भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 889

८६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उन्होंने अनेक बड़े-बड़े शिवलिंग स्थापित किये और भगवान् महेश्वरकी आराधनामें तत्पर हो प्रयत्नपूर्वक तपस्या की। वे नित्य ही विभूति धारण करते और रुद्राक्षकी माला पहनते थे। प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन और शतरुद्रियका जप करते थे। मुने! उन ब्राह्मणोंने जब पुनः देवाधिदेव महादेवजीके शुभागमनका समाचार सुना, तब वे दण्डखात नामक महातीर्थसे उनका दर्शन करनेके लिये आये। उनकी संख्या पाँच हजार थी। वे अपने हाथोंमें नूतन दूर्वादल, आर्द्र अक्षत, फूल, फल और सुगन्धित माला लिये हुए थे और मुखसे भगवान् शिवकी जय-जयकार बोलते थे। उन्होंने बारंबार प्रणाम करके मंगलमय वैदिक सूत्रोंद्वारा महादेवजीका स्तवन किया। तब भगवान् शंकरने उन सबको अभय दान देकर प्रसन्नतापूर्वक उनका कुशल-मंगल पूछा।

वे ब्राह्मण बोले—नाथ! इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले हमलोगोंके लिये सदा ही कुशल है। विशेषतः इस समय, जब कि हमने इन नेत्रोंसे आपके स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया है, हमारी कुशलके लिये क्या कहना है। आप वही हैं, जिनके स्वरूपको श्रुतियाँ भी यथार्थरूपसे नहीं जानतीं। जो आपके क्षेत्रसे विमुख हैं, वे ही सदाके लिये कुशलसे वंचित हैं। सर्पोंका भुजबन्द धारण करनेवाले महादेव! जिनके हृदयमें सदैव काशीका चिन्तन होता है उनके ऊपर संसाररूपी सर्पके विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'काशी' यह दो अक्षरोंका मन्त्र गर्भकी रक्षा करनेवाली (अथवा गर्भवाससे बचानेवाली) मणि है। यह जिसके कण्ठमें स्थित है, उसका अमंगल कैसे हो सकता है? जो प्रतिदिन 'काशी' इस दो अक्षरमयी सुधाका पान करता है, वह जरा आदि छः भावविकारोंसे रहित देवरूपताकी भी उपेक्षा करके साक्षात् अमृत (मोक्ष)-रूप हो जाता है। जिसने कानोंमें अमृतके समान प्रतीत होनेवाले 'काशी' इन दो अक्षरोंको सुना है, वह फिर कभी गर्भवासकी कथा नहीं सुनता। काशीसे अन्यत्र रहकर भी जो 'काशी-काशी-काशी' इस प्रकार जप करते हुए जीवन-यापन करता है, उसके आगे मुक्ति सदैव प्रकाशित होती है। भगवन्! यह काशीपुरी कल्याणस्वरूपा है, आप कल्याणस्वरूप हैं तथा गंगाजी भी कल्याणस्वरूपा हैं। दूसरा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहाँ तीन-तीन कल्याणमूर्तियाँ रहती हों।

काशी क्षेत्रकी भक्तिसे परिपूर्ण यह ब्राह्मणोंका वचन सुनकर भगवान् शिव बहुत सन्तुष्ट हुए और प्रसन्नचित्त होकर बोले—द्विजवरो! तुम सब धन्य हो, मैं जानता हूँ, इस क्षेत्रका सेवन करनेसे तुम विशुद्ध सत्त्वमय हो गये हो, तुममें रजोगुण और तमोगुणका सर्वथा अभाव है। अतएव तुमलोग संसारसमुद्रसे पार हो गये हो। जो काशीपुरीके भक्त हैं, वे निश्चय ही मेरे भक्त हैं और जीवन्मुक्त हैं। जो पापहीन मानव इस आनन्दवनमें निवास करते हैं, वे निश्चय ही मेरे अन्तःकरणमें स्थित होते हैं। जो मेरे क्षेत्रमें रहकर मेरी भक्ति करते और मेरे चिह्नोंको धारण करते हैं, उन्हींको मैं उपदेश देता हूँ। काशीवासी ब्राह्मणो! मेरी भक्ति और चिह्न धारण करनेवाले तुम सब लोग धन्य हो। तुम्हारे हृदयसे न तो मैं दूर हूँ और न यह काशीपुरी ही दूर है। तुम सब लोग मुझसे अपनी रुचिसे वर माँगो।

ब्राह्मण बोले—उमापते! महेश्वर! सर्वज्ञ! हमारे लिये यह वर है कि आप भवताप हरनेवाली काशीपुरीका कदापि परित्याग न करें। यहाँ काशीमें ब्राह्मणोंके वचनसे कभी किसीके ऊपर भी ऐसा कोई शाप न लागू हो जो मोक्षमें विघ्न डालनेवाला हो। आपके युगल चरणारविन्दोंमें हमारी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे। इस शरीरके अन्ततक हमारा निरन्तर काशीमें ही निवास बना रहे। और किसी वरसे हमें क्या काम है, हमें