्यों ही स्तुति करना प्रारम्भ किया त्यों ही आकाशसे एक दिव्य विमान उतरा जो हाथमें शूल और खट्वांग धारण करनेवाले शिव-पार्षदोंसे घिरा हुआ था। तत्पश्चात् उन पार्षदोंने राजाको दिव्य माला, दिव्य गन्ध, दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत किया और उन्हें शिवधाममें पहुँचा दिया। तबसे वह तीर्थ 'भूपालश्री' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ श्राद्ध आदि करके अपनी शक्तिके अनुसार दान देकर जो दिवोदासेश्वरका दर्शन और भक्तिपूर्वक पूजन करता है तथा राजाकी इस कथाको भी सुनता है वह फिर गर्भमें नहीं आता। जहाँ सब पातकोंका नाश करनेवाली दिवोदासकी कथा होती है वहाँ अनावृष्टि और अकालमृत्युका भय नहीं होता। इस माहात्म्य कथाके पाठसे सबके मनोरथ पूर्ण होंगे।

८५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

धर्मनदतीर्थके पंचनद नाम पड़नेका कारण, अग्निबिन्दुके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति, भगवान्‌के मुखसे पंचनद एवं विन्दुमाधवतीर्थकी महिमाका निरूपण

**अगस्त्यजी बोले—**पार्वतीनन्दन! आपने यह कहा है कि काशी परम पावन है, उसमें भी भगवान् विष्णुने पंचनद (पंचगंगा) तीर्थको बहुत उत्तम जाना। अतः हम जानना चाहते हैं कि उसका नाम पंचनदतीर्थ क्यों हुआ और वह सब तीर्थोंसे बढ़कर परम पावन क्योंकर हुआ? जो निराकार होकर भी साकार हैं, रूपहीन होते हुए भी रूपवान् हैं, अव्यक्त होकर भी व्यक्त हैं, प्रपंचसे परे होकर भी प्रपंचसेवी हैं, अजन्मा होकर भी जिन्होंने अनेक जन्म धारण किये हैं, नामरहित होकर भी स्पष्ट नाम धारण करनेवाले हैं, आलम्बशून्य होकर भी सबके परम आलम्ब हैं, निर्गुण होकर भी सगुणरूपसे प्रकट हैं और इन्द्रियरहित होकर भी इन्द्रियोंके स्वामी हैं तथा बिना पैरके भी सर्वत्र गमन करनेवाले हैं, उन सर्वव्यापी भगवान् जनार्दनके सर्वात्मभावसे परम उत्तम पंचनदतीर्थमें निवास करनेका क्या कारण है?

**स्कन्दजीने कहा—**एक समय काशीमें सूर्यदेवने बड़ी भारी तपस्या की। उस तीर्थमें तपस्या करते हुए मयूखादित्य नामक सूर्यकी किरणोंसे बहुत पसीना प्रकट हुआ। वह महास्वेदकी धारा किरणा नामसे प्रसिद्ध पुण्यमयी नदी बन गयी। फिर वह धूतपापा नदीसे मिली। धूतपापासे मिली हुई किरणा स्नानमात्रसे महापापरूपी घोर अन्धकारका नाश कर देती है। तदनन्तर दिलीपनन्दन भगीरथके साथ भागीरथी गंगा यमुना और सरस्वतीके साथ वहाँ आयीं। इस प्रकार उस तीर्थमें किरणा, धूतपापा, पुण्यसलिला सरस्वती, गंगा और यमुना—ये पाँच नदियाँ मिली हुई बतायी गयी हैं। इसीलिये वह त्रिभुवनविख्यात तीर्थ पंचनद (पंचगंगा)-के नामसे प्रसिद्ध है। उसमें डुबकी लगानेवाला मनुष्य पांचभौतिक शरीर नहीं ग्रहण करता। पाँच नदियोंका यह संगम समस्त पापराशिको विदीर्ण करनेवाला है। इसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्माण्डमण्डलका भेदन करके ऊर्ध्वलोकको चला जाता है। काशीमें पग-पगपर अनेक बड़े-बड़े तीर्थ हैं, किंतु वे पंचनदतीर्थके करोड़वें अंशके समान भी नहीं हैं। पूरे माघभर प्रयाग तीर्थमें भलीभाँति स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह काशीके पंचनदतीर्थमें एक ही दिनके स्नानसे निश्चय ही प्राप्त हो जाता है। पंचनदतीर्थमें स्नान और पितरोंका तर्पण करके भगवान् विन्दुमाधवकी पूजा करनेसे मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जिन्होंने पंचनद नामक शुभ तीर्थमें श्राद्ध किया है, उनके पितर अनेक योनियोंमें गये हों तो भी मुक्त हो जाते हैं। वस्त्रसे छाने हुए पंचगंगाके पुण्यजलसे जो अपने इष्टदेवको स्नान कराता है वह महान् फलका भागी होता है। संतोंको महान् सुख देनेवाले पंचनद तीर्थके जलसे अभिषेक जितना प्रिय है उतना स्वर्गके राज्यपर यदि उनका अभिषेक किया जाय तो वह भी प्रिय नहीं है। सत्ययुगमें इस तीर्थका नाम धर्मनद, त्रेतामें धूतपाप, द्वापरमें विन्दुतीर्थ और कलियुगमें पंचनद कहा गया है। पुण्यमय धर्मनदतीर्थमें विधिपूर्वक अग्निको प्रज्वलित करके यदि उसमें एक भी आहुति दी जाय तो कोटि बार होमका फल मिलता है।

पंचनदतीर्थमें स्थित हुए भगवान् लक्ष्मीपतिने गरुड़को शिवजीके आगे सब वृत्तान्त निवेदन करनेके लिये भेजकर वहाँ एक दुर्बल शरीरवाले तपस्वीको देखा। उस तपस्वी मुनिने निकट आकर भगवान्‌का दर्शन किया। भगवान् लक्ष्मीपति गलेमें धारण की हुई वनमालासे सुशोभित थे। उनके पास ही भगवती लक्ष्मी विराजित थीं। चारों हाथोंमें क्रमशः शंख, पद्म, गदा और चक्र चमक रहे थे। वक्षःस्थल कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हो रहा था। उन्होंने

  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८५१
अपने श्रीअंगमें दिव्य रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था। उनकी अंगकान्ति सुन्दर नील कमलके समान श्याम थी। आकृति अत्यन्त स्निग्ध एवं मधुर प्रतीत होती थी। नाभिकुण्डमें कमल शोभा पा रहा था। ओठ बड़े ही सुन्दर और लाल थे, दाँत अनारके दानोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ थे। उनके किरीटकी द्युतिसे आकाश प्रकाशित हो रहा था, देवराज इन्द्र जिनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, सनक आदि महात्मा जिनकी स्तुति करते हैं, नारद आदि देवर्षियोंने जिनके महान् अभ्युदयका गीत गाया है तथा प्रह्लाद आदि भगवद्भक्त जिनके मनको सदा आनन्दित करते रहते हैं, जिन्होंने शार्ङ्ग नामक धनुषका दण्ड हाथमें ले रखा है, जो इन्द्रियोंके अविषय, निराकार और कैवल्यस्वरूप परब्रह्म हैं, वे ही प्रभु भक्तोंकी भक्तिके कारण यहाँ पुरुषरूपमें प्रकट हुए थे। जिनके उपनिषद्वर्णित स्वरूपको वेद भी नहीं जानते, ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं समझ पाते, उन्हीं भगवान् विष्णुका उन तपस्वी मुनिने अपने नेत्रोंसे प्रत्यक्ष दर्शन किया और आनन्दमें भरकर पृथ्वीपर मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया। उन महर्षिका नाम अग्निविन्दु था। महातपस्वी अग्निविन्दुने मस्तकके समीप अंजलि बाँधकर भगवान् विष्णुका भलीभाँति स्तवन किया।<br><br>अग्निविन्दु बोले-ॐ कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् नारायण! आप बाहर और भीतरको पवित्र करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं। आप अन्तर्यामी पुरुष हैं, आपके दोनों चरण सब प्रकारके द्वन्द्वोंका निवारण करनेवाले हैं। इन्द्रादि देवताओंसे वन्दित विष्णो! आपके उन चरणोंको मैं द्वन्द्व-रहित शान्त बुद्धिसे प्रणाम करता हूँ। बृहस्पतिकी वाणी भी जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पाती, उन भगवान्‌की स्तुति करनेके लिये इसलोकमें कौन समर्थ हो सकता है। परंतु यहाँ भक्ति ही प्रबल है (भगवान् केवल भक्तिसे ही प्रसन्न हो जाते हैं)। जो भगवान् विष्णु पुरातन ब्रह्मा आदिके भी मन-वाणीके अगोचर हैं, उनकी स्तुति मेरे-जैसे अल्पबुद्धि पुरुष कैसे कर सकते हैं। जहाँ वाणीका प्रवेश नहीं है, मन जिनका मनन नहीं कर सकता, जो मन और वाणीसे सर्वथा परे हैं, उन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ होगा। छः अंग, पद और क्रमसहित वेद जिनके निःश्वाससे प्रकट हुए हैं, उन भगवान् विष्णुकी महान् महिमाका यथावत् ज्ञान किनको हो सकता है? जिनकी मन-बुद्धि सदा जाग्रत् रहती हैं, वे सनकादि महर्षि अपने हृदयाकाशमें जिनका निरन्तर ध्यान करते रहनेपर भी उन्हें यथार्थरूपसे उपलब्ध नहीं कर पाते, आबालब्रह्मचारी नारद आदि मुनीश्वर जिनके चरित्रको सदा गाते रहते हैं, तो भी सम्यक्‌रूपसे जिनके तत्त्वका ज्ञान नहीं हो पाता, जो चराचरस्वरूप होकर भी चराचर जगत्‌से सर्वथा भिन्न हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जो अजन्मा, अविकारी, एक, आदिकारण, ब्रह्मा आदिके अगोचर, अजेय, अनन्तशक्ति, निरामय, नित्य, निराकार एवं अचिन्त्यस्वरूप हैं, उन आप परमेश्वरको पूर्णरूपसे कौन जान सकता है? भगवन्, मुरारे, मुकुन्द, मधुसूदन, माधव इत्यादि रूपसे आपके एक-एक नामका भी यदि जप किया जाय तो वह पापियोंके जन्मभरके उपार्जित पापपुंजको उनकी महाविपत्तियोंके साथ हर लेता है और बड़े-बड़े यज्ञोंका महत्त्वपूर्ण फल प्रदान करता है। नारायण, नरकार्णवतारण, दामोदर, मधुसूदन, चतुर्भुज, विश्वम्भर, विरज और जनार्दन इत्यादि नामोंका जप करनेवाले पुरुषोंका इस संसारमें कहाँ जन्म हो सकता है तथा उन्हें कालका भय भी कहाँ प्राप्त हो सकता है *। त्रिविक्रम ! आपकी कान्ति

* एकैकमेव तव नाम हरेन्नुरारे जन्माजिताघमघिनां च महापदाद्यम्।
दद्यात्फलं च महितं महतो मखस्य जप्तं मुकुन्द मधुसूदन माधवेति॥
नारायणेति नरकार्णवतारणेति दामोदरेति मधुहेति चतुर्भुजेति।
विश्वम्भरेति विरजेति जनार्दनेति कास्तीह जन्म जपतां क्व कृतान्तभीतिः॥ (स्क० पु०, का० उ० ६०। ३४-३५)

८५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मेघमालाके समान सुन्दर एवं श्याम है। आपका श्रीअंग विद्युत्‌की भाँति प्रकाशमान पीताम्बरसे आवृत है और आपके नेत्र कमलदलके समान परम सुन्दर हैं। जो लोग आपकी इस छविका अपने हृदयमें सदा चिन्तन करते हैं, वे भी आपकी अचिन्त्य कान्तिको प्राप्त कर लेते हैं। श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित श्रीहरे! अच्युत! कैटभारे! गोविन्द! गरुड़वाहन! केशव! चक्रपाणे! लक्ष्मीपते! दैत्यसूदन! शाङ्गपाणे! आपके प्रति भक्ति रखनेवाले पुरुषोंको कहीं भी भय नहीं प्राप्त होता। कमलनयन! जिनकी जिह्वापर आपका मनोवांछित फल देनेवाला नाम शोभा पाता है, जिनके कानोंमें आपकी कथाके सुमधुर अक्षर पड़ते हैं तथा जिनके हृदयरूपी भित्तिपर आपका स्वरूप अंकित होता है, उनके लिये राजाका पद दुर्लभ नहीं है। प्रभो! ब्रह्माजी आपके युगल चरणारविन्दोंकी वन्दना करते हैं। आप लीलासे ही अनेक प्रकारके लीलामय स्वरूप धारण करते हैं। आप ही क्षणभरमें जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। आप ही विश्व हैं, आप ही विश्वसे परे विश्वनाथ हैं तथा आप ही इस विश्वके बीज (आदिकारण) हैं, मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप ही स्तुति करनेवाले हैं, आप ही स्तुति हैं और आप ही स्तवन करनेयोग्य देवता हैं। इस जगत्‌में जो कुछ है, वह सब एकमात्र आप ही हैं। विष्णो! आपसे भिन्न किसी भी वस्तुको मैं नहीं जानता, आप संसारबन्धनका नाश करनेवाले हैं, सांसारिक विषयोंके प्रति होनेवाली मेरी तृष्णाका सदाके लिये नाश कीजिये।

इस प्रकार भगवान् विष्णुकी स्तुति करके महातपस्वी अग्निविन्दु चुप हो गये। तब वर देनेवाले भगवान् विष्णुने मुनिसे इस प्रकार कहा— 'अग्निविन्दो! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'

अग्निविन्दु बोले—भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगता हूँ कि आप सर्वव्यापी होकर भी समस्त जन्तुओं, विशेषतः मुमुक्षु जीवोंके हितके लिये यहाँ पंचनदतीर्थमें निवास करें। साथ ही मुझे आपके चरणारविन्दोंमें भक्ति प्राप्त हो। इसके सिवा मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता हूँ।

इस प्रकार दूसरोंके उपकारके लिये माँगे हुए अग्निविन्दुके वरको सुनकर भगवान् मधुसूदन बड़े प्रसन्न हुए और बोले—मुनिश्रेष्ठ! तथास्तु, तुम जैसा चाहते हो वैसा ही होगा। मैं काशीपुरीके प्रति भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको मुक्तिमार्गका उपदेश करता हुआ इस तीर्थमें निश्चय ही निवास करूँगा। मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो। मुने! यह काशीपुरी जबतक यहाँ विद्यमान है, तबतक मैं यहाँ रहूँगा।

भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर महामुनि अग्निविन्दु फिर बोले—माधव! इस कल्याणमय पंचनदतीर्थमें मेरे नामसे स्थित होकर आप भक्त और अभक्त सभी जीवोंको सदा मुक्ति प्रदान करें। जो इस पंचनदतीर्थमें स्नान करके यहाँसे जाकर देशान्तरमें भी मृत्युको प्राप्त हों उनको भी आप निश्चय ही मुक्ति दें।

भगवान् विष्णु बोले—मुने! तुमने जो वर

  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * | ८५३ ---|---

माँगा है वह पूर्ण होगा। तुम्हारे नामके आधे भागके साथ और लक्ष्मीजीके नामके साथ मेरा नाम प्रसिद्ध होगा अर्थात् तीनों लोकोंमें विन्दुमाधवके नामसे मेरी ख्याति होगी। मेरा यह नाम काशीमें महान् पापोंका नाश करनेवाला होगा। जो पुण्यात्मा पुरुष इस पुण्यमय पंचनद कुण्डमें सदा मेरी पूजा करेंगे उन्हें संसारका भय कहाँ है। जिनके हृदयमें मुझ पंचनदतीर्थवासी विन्दुमाधवका निवास है, उनके पास सदा धनस्वरूपा लक्ष्मी और मोक्ष-लक्ष्मीका भी वास होता है। अग्निबिन्दो! सब पातकोंका नाश करनेवाला यह श्रेष्ठ तीर्थ तुम्हारे नामसे विन्दुतीर्थ कहलायेगा। जो कार्तिक मासमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सूर्योदयसे पहले ही विन्दुतीर्थमें स्नान करेगा उसे यमराजसे कहाँ भय है। मनुष्य मोहवश सहस्रों पाप करके भी यदि कार्तिकमें धर्मनदतीर्थमें स्नान कर लेता है तो क्षणभरमें पापहीन हो जाता है। यह शरीर अपवित्र मल-मूत्र आदिका भण्डार है। इसका एकभक्तव्रत, नक्तव्रत, अयाचितव्रत तथा उपवासव्रतके द्वारा भलीभाँति शोधन करना चाहिये। जो मनुष्य मेरे आगे उज्ज्वल बत्तीके साथ दीप जलाता है वह चराचर जीवोंसहित समस्त त्रिलोकीको अपने लिये प्रकाशमय देखता है। जो कार्तिकमें पंचामृतके कलशोंसे मुझको स्नान कराता है वह पुण्यात्मा एक कल्पतक क्षीरसागरके तटपर निवास करता है। जो मेरी भक्ति करते हुए भी भगवान् विश्वनाथसे द्वेष करते हैं उन्हें मेरा ही द्वेषी जानना चाहिये। वे पिशाचपदको प्राप्त होते हैं। कालभैरवके शासनसे पिशाचयोनिको प्राप्त होकर वे तीस हजार वर्षोंतक दुःखके सागरमें डूबे रहते हैं। तदनन्तर विश्वनाथजीकी कृपासे ही उन्हें मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो अधम मनुष्य मनसे भी भगवान् विश्वनाथसे द्वेष रखते हैं, वे काशीसे अन्यत्र मृत्युको प्राप्त होकर सदा अन्धतामिस्र नरकमें निवास करते हैं। मुने! यह काशीपुरी भगवान् पशुपति (शिव) अथवा शिवभक्तोंकी निवासस्थली है। अतः यहाँ परम कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदा भगवान् शिवकी सेवा करनी चाहिये। महामुने! प्रथम तो यह आनन्दकानन ही परम पवित्र है, उसमें भी पंचनदतीर्थ अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा अधिक पवित्र है और वहाँ भी मेरा सान्निध्य होना उससे भी अधिक पुण्यमय है। इसी अनुमानसे तुम पंचनद-तीर्थकी महिमा सब तीर्थोंसे अधिक उत्तम जानो। पंचनदके इस माहात्म्यको सुनकर बुद्धिमान् मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है।

भगवान् विष्णुके मुखसे यह वचन सुनकर महामुनि अग्निबिन्दुने श्रीविन्दुमाधवके चरणोंमें प्रणाम करके पुनः पूछा—‘भगवन्! काशीमें आपके जितने स्वरूप हैं, उनका वर्णन कीजिये।’



## भगवान् विष्णुद्वारा अपने आदिकेशव प्रभृति स्वरूपोंका वर्णन तथा अग्निबिन्दुकी मुक्ति

श्रीविन्दुमाधवजी बोले—अग्निबिन्दो! पहले तो पादोदकतीर्थमें मैं आदिकेशवके नामसे निवास करता हूँ, ऐसा जानो। पादोदकतीर्थसे दक्षिणमें जो श्वेतद्वीप नामक परम महान् तीर्थ है वहाँ मैं ज्ञानकेशवके नामसे रहकर मनुष्योंको ज्ञान प्रदान करता हूँ। तार्क्ष्यतीर्थमें मैं ही तार्क्ष्यकेशवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। वहीं नारदतीर्थमें मैं नारदकेशव कहलाता हूँ। वहीं प्रह्लादतीर्थ भी है, जहाँ मैं प्रह्लादकेशवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। भक्त पुरुषोंको वहाँ मेरे स्वरूपकी भलीभाँति आराधना करनी चाहिये। अम्बरीषतीर्थमें मेरा नाम आदित्यकेशव है। दत्तात्रेयेश्वरसे दक्षिण मेरा नाम आदिगदाधर है। वहीं भार्गवतीर्थमें मैं भृगुकेशवके नामसे विख्यात हूँ। वामन नामक मंगलकारी महातीर्थमें मैं वामनकेशव हूँ। नरनारायणतीर्थमें मैं नर-नारायणस्वरूप हूँ। यज्ञवाराह नामक तीर्थमें मेरा

८५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नाम यज्ञवाराह है। विदारनारसिंह नामवाले तीर्थमें मैं विदारनारसिंह नामसे ही सेवन करने योग्य हूँ। गोपीगोविन्द नामक तीर्थमें मैं गोपीगोविन्द नामसे ही प्रसिद्ध हूँ। लक्ष्मीनृसिंह नामवाले पावन तीर्थमें मैं लक्ष्मीनृसिंह हूँ। पापहारी शेषतीर्थमें मैं शेषमाधव हूँ। शंखमाधवतीर्थमें मेरा नाम शंखमाधव है। हयग्रीव महातीर्थमें हयग्रीवकेशव नामसे मेरी प्रसिद्धि है। वृद्धिकालेश्वरसे पश्चिम मैं भीष्मकेशव नामसे प्रसिद्ध हूँ। लोलार्कसे उत्तर भागमें मेरा नाम निर्वाणकेशव है। त्रिपुरसुन्दरी देवीसे दक्षिण भागमें जो त्रिभुवनकेशव नामसे मेरी पूजा करेगा वह फिर कभी गर्भमें नहीं आवेगा। ज्ञानवापीके पूर्वभागमें मैं ज्ञानमाधवके नामसे प्रसिद्ध हूँ। विशालाक्षी देवीके समीप मैं श्वेतमाधवके नामसे स्थित हूँ। दशाश्वमेधसे उत्तरमें स्थित मुझ प्रयागमाधवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

इस प्रकार जब भगवान् विन्दुमाधव अग्निविन्दु मुनिको काशीमें स्थित अपने विभिन्न स्वरूपोंका परिचय देते हुए माहात्म्य-कथा सुना रहे थे, उसी समय उन्हें गरुड़जी दिखायी दिये। गरुड़ने भगवान्को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीके शुभागमनकी सूचना दी।

भगवान्ने पूछा—महादेवजी कहाँ हैं?

गरुड़ बोले—जिसकी ध्वजापर महान् वृषभका चिह्न शोभा पाता है तथा जिसके रत्नमय ध्वजकी प्रभा इस पृथ्वी और आकाशको परिपूर्ण किये दे रही है, वह यह महादेवजीका रथ आ रहा है। उसका प्रत्यक्ष दर्शन कीजिये। तब श्रीहरिने भगवान् त्रिलोचनके वृषभ-ध्वजका दर्शन करके उसे दूरसे ही प्रणाम किया और अग्निविन्दु मुनिसे कहा—'मुने! तुम अपने दाहिने हाथसे इस सुदर्शनचक्रका स्पर्श कर लो।' भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर उन्होंने ज्यों ही सुदर्शनका स्पर्श किया त्यों ही श्रीहरिके महान् अनुग्रहसे वे 'सुदर्शन' हो गये।

स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! फिर अग्निविन्दु मुनि ज्योतिःस्वरूप होकर भगवान् विन्दुमाधवकी सेवाके प्रभावसे उनकी दिव्य चिन्मय ज्योतिस्स्वरूपा कौस्तुभमणिमें मिलकर एकीभूत हो गये। जिन्होंने विन्दुमाधवके चरणारविन्दोंमें अपने चित्तको चंचरीककी भाँति लगा रखा है, वे भी अग्निविन्दु की भाँति निश्चय ही भगवत्स्वरूपको प्राप्त होते हैं। इसलिये सदा काशीमें निवास, श्रीविन्दुमाधवका दर्शन और इस माहात्म्य-कथाका श्रवण करना चाहिये तथा ऐसा करके लौकिक गतिपर विजय पानी चाहिये। पंचनदकी उत्पत्ति-कथा पुण्यमयी है। भगवान् विन्दुमाधवकी कथा भी परम पवित्र है और काशीका निवास भी अतिशय पुण्यजनक है—ये तीनों बातें पुण्यात्माओंको ही सुलभ हैं।

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भगवान् शिवका स्वागत या वृषभध्वजतीर्थकी महिमा तथा शिवका काशीपुरीमें प्रवेश

स्कन्दजी कहते हैं—तदनन्तर श्रीहरि ब्रह्माजीको आगे करके भगवान् शंकरकी अगवानीके लिये आगे बढ़े। देवाधिदेव भगवान् वृषभध्वजको देखकर श्रीविष्णुने उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् फलसहित भीगे अक्षतोंको दिखाते हुए ब्रह्माजीने स्वस्तिवाचनके लिये हाथ ऊँचे करके रुद्रसूक्तोंसे भगवान् शिवका स्तवन किया। श्रीगणेशजीने उनके चरणारविन्दोंमें मस्तक रखकर शीघ्रतापूर्वक नमस्कार किया। तब महादेवजीने हर्षमें भरकर गणेशजीका मस्तक सूंघा और उन्हें हृदयसे लगाकर अपने आसनपर बिठा लिया। सोम और नन्दी आदि गणोंने साष्टांग प्रणाम किया। योगिनियोंने भी महेश्वरको प्रणाम करके मंगलगान किया। तत्पश्चात् सूर्यदेवने शिवजीको नमस्कार किया। चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवने श्रीहरिको अपने सिंहासनके समीप ही वामभागमें बड़े आदरके साथ बिठाया और ब्रह्माजीको

  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८५५

अपने दक्षिण भागमें आसन दिया। प्रणाम करनेवाले अन्य सब गणोंको भी दृष्टिपात करके सम्मानित किया। मस्तक हिलाकर योगिनियोंको भी प्रसन्न किया और हाथके इशारेसे सूर्यदेवको सन्तुष्ट किया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने दोनों हाथ जोड़कर कहा—'देवदेवेश्वर ! गिरिजापते ! मैं काशी आनेके बाद जो पुनः आपकी सेवामें नहीं पहुँचा, मेरे इस अपराधको आप क्षमा करेंगे। आलस्य छोड़कर पुण्यके पथपर चलनेवाले धर्मात्मा राजा दिवोदासके प्रति कौन किंचिन्मात्र भी विरुद्धभाव धारण कर सकता है।'

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर शिवजीने हँसते हुए कहा—ब्रह्मन् ! मैं सब कुछ जानता हूँ। आप यहाँ आकर पहले ब्राह्मण बने। आप ब्राह्मण तो हैं ही, अतः यहाँ भी ब्राह्मण बनना आपके लिये दोषकी बात नहीं है। ब्राह्मण बनकर भी आपने जो दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया, यह और भी उत्तम है। इसके सिवा आपने मेरे स्वरूपकी स्थापना करके अपना परम हित किया है।

देवेश्वर भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर योगिनियोंने भी परस्पर एक-दूसरेका मुँह देखकर भीतर-ही-भीतर सन्तोषकी साँस ली। तत्पश्चात् चराचर जगत्को देखनेवाले सूर्यदेवने भी अवसर जानकर भगवान् शिवसे कहा—'नाथ ! आपके समीपसे काशी आकर मैंने यथाशक्ति उपाय किया, किंतु कुछ भी करनेमें सफल न हो सका। राजा दिवोदास स्वधर्मका पालन करनेवाले थे। उनके होते हुए भी आपका यहाँ आगमन निश्चित है, ऐसा जानकर मैं यहीं ठहरा हुआ हूँ। आज श्रीचरणोंके दर्शनसे मेरा मनोरथरूपी वृक्ष फलित हुआ है।' सूर्यका यह वचन सुनकर महादेवजीने कहा—'भास्कर ! राजा दिवोदासके शासनकालमें यहाँ देवताओंका प्रवेश नहीं होता था, तो भी तुम इस पुरीमें आकर जो ठहर गये, इससे मेरा ही कार्य सिद्ध हुआ है।' इस प्रकार सूर्यको आश्वासन देकर कृपानिधान महादेवजीने योगिनियोंको भी उत्तम दृष्टिसे देखकर प्रसन्न किया। इसके बाद उन्होंने चक्रधारी भगवान् विष्णुकी ओर देखा। महामना श्रीहरिने सर्वज्ञ शिवजीके आगे स्वयं कुछ भी नहीं कहा। भगवान् शिव गरुड़के मुखसे गणेशजी और श्रीविष्णुका वृत्तान्त सुन चुके थे। अतः वे मन-ही-मन इनपर बहुत प्रसन्न हुए, वाणीसे कुछ भी नहीं कहा।

इसी समय गोलोकसे पाँच गौएँ आयीं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—सुनन्दा, सुमना, सुशीला, सुरभि और कपिला। ये सब पापोंका नाश करनेवाली थीं। भगवान् शिवजीके प्रति वात्सल्यस्नेहके कारण उनके स्तनोंसे दूध चूने लगे। उनके स्तनरूपी मेघ दूधकी धारा बरसाने लगे और तबतक बरसाते रहे जबतक कि एक सरोवर भर नहीं गया। पार्श्ववर्ती लोगोंने देखा एक कुण्ड भर गया। भगवान् शंकरके अधिष्ठानसे वह एक उत्तम तीर्थ हो गया। महेश्वरने उसका नाम कपिला कुण्ड रखा। तदनन्तर महादेवजीकी आज्ञासे सब देवताओंने उसमें स्नान किया। तत्पश्चात् उस तीर्थसे दिव्य पितर प्रकट हुए, उन्हें देखकर सब देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका तर्पण किया। अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप और सोमप आदि दिव्य पितरोंने तृप्त होकर शंकरजीसे निवेदन किया—'देवदेव जगन्नाथ ! आप भक्तोंको अभय देनेवाले हैं। आपके समीप होनेसे इस तीर्थमें हमें अक्षय तृप्ति प्राप्त हुई है, इसलिये आप प्रसन्नचित्तसे वरदान दीजिये।' दिव्य पितरोंका यह वचन सुनकर शिवजीने कहा—'कपिला गौके दूधसे भरे हुए इस कापिलेयतीर्थमें जो श्रद्धापूर्वक पिण्डदान एवं श्राद्ध करेंगे उनके पितरोंको मेरी आज्ञासे पूर्ण तृप्ति होगी। अमावास्या और सोमवारके योगमें यहाँ दिया हुआ श्राद्धका दान अक्षय होगा। प्रलयकाल आनेपर समुद्र और उसके जल नष्ट हो जाते हैं, परंतु अमावास्या तथा सोमवारके योगमें किया हुआ यहाँका श्राद्ध कभी क्षीण नहीं होगा। गदाधर और ब्रह्माजी ! आपलोग जहाँ विराजमान हैं तथा जहाँ मेरी भी स्थिति है वहाँ फल्गु नदी निःसन्देह विद्यमान है। पितरो ! इस तीर्थके जो जो नाम आपलोगोंको तृप्ति देनेवाले हैं उनका परिचय देता हूँ। इसका प्रथम नाम मधुस्रवा है, दूसरा नाम कृतकृत्या

८५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है, तीसरा नाम क्षीरसागर है। इसके सिवा वृषभध्वजतीर्थ, पितामहतीर्थ, गदाधरतीर्थ और पितृतीर्थ आदि नाम हैं। इतना ही नहीं—कपिलधारा, सुधाखनि और शिवगया नामसे भी इस शुभ तीर्थको जानना चाहिये। पितरो! इस तीर्थके ये दस नाम बिना श्राद्ध और तर्पणके भी आपलोगोंको तृप्ति देनेवाले हैं। जो लोग पितरोंको तृप्त करनेकी इच्छा लेकर सूर्य-चन्द्रमाके संगम (अमावस्या)-के अवसरपर यहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करावेंगे उनके द्वारा किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होगा। जो पितरोंकी तृप्तिके लिये यहाँ श्राद्धमें कपिला गौका दान करेंगे उनके पितर क्षीरसागरके तटपर निवास करेंगे। जिन्होंने इस वृषभध्वजतीर्थमें वृषोत्सर्ग किया है उन्होंने अपने पितरोंको अश्वमेध यज्ञके पुरोडाशसे तृप्त कर दिया। पिताके गोत्रमें और माताके पक्षमें जो लोग मरे हैं उनको यहाँ किया हुआ पिण्डदान अक्षय तृप्ति देनेवाला होता है। पत्नीवर्ग अथवा मित्रवर्गमें जो लोग मृत्युको प्राप्त हुए हैं वे भी वृषभध्वजतीर्थमें तर्पण करनेपर तृप्तिको प्राप्त होते हैं। जिनका वृषभध्वजतीर्थमें तर्पण किया गया है वे सब पितर ब्रह्मलोकको चले जाते हैं। यह तीर्थ सत्ययुगमें दूधसे भरा रहता है, त्रेतामें मधुसे पूर्ण होता है, द्वापरमें घीसे भरा होता है और कलियुगमें जलसे परिपूर्ण रहता है। यद्यपि यह शुभ तीर्थ काशीकी सीमासे बाहर है, तो भी यहाँ मेरा सामीप्य होनेके कारण इसे काशीपुरीके भीतर ही जानना चाहिये। काशीनिवासियोंने यहाँ मेरे वृषचिह्नयुक्त ध्वजका दर्शन किया है, इसलिये मैं इस तीर्थमें 'वृषभध्वज' नामसे निवास करूँगा। पितरो ! मैं तुम्हारे सन्तोषके लिये यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा अपने पार्षदोंके साथ निवास करूँगा।'

इस प्रकार शिवजी पितरोंको वरदान दे रहे थे, इतनेहीमें नन्दिकेश्वरने निवेदन किया—प्रभो! रथ सुसज्जित होकर तैयार है, अतः अब श्रीचरणोंकी विजययात्रा प्रारम्भ हो। तब आठ मातृकाओंने भगवान् शिवकी आरती उतारी और भगवान् विश्वनाथ श्रीहरिसे हाथ मिलाये हुए उठकर खड़े हुए। उस समय दिव्य वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिसे पृथ्वीसे लेकर आकाशतक गूँज उठा। देवियोंके मंगलगीत और चारणोंद्वारा की हुई स्तुतिके शब्दोंसे वह तुमुलनाद और भी बढ़ गया था। तैंतीस करोड़ देवता, बीस करोड़ शिवगण, नौ करोड़ चामुण्डा, एक करोड़ भैरवी तथा आठ करोड़ मेरे (स्कन्दके) महाबली अनुचर, जो छः मुखोंसे सुशोभित और मयूरके वाहनपर आरूढ़ थे, आये। चमकता हुआ फरसा हाथमें लिये सात करोड़ गणेशके गण उपस्थित हुए जो महावेगवान्, तोंदवाले, हाथीके-से मुखवाले तथा विघ्नविनाशक थे। छियासी हजार ब्रह्मवादी मुनि और इतने ही गृहस्थ भी वहाँ आये। तीन करोड़ पातालनिवासी नाग, दो-दो करोड़ शिवभक्त दानव और दैत्य, आठ लाख गन्धर्व, पचास लाख यक्ष और राक्षस, दो लाख दस हजार विद्याधर, साठ हजार सुन्दरी दिव्य अप्सराएँ, आठ लाख गोमाताएँ, साठ हजार गरुड़, नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट देनेवाले सात समुद्र, तिरपन हजार नदियाँ, आठ हजार पर्वत, तीन सौ वनस्पतियाँ और आठों दिग्गज—ये सब लोग उस स्थानपर उपस्थित हुए जहाँ पिनाकपाणि महादेवजी विराजमान थे। इन सबके साथ परम सन्तुष्ट भगवान् शिवने इधर-उधरसे अपनी स्तुति सुनते हुए रथपर आरूढ़ हो उत्तम काशीपुरीमें प्रवेश किया। उनके साथ गिरिराजनन्दिनी उमा भी थीं।

स्कन्दजी कहते हैं—यह परम उत्तम उपाख्यान कोटि जन्मोंका पाप नष्ट करनेवाला है। इसका पाठ करके अथवा ब्राह्मणद्वारा कराकर मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो इस आख्यानका प्रसन्नतापूर्वक पाठ करके नूतन गृहमें प्रवेश करता है वह सब प्रकारके सुखका निकेतन बन जाता है। यह उत्तम उपाख्यान तीनों लोकोंके लिये आनन्दजनक है। इसके श्रवणमात्रसे भगवान् विश्वनाथ प्रसन्न होते हैं।

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* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८५७


जैगीषव्यपर भगवान् शिवकी कृपा और उनके द्वारा शिवकी स्तुति

अगस्त्यजी कहते हैं—भगवन् ! काशीपुरीका दर्शन करके त्रिपुरारि भगवान् शिवने क्या किया ?

स्कन्दजी बोले—अगस्त्य ! सर्वज्ञ नाथ भक्त-वत्सल भगवान् शिवने काशीपुरीको देखनेके पश्चात् सबसे प्रथम किसी गुहामें बैठे हुए जैगीषव्य-मुनिको दर्शन दिया। जिस दिन भगवान् शिव काशी छोड़कर मन्दराचल गये उसी दिनसे जैगीषव्य-मुनिने यह दृढ़ नियम कर लिया था कि 'जब मैं पुनः यहाँ भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका दर्शन करूँगा तभी एक बूँद जल भी मुँहमें डालूँगा।' किसी अद्भुत धारणाशक्तिसे अथवा भगवान् शंकरके अनुग्रहसे अन्न-जल त्याग देनेपर भी जैगीषव्य-मुनि वहाँ जीवित रहे। इस बातको केवल भगवान् शंकर जानते थे, दूसरा कोई नहीं। इसीलिए भगवान् विश्वनाथ सबसे पहले वहीं गये और नन्दीश्वरको सम्बोधित करके सब देवताओंके सुनते हुए इस प्रकार बोले—'शिलादपुत्र ! यहाँ बड़ी मनोहर गुफा है, तुम शीघ्र इसके भीतर प्रवेश करो। इसके भीतर मेरे भक्त तपोधन जैगीषव्यमुनि रहते हैं, जिन्होंने मेरे दर्शनके लिये दृढ़तापूर्वक कठोर व्रत धारण किया है। उनको गुफासे बाहर ले आओ। जब मैं मन्दराचल पर्वतपर गया था तबसे लेकर आजतक उन्होंने आहार त्यागकर बड़े भारी नियमका पालन किया है। यह लीलाकमल ले लो, यह अमृतके समान पोषण करनेवाला है, इससे उनके अंगोंका स्पर्श करा दो।' तब नन्दी देवदेवेश्वर महादेवजीको प्रणाम करके वह लीलाकमल हाथमें ले गुफाके भीतर गये और वहाँ धारणामें दृढ़तापूर्वक चित्तको लगाये हुए तपस्याकी अग्निसे सूखे अंगोंवाले मुनिको देखकर उन्होंने उनके शरीरसे कमलका स्पर्श करा दिया। उस कमलका स्पर्श होते ही योगीश्वर जैगीषव्य उल्लसित हो उठे। तदनन्तर नन्दी उन मुनीश्वरको लेकर शीघ्र आये और देवाधिदेव महादेवके चरणोंके आगे नमस्कारपूर्वक डाल दिया। अपने आगे भगवान् शंकरको देखकर वे हर्षसे फूल उठे। शंकरजीके वामांगमें गिरिराज-नन्दिनी पार्वती भी थीं। जैगीषव्यने भगवान्‌के आगे भूमिपर सब ओर लोटकर साष्टांग प्रणाम किया और अतिशय भक्ति पूर्वक उनकी स्तुति प्रारम्भ की।

जैगीषव्य बोले—शान्त, सर्वज्ञ एवं शुभस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। जगत्‌के आनन्दका मूलस्थान तथा परमानन्दकी प्राप्तिके हेतुभूत महादेवजीको नमस्कार है। प्रभो ! आप ही स्थावर और जंगमरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। सर्वात्मन् ! आपको नमस्कार है। परमात्मन् ! आपको नमस्कार है। आप शेषनागका भुजबन्द धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके आधे शरीरमें शक्तिस्वरूपा पार्वतीका निवास है, आपको नमस्कार है। आप शरीररहित तथा सुन्दर शरीरसे

८५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


सम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। एक बार प्रणाम करनेमात्रसे देहधारी जीवोंके देहरूपी बन्धनका निवारण करनेवाले आपको नमस्कार है। खण्डपरशो! अर्धचन्द्रको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। स्कन्दकी उत्पत्तिके स्थान आप गौरीपति गिरीशको नमस्कार है। चन्द्रार्धरूप शुद्ध आभूषणवाले तथा सूर्य-चन्द्र एवं अग्निरूप नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण दिशाएँ आपके लिये वस्त्ररूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी, जीर्ण (पुरातन) जरा और जन्मका कष्ट हर लेनेवाले, जीवोंको जीवन देनेवाले तथा पाप आदिका अपहरण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके एक हाथमें डमरू और दूसरे हाथमें धनुष है, आपको नमस्कार है। समस्त जगत्‌के लोचनरूप आप भगवान्‌ त्रिलोचनको नमस्कार है। गंगाधर! आपको नमस्कार है। आप तीन वेदस्वरूप, सदा सन्तुष्ट रहनेवाले और भक्तोंको सन्तोष देनेवाले हैं। आप जगत्‌के उद्धारकी दीक्षासे युक्त हैं, आप देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है। सम्पूर्ण पापोंको विदीर्ण करनेवाले, दीर्घदर्शी, प्रपंचसे दूर रहनेवाले तथा सम्पूर्ण दोषोंका दलन करनेवाले आप परम दुर्लभ देवको नमस्कार है। आप चन्द्रमाकी कलाको धारण करनेवाले तथा दोषोंके संग्रहका सर्वथा त्याग करनेवाले हैं। धतूरका फूल आपको अधिक प्रिय है, प्रभो! मस्तकपर जटाभार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप धीर, धर्मस्वरूप तथा धर्मके रक्षक हैं। नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। जो आपके नामोंका स्मरणमात्र करते हैं, उनके लिये आप तीनों लोकोंका ऐश्वर्य भर देते हैं। आप प्रमथगणोंके अधिपति तथा अपने एक हाथमें सदा पिनाक उठाये रहनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। संसारी जीवोंके अज्ञानमय बन्धनको खोलनेवाले आप भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। अपने नामका उच्चारण करनेमात्रसे बड़े-बड़े पातकोंको हर लेनेवाले आपको नमस्कार है। आप परसे भी परे, सबको पार उतारनेवाले, कार्य और कारणसे भी परे, अनन्त चरित्रवाले तथा परम पवित्र कथावाले हैं, आपको नमस्कार है। आप वामदेव हैं, अपने आधे अंगमें नारीस्वरूपको धारण करते हैं तथा धर्मस्वरूप वृषभपर यात्रा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। प्रणतजनोंके भयका निवारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा संसार-बन्धनका नाश करनेवाले हैं, आप ही सम्पूर्ण भूतोंका पालन करनेवाले पति हैं, आपको नमस्कार है। महादेव! आपको नमस्कार है। महेश्वर! तेजोंके स्वामी! आपको नमस्कार है। आप पार्वतीके पति और मृत्युंजय हैं, आपको नमस्कार है। आप दक्षके यज्ञका नाश करनेवाले और यक्षराज कुबेरके प्रिय हैं, आपको नमस्कार है। आप बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले, यज्ञस्वरूप तथा यज्ञोंके फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप रुद्रस्वरूप, रुद्रपति तथा कुत्सित रोदनकारी कष्टको दूर करनेवाले हैं। आप भक्तोंके हृदयमें रमण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप त्रिशूलधारी, सनातन ईश्वर, श्मशानभूमिमें विहार करनेवाले, सर्वस्वरूप तथा सर्वज्ञ हैं, भगवती पार्वतीके प्रियतम! आपको नमस्कार है। आप सबका कष्ट हरनेवाले क्षमास्वरूप और क्षेत्रज्ञ हैं। क्षमाशील महेश्वर! आप सब कुछ करनेमें समर्थ, पृथ्वीका संहार करनेवाले तथा दूधके समान गौर हैं, आपको नमस्कार है। अन्धकासुरके शत्रु आपको नमस्कार है। आदि-अन्तसे रहित आप परमेश्वरको नमस्कार है। आप पृथ्वीके आधार, ईश्वर तथा इन्द्र और उपेन्द्र आदि देवताओं-द्वारा प्रशंसित हैं, आप उमाकान्त, उग्र और ऊर्ध्वरेताको नमस्कार है। आप एक रूप, अद्वितीय तथा महान् ऐश्वर्य-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्तकर्ता तथा पार्वतीके पति हैं, आपको नमस्कार है। आप ही ॐकार, वषट्कार, भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोक हैं। उमापते! इस जगत्में दृश्य और अदृश्य जो कुछ भी है, वह सब आप ही हैं। देव! मैं स्तुति करना नहीं जानता। महेश्वर! आप

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ही शब्द हैं, आप ही अर्थ हैं और आप ही वाणी हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। महादेव! मैं आपसे भिन्न और किसी ईश्वरको नहीं जानता। दूसरेका नाम लेनेमें गूँगा हूँ, दूसरेकी कथा सुननेमें बहरा हूँ, दूसरेके समीप जानेमें पंगु हूँ और अन्य किसी देवताका दर्शन करनेमें अन्धा हूँ। एकमात्र आप ही ईश्वर हैं, आप ही कर्ता हैं तथा आप ही पालन और संहार करनेवाले हैं। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भिन्न-भिन्न देवता हैं, यह भेद-भाव मूर्खोकी कल्पनामात्र है। अतः एकमात्र आप ही बार-बार मेरे लिये शरण हैं। महेश्वर! मैं संसार-समुद्रमें डूबा हूँ, मेरा उद्धार कीजिये।

इस प्रकार महेश्वरकी स्तुति करके महामुनि जैगीषव्य उनके सामने ठूँठकी तरह अविचल और मौन हो गये। मुनिद्वारा की हुई इस स्तुतिको सुनकर चन्द्रमौलि भगवान् शिवने प्रसन्न होकर कहा—'मुने! तुम कोई वर माँगो।'

जैगीषव्य बोले—देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यही वर दीजिये कि मैं आपके चरणारविन्दोंसे कभी दूर न होऊँ और दूसरा वर मुझे यह देनेकी कृपा करें कि मैंने जो शिवलिंगकी स्थापना की है, उसमें आप सदा ही स्थित रहें।

महादेवजीने कहा—महाभाग जैगीषव्य! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब तुम्हारी इच्छाके अनुसार पूर्ण हो। इसके सिवा मैं तुम्हें दूसरा वर और देता हूँ—मोक्षके साधनभूत योगशास्त्र मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। तुम सब योगियोंके मध्य योगाचार्यरूपसे प्रसिद्ध होओ। तपोधन! तुम मेरी कृपासे योगविद्याका यथावत् रहस्य जान लोगे, जिसके द्वारा तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति होगी। जिस प्रकार नन्दी, भृंगी और सोमनन्दी मेरे भक्त हैं, उसी प्रकार तुम भी मेरे जरा-मृत्युसे रहित भक्त होओगे। तुम सदा मेरे चरणोंके समीप निवास करोगे और वहीं तुम्हें मोक्षलक्ष्मीकी प्राप्ति होगी। काशीमें जैगीषव्येश्वर नामक शिवलिंग परम दुर्लभ होगा। तीन वर्षोतक उसका सेवन करके मनुष्य योगकी प्राप्ति कर सकता है, इसमें संशय नहीं। जैगीषव्य-गुहामें जाकर योगाभ्यास करनेवाला मनुष्य मेरी कृपासे छः महीनेमें मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर सकता है। तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग ज्येष्ठेश्वर क्षेत्रमें सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला होगा तथा दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेपर सम्पूर्ण पापराशिका विनाश करेगा। जैगीषव्य! तुमने जो यह स्तवन किया है, यह बहुत उत्तम और योगसिद्धिमें सहायक है। यह बड़े-बड़े पापोंका नाशक, महान् पुण्यकी वृद्धि करनेवाला, महान् भयकी शान्ति और महाभक्तिकी वृद्धि करनेवाला है। इस स्तोत्रका जप करनेसे मनुष्योंके लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। अतः उत्तम साधकोंको सर्वथा प्रयत्न करके इस स्तोत्रका जप करना चाहिये।

इस प्रकार जैगीषव्यको वर देकर महादेवजीने उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले ब्राह्मणोंको देखा।


## काशीके ब्राह्मणोंको भगवान् शिवका वरदान तथा काशी क्षेत्रकी महिमा

अगस्त्यजीने पूछा—षडानन! ब्राह्मणोंको देखकर भगवान् शंकरने उनसे क्या कहा?

स्कन्दजी बोले—अगस्त्य! जब ब्रह्माजीके गौरवकी रक्षाके लिये महादेवजी मन्दराचलको चले गये, तब वहाँके क्षेत्रसंन्यासी पापहीन ब्राह्मण निराश्रय हो गये। उन्होंने उस महाक्षेत्रमें प्रतिग्रह लेना सदाके लिये बंद कर दिया और अपने दण्डोंके अग्रभागसे भूमि खोद-खोदकर कन्द-मूल आदिसे वे जीवननिर्वाह करने लगे। इस प्रकार धरती खोद-खोदकर उन्होंने एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी तैयार कर दी। उसका नाम हुआ 'दण्डखात' तीर्थ। उस तीर्थके चारों ओर

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उन्होंने अनेक बड़े-बड़े शिवलिंग स्थापित किये और भगवान् महेश्वरकी आराधनामें तत्पर हो प्रयत्नपूर्वक तपस्या की। वे नित्य ही विभूति धारण करते और रुद्राक्षकी माला पहनते थे। प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन और शतरुद्रियका जप करते थे। मुने! उन ब्राह्मणोंने जब पुनः देवाधिदेव महादेवजीके शुभागमनका समाचार सुना, तब वे दण्डखात नामक महातीर्थसे उनका दर्शन करनेके लिये आये। उनकी संख्या पाँच हजार थी। वे अपने हाथोंमें नूतन दूर्वादल, आर्द्र अक्षत, फूल, फल और सुगन्धित माला लिये हुए थे और मुखसे भगवान् शिवकी जय-जयकार बोलते थे। उन्होंने बारंबार प्रणाम करके मंगलमय वैदिक सूत्रोंद्वारा महादेवजीका स्तवन किया। तब भगवान् शंकरने उन सबको अभय दान देकर प्रसन्नतापूर्वक उनका कुशल-मंगल पूछा।

वे ब्राह्मण बोले—नाथ! इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले हमलोगोंके लिये सदा ही कुशल है। विशेषतः इस समय, जब कि हमने इन नेत्रोंसे आपके स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया है, हमारी कुशलके लिये क्या कहना है। आप वही हैं, जिनके स्वरूपको श्रुतियाँ भी यथार्थरूपसे नहीं जानतीं। जो आपके क्षेत्रसे विमुख हैं, वे ही सदाके लिये कुशलसे वंचित हैं। सर्पोंका भुजबन्द धारण करनेवाले महादेव! जिनके हृदयमें सदैव काशीका चिन्तन होता है उनके ऊपर संसाररूपी सर्पके विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'काशी' यह दो अक्षरोंका मन्त्र गर्भकी रक्षा करनेवाली (अथवा गर्भवाससे बचानेवाली) मणि है। यह जिसके कण्ठमें स्थित है, उसका अमंगल कैसे हो सकता है? जो प्रतिदिन 'काशी' इस दो अक्षरमयी सुधाका पान करता है, वह जरा आदि छः भावविकारोंसे रहित देवरूपताकी भी उपेक्षा करके साक्षात् अमृत (मोक्ष)-रूप हो जाता है। जिसने कानोंमें अमृतके समान प्रतीत होनेवाले 'काशी' इन दो अक्षरोंको सुना है, वह फिर कभी गर्भवासकी कथा नहीं सुनता। काशीसे अन्यत्र रहकर भी जो 'काशी-काशी-काशी' इस प्रकार जप करते हुए जीवन-यापन करता है, उसके आगे मुक्ति सदैव प्रकाशित होती है। भगवन्! यह काशीपुरी कल्याणस्वरूपा है, आप कल्याणस्वरूप हैं तथा गंगाजी भी कल्याणस्वरूपा हैं। दूसरा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहाँ तीन-तीन कल्याणमूर्तियाँ रहती हों।

काशी क्षेत्रकी भक्तिसे परिपूर्ण यह ब्राह्मणोंका वचन सुनकर भगवान् शिव बहुत सन्तुष्ट हुए और प्रसन्नचित्त होकर बोले—द्विजवरो! तुम सब धन्य हो, मैं जानता हूँ, इस क्षेत्रका सेवन करनेसे तुम विशुद्ध सत्त्वमय हो गये हो, तुममें रजोगुण और तमोगुणका सर्वथा अभाव है। अतएव तुमलोग संसारसमुद्रसे पार हो गये हो। जो काशीपुरीके भक्त हैं, वे निश्चय ही मेरे भक्त हैं और जीवन्मुक्त हैं। जो पापहीन मानव इस आनन्दवनमें निवास करते हैं, वे निश्चय ही मेरे अन्तःकरणमें स्थित होते हैं। जो मेरे क्षेत्रमें रहकर मेरी भक्ति करते और मेरे चिह्नोंको धारण करते हैं, उन्हींको मैं उपदेश देता हूँ। काशीवासी ब्राह्मणो! मेरी भक्ति और चिह्न धारण करनेवाले तुम सब लोग धन्य हो। तुम्हारे हृदयसे न तो मैं दूर हूँ और न यह काशीपुरी ही दूर है। तुम सब लोग मुझसे अपनी रुचिसे वर माँगो।

ब्राह्मण बोले—उमापते! महेश्वर! सर्वज्ञ! हमारे लिये यह वर है कि आप भवताप हरनेवाली काशीपुरीका कदापि परित्याग न करें। यहाँ काशीमें ब्राह्मणोंके वचनसे कभी किसीके ऊपर भी ऐसा कोई शाप न लागू हो जो मोक्षमें विघ्न डालनेवाला हो। आपके युगल चरणारविन्दोंमें हमारी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे। इस शरीरके अन्ततक हमारा निरन्तर काशीमें ही निवास बना रहे। और किसी वरसे हमें क्या काम है, हमें

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तो बस यही वर देना चाहिये। आपकी भक्तिसे प्रभावित होकर हमलोगोंने आपके प्रतिनिधिस্বরূপ जिन लिंगोंकी स्थापना की है, उन सबमें आपका निरन्तर वास हो।

ब्राह्मणोंके ये वचन सुनकर शिवजीने कहा—'तथास्तु' ऐसा ही हो। इसके सिवा तुम्हें दूसरा वर यह देता हूँ कि तुम सब ब्राह्मणोंको यथार्थ ज्ञान प्राप्त होगा। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको उत्तरवाहिनी गंगाके सेवन, शिवलिंगका यत्नपूर्वक पूजन, दम (इन्द्रियसंयम), दान और दया—ये सदा ही करने चाहिये। इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले लोगोंके लिये यही रहस्यकी बात बतायी गयी है। अपनी बुद्धिको दूसरोंके हित-चिन्तनमें लगाना चाहिये और किसीसे भी उद्वेगमें डालनेवाला वचन नहीं बोलना चाहिये। यहाँ विजयकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको मनसे भी कभी पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँका किया हुआ पुण्य और पाप अक्षय होता है। अन्यत्रका किया हुआ पाप काशीमें नष्ट होता है, काशीमें किया हुआ पाप अन्तर्गृहमें नष्ट होता है, किंतु अन्तर्गृहमें किया हुआ पाप पैशाच्यनरककी प्राप्ति करानेवाला है। अन्तर्गृहमें पाप करनेवाला पुरुष यदि काशीसे बाहर चला जाता है तो उसे पिशाचनरककी प्राप्ति होती ही है, क्योंकि काशीमें किया हुआ पापकर्म करोड़ों कल्पोंमें भी शुद्ध नहीं होता। परंतु यदि यहीं उसकी मृत्यु हो तो उसे तीस हजार वर्षोंतक रुद्रपिशाच होकर रहना पड़ता है। जो काशीमें रहकर सदा पातकोंमें ही तत्पर रहता है, वह तीस हजार वर्षोंतक पिशाचयोनिमें रहेगा। उसके बाद फिर यहीं रहते हुए उसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होगी और उसी ज्ञानसे उसे परम उत्तम मोक्ष प्राप्त हो जायगा। इस संसारमें सब कुछ अनित्य है और मनुष्य-जन्म अनेक प्रकारके पापोंसे भरा हुआ है, ऐसा जानकर संसारभयसे छुड़ानेवाले अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम)-का सदैव सेवन करना चाहिये। ब्राह्मणो! मेरी भक्तिमें तत्पर जो पतिव्रता स्त्रियाँ अविमुक्त क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होती हैं, वे परम गतिको पाती हैं। द्विजवरो! यहाँ प्राण निकलते समय मैं स्वयं ही जीवको तारक ब्रह्मका उपदेश देता हूँ जिससे वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। मुझमें मन लगाये रखनेवाला तथा अपने सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें ही समर्पित करनेवाला मेरा भक्त इस काशीमें जिस प्रकार मोक्षको प्राप्त होता है वैसा अन्य किसी पुण्य क्षेत्रमें नहीं। देहधारी जीवकी मृत्यु निश्चित है, कर्मोंसे प्राप्त होनेवाली गति भी दुःखरूप ही है तथा प्रत्येक आगन्तुक वस्तु एक-न-एक दिन चली जानेवाली है। ऐसा समझकर काशीकी शरण लेनी चाहिये। जो अपने न्यायोपार्जित धनसे एक भी काशीवासी पुरुषको तृप्त करता है, उसने मेरे साथ सम्पूर्ण त्रिलोकीको तृप्त कर दिया। धर्मसे काशीकी रक्षा करनेवाले राजर्षि दिवोदास सशरीर मेरे उस लोकको प्राप्त हुए हैं जहाँसे पुनः इस संसारमें आना नहीं होता। जो पृथ्वीके अन्तमें रहकर भी मेरे अविमुक्त नामक लिंगका स्मरण करते हैं वे निश्चय ही बड़े-बड़े पापोंसे भी मुक्त हो जाते हैं। इस क्षेत्रमें जिसने भी मेरा दर्शन, स्पर्श और पूजन किया है वह तारक-ज्ञान प्राप्त करके पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो इस तीर्थमें मेरी पूजा करके अन्यत्र कहीं मृत्युको प्राप्त होता है वह दूसरे जन्ममें भी मुझे प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा। इस प्रकार ब्राह्मणोंके आगे काशीक्षेत्रकी महिमाका वर्णन करके महादेवजी उन सब ब्राह्मणोंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। वे ब्राह्मण भी भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रसन्नचित्त हो अपने-अपने आश्रमको चले गये।

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८६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परापरेश्वर और व्याघ्रेश्वर लिंगकी महिमा, भगवान् शिवद्वारा व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध

स्कन्दजी कहते हैं—कुम्भज ! ज्येष्ठेश्वर क्षेत्रके सब ओर जो मुनियोंद्वारा स्थापित पाँच हजार शिवलिंग हैं, वे पूर्ण सिद्धि देनेवाले हैं। ज्येष्ठेश्वरसे उत्तरमें परम पूजनीय परापरेश्वर लिंग है, जिसके दर्शनमात्रसे निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति होती है। दण्डखात नामक महातीर्थके समीप जब ब्राह्मणलोग परम उत्तम निष्काम तप कर रहे थे, उस समय प्रह्लादके मामा 'दुन्दुभिनिह्लाद' नामक दुष्ट दैत्यने मन-ही-मन यह विचार किया कि देवताओंको किस प्रकार सुगमतापूर्वक जीता जा सकता है। इसका उपाय सोचते-सोचते उसने निश्चय किया कि 'ब्राह्मण ही देवताओंके सबल होनेमें कारण हैं, क्योंकि देवता यज्ञमें दिये हुए भागका ही आहार करते हैं। यज्ञ वेदोंसे सम्पन्न होते हैं और वे वेद ब्राह्मणोंके अधीन हैं। अतः ब्राह्मण ही देवताओंके बल हैं। यदि ब्राह्मण नष्ट हो जायँ तो वेद स्वयं नष्ट हो जायँगे और जब वेद नष्ट हो जायँगे तब यज्ञ तो नष्ट ही हैं। यज्ञोंका नाश होते ही देवताओंका आहार छिन जायगा। इस प्रकार निर्बल हुए देवतालोग सुगमतापूर्वक जीते जा सकते हैं। देवताओंके परास्त होनेपर मैं ही तीनों लोकोंका सम्माननीय सम्राट होऊँगा।' यह सोचकर उसने ब्राह्मणोंको ही मार डालनेका बार-बार उद्योग किया। काशीमें आकर उस मायावी दैत्यने कितने ही ब्राह्मणोंका वध किया। श्रेष्ठ द्विज जिस किसी ओर भी समिधा और कुशा लानेके लिये जाते, उधर ही वनमें उन सबको पकड़कर वह दुर्बुद्धि दैत्य अपना आहार बना लेता था। उसका रूप किसीको दिखायी नहीं देता था। देवता लोग भी उस मायावीको देख नहीं पाते थे। वह दिनभर मुनियोंके ही बीचमें बैठकर उन्हींकी भाँति ध्यान लगाये रहता था। पर्णशालामें किधरसे प्रवेश करने और किस ओरसे निकल भागनेका मार्ग है, यह सब वह दिनमें ही देख लेता था तथा रातमें व्याघ्रका रूप धारण करके वहाँ बहुतसे ब्राह्मणोंको खा डालता था। इस प्रकार उस दुष्ट दैत्यने बहुतसे ब्राह्मणोंको मार दिया।

एक दिन शिवरात्रिके समय एक शिवभक्त ब्राह्मण महादेवजीकी पूजा करके उनके ध्यानमें बैठा था। उसी समय अपने बलके घमंडमें भरे हुए दैत्यराज दुन्दुभिने व्याघ्रका रूप धारण करके उस भक्तको पकड़ लेनेका विचार किया। वह शिवभक्त अपने चित्तको दृढ़तापूर्वक स्थिर करके ध्यानमें स्थित हो भगवान् शिवके दर्शनमें तल्लीन था। उसने विधिपूर्वक मन्त्रके अंगन्यास, करन्यास, कवच और ध्यान आदिका प्रयोग कर लिया था। अतः वह दैत्य उस भक्तपर सहसा आक्रमण करनेमें समर्थ न हुआ। इसी समय सर्वव्यापी भगवान् शिवने उस दुष्ट दैत्यके मनोभावको समझकर उसका वध करनेका विचार किया। वे उस भक्तद्वारा पूजित शिवलिंगसे सहसा प्रकट हो गये। उन्हें आते देख वह दैत्य उसी रूपमें बढ़कर पर्वतके समान विशालकाय हो गया और उनकी ओर झपटा। इतनेमें ही उसे पकड़कर भगवान्ने अपनी काँखमें दबा लिया और उसीमें पीस डाला। इस

  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८६३ ---|--- प्रकार काँखमें कुचला जाता हुआ वह दैत्य आकाश और पृथ्वीको गुँजाता हुआ आर्तनाद करने लगा। उसका चीत्कार सुनकर बहुत-से तपस्वी रात्रिमें उसी शब्दका लक्ष्य करके उस पर्णशालामें आ पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा—भगवान् शंकर अपनी काँखमें एक व्याघ्रको दबाये हुए खड़े हैं। यह देख सबने जय-जयकार करते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तवन किया। 'जगद्गुरो! ईश! आप हमपर अनुग्रह कीजिये और इसी रूपमें व्याघ्रेश नाम धारण | करके यहाँ निवास कीजिये। महादेव! इस श्रेष्ठ स्थानकी आप सदैव रक्षा करें।'<br><br>उन तपोधनोंका ऐसा वचन सुनकर चन्द्रभूषण भगवान् शिवने कहा—'ब्राह्मणो! ऐसा ही हो। जो श्रद्धापूर्वक यहाँ इस रूपमें मेरा दर्शन करेगा, उसके समस्त उपद्रवोंका मैं निश्चय ही नाश करूँगा।' ऐसा कहकर महादेवजी उस शिवलिंगमें लयको प्राप्त हो गये। तबसे वह शिवलिंग व्याघ्रेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ज्येष्ठेश्वरके उत्तरभागमें उसका दर्शन और स्पर्श करनेपर वह सम्पूर्ण भयोंका नाश करनेवाला है।

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हिमवान्‌के द्वारा काशीमें शैलेश्वर लिंगकी प्रतिष्ठा

कार्तिकेयजी कहते हैं—एक समय पर्वतराज हिमवान्‌से उनकी पतिव्रता पत्नी मेनाने कहा—'आर्यपुत्र! मैं विवाहके बादसे अपनी बेटी गौरीका समाचार न पा सकी। इस समय महादेवजी कहाँ हैं? प्रभो! वे एक और अद्वितीय हैं। उन त्रिशूलधारी भगवान् शिवका समाचार जाननेके लिये कोई उद्योग कीजिये।'<br><br>गिरिराज हिमवान् बोले—देवि! मैं अपनी प्यारी पुत्रीकी खोज करनेके लिये स्वयं ही जाऊँगा। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि जबसे गौरी मेरे घरसे गयी है तबसे इस घरकी लक्ष्मी ही चली गयी। ऐसा कहकर भाँति-भाँतिके रत्न और वस्त्र साथ ले गिरिराज हिमवान् शुभ लग्नमें घरसे चले। बहुत दूर आगे जानेपर उन्होंने दूरसे ही काशीपुरीको देखा जो कि मणियोंकी ज्योतिसे जगमगा रही थी और अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करनेवाली थी। सब ओर वैजयन्ती पताकाओंके समुदायसे सुशोभित वह पुरी स्वर्गलोककी अमरावती-सी जान पड़ती थी। इसी समय वहाँ उन्हें कोई तीर्थयात्री दिखायी दिया। पर्वतराजने उसे बुलाकर आदरपूर्वक पूछा—'भाई कार्पटिक! यहाँका वृत्तान्त कहो, यह कौन-सा अपूर्व नगर है? इस समय यहाँका अधिष्ठाता कौन है और उसका कर्म क्या है?'<br><br>कार्पटिक बोला—मानद! अभी तो पाँच-छः | दिन ही बीते हैं, गिरिराजनन्दिनी गौरीके पति भगवान् विश्वनाथ यहाँ काशीपुरीमें मन्दराचलसे पधारे हैं। यहाँके राजा दिवोदास परम धामको चले गये। जो सम्पूर्ण जगत्‌के अधिष्ठाता हैं, वे ही भगवान् शंकर इस काशीपुरीके भी स्वामी हैं। वे ही सब कुछ देनेवाले हैं। पर्वतराज हिमवान् भी श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पुत्री देकर भगवान् विश्वनाथको सन्तुष्ट किया है। वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमेश्वर शिवजीकी चेष्टाओंको कौन जानता है। मैं तो बहुत थोड़ा और इतना ही जानता हूँ कि यह सब जगत् उन्हींकी रचना है। इस समय भगवान् शिव गिरिराजकुमारी पार्वतीजीके साथ काशीके ज्येष्ठेश्वर नामक स्थानमें ठहरे हुए हैं। भगवान् विश्वनाथके लिये विश्वकर्माद्वारा जिस विशाल प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण किया जा रहा है, वह अपूर्व है। वैसा तो मैंने अपने कानोंसे कभी सुना भी नहीं है। जहाँ मणियों और रत्नोंकी शलाकाओंसे मन्दिरकी दीवारें बनायी गयी हैं, उस मन्दिरमें एक सौ बारह खम्भे हैं जो सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होते हैं। ऐसा अपूर्व वैभव जिनके समीप सदा प्रकट होता है, उन भगवान् उमाकान्तको आप कैसे नहीं जानते?<br><br>अगस्त्य! अपने जामाताकी उस अद्भुत समृद्धिका वर्णन सुनकर पर्वतराज लज्जासे दब गये। उन्होंने

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उस कार्पटिक (तीर्थयात्री)-को पारितोषिक देकर विदा किया और स्वयं इस प्रकार चिन्ता करने लगे—‘अहो ! इस जगत्में जितनी वैभवराशि सुनी जाती है, वह सब मेरे जामाताके भवनमें विद्यमान है। मैं कन्या और जामाताके संतोषके लिये भेंट देनेको जो कुछ लाया हूँ, वह सब उनके अगाध वैभवको देखते हुए मुझे अत्यन्त तुच्छ प्रतीत होता है। यह सम्पूर्ण जगत् जिनका ही पसारा है, जिन्हें उनसे पहले रहकर कोई भी नहीं जान सका है, वे वेदवेद्य सर्वज्ञ परमेश्वर ये ही हैं। जिन्हें मैंने सदा अनभिज्ञ (भोला) समझा था, वे ही सर्वज्ञ ईश्वर हैं। सबके समस्त नाम जिनके ही नाम हैं, वे सर्वदेश-व्यापी और सबको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले परमात्मा ये ही हैं। जिनका कोई एक देश नहीं ज्ञात होता है, जिनको पहले मेरे-जैसा पाषाणबुद्धिका पुरुष आचारहीनके समान देखता था, वे ही ये साक्षात् ईश्वर हैं। जिनसे श्रुतियाँ और स्मृतियाँ भी आचारका ज्ञान प्राप्त करती हैं, अबतक मैं जिन्हें नाममात्रसे ईश्वर जानता था, वे साक्षात् ईश्वर हैं। ये दूसरोंको भी ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाले हैं। गुणातीत होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। कार्य और कारण सब इन्हींके स्वरूप हैं। यद्यपि यहाँ ये अर्वाचीन (नवीन)-से प्रतीत होते हैं तथापि ये परम प्राचीन और परात्पर हैं। मैं केवल पर्वतोंका स्वामी हूँ और मेरे जामाता उमाकान्त सम्पूर्ण विश्वके स्वामी हैं। मेरी सम्पत्ति परिमित (बहुत थोड़ी) है, परंतु इनके दिव्य वैभवका कोई माप नहीं है। अतः मेरी लायी हुई यह उपहारकी सामग्री बहुत थोड़ी है। इससे इस समय मैं इन महेश्वरका दर्शन नहीं करूँगा।’

मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके गिरिराज हिमवान्ने सायंकाल समस्त पर्वतीय अनुचरोंको बुलाकर आज्ञा दी, ‘सेवको ! तुम सब लोग शीघ्र ही सूर्योदयसे पहले यहाँ एक शिवालय निर्माण करो।’ हिमवान्की यह आज्ञा पाकर अनुगामी सेवकोंने रात बीतनेके पहले ही सुन्दर शिवालय बनाकर तैयार कर दिया। फिर गिरिराज हिमवान्ने उसमें शैलेश्वर नामक शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की- जो चन्द्रकान्तमणिका बना हुआ था। जिसकी जगमगाती हुई प्रभासे सारा मण्डप उज्ज्वल आलोकमय हो रहा था। तदनन्तर प्रातःकाल होते ही गिरिराजने पंचनद कुण्डमें स्नान किया और कालराज (भैरव)-को नमस्कार एवं पूजन करके वहीं अपनी लायी हुई रत्नराशि छोड़कर वे अपने सब पर्वतीय सेवकोंके साथ तुरंत लौट गये। उसके बाद प्रातःकाल ‘हुण्डन’, ‘मुण्डन’ नामवाले दो शिवगणोंने वरणाके सुन्दर तटपर बने हुए उस सुन्दर देवालयको देखा। उसे देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। वे शिवजीके समीप गये और उन्हें साष्टांग प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—‘देवाधिदेव ! हम नहीं जानते, किस सुदृढ़ भक्तने वरणाके तटपर परम मनोहर मन्दिरका निर्माण कराया है। कल शामतक तो हमने वहाँ कोई मन्दिर नहीं देखा था। आज ही प्रातःकाल वह देखा गया है।’ अपने गणोंका यह कथन सुनकर भगवान् शिवने पार्वतीजीसे कहा—‘गिरिराजकुमारी ! वह मन्दिर देखनेके लिये हम और तुम दोनों चलें।’ ऐसा कहकर पार्वती और गणोंसहित भगवान् शिव वहाँ गये और वहाँ उन्होंने वरणाके तटपर रातभरमें बनाये हुए उस परम सुन्दर देवमन्दिरको देखा। फिर मण्डपमें प्रवेश करके चन्द्रकान्तमणिमय शिवलिंगका भी दर्शन किया। ‘किसने इस शिवलिंगकी स्थापना की है?’ यह जिज्ञासा मनमें उठते ही महादेवजीने अपने आगे अंकित की हुई वह प्रशस्ति देखी जो मन्दिरका निर्माण और प्रतिष्ठा करनेवालेको सूचित कर रही थी। उसे मन-ही-मन बाँचकर भगवान् शिवने देवीसे कहा—‘प्रिये ! सौभाग्यवश यह तुम्हारे पिताकी ही कृति है, इसको अच्छी तरह देख लो।’ यह सुनकर पार्वतीजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने महादेवजीके चरणोंमें प्रणाम करके प्रार्थना की—‘नाथ ! इस श्रेष्ठ लिंग-विग्रहमें आपको दिन-रात स्थित रहना चाहिये।’ ‘एवमस्तु—ऐसा ही होगा’ यों कहकर महादेवजीने पुनः पार्वतीसे कहा—‘वरणा नदीके जलमें स्नान करके जिनके द्वारा शैलेश्वर शिवकी पूजा होगी तथा जो पितरोंका