भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 890
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८६१

तो बस यही वर देना चाहिये। आपकी भक्तिसे प्रभावित होकर हमलोगोंने आपके प्रतिनिधिस্বরূপ जिन लिंगोंकी स्थापना की है, उन सबमें आपका निरन्तर वास हो।

ब्राह्मणोंके ये वचन सुनकर शिवजीने कहा—'तथास्तु' ऐसा ही हो। इसके सिवा तुम्हें दूसरा वर यह देता हूँ कि तुम सब ब्राह्मणोंको यथार्थ ज्ञान प्राप्त होगा। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको उत्तरवाहिनी गंगाके सेवन, शिवलिंगका यत्नपूर्वक पूजन, दम (इन्द्रियसंयम), दान और दया—ये सदा ही करने चाहिये। इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले लोगोंके लिये यही रहस्यकी बात बतायी गयी है। अपनी बुद्धिको दूसरोंके हित-चिन्तनमें लगाना चाहिये और किसीसे भी उद्वेगमें डालनेवाला वचन नहीं बोलना चाहिये। यहाँ विजयकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको मनसे भी कभी पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँका किया हुआ पुण्य और पाप अक्षय होता है। अन्यत्रका किया हुआ पाप काशीमें नष्ट होता है, काशीमें किया हुआ पाप अन्तर्गृहमें नष्ट होता है, किंतु अन्तर्गृहमें किया हुआ पाप पैशाच्यनरककी प्राप्ति करानेवाला है। अन्तर्गृहमें पाप करनेवाला पुरुष यदि काशीसे बाहर चला जाता है तो उसे पिशाचनरककी प्राप्ति होती ही है, क्योंकि काशीमें किया हुआ पापकर्म करोड़ों कल्पोंमें भी शुद्ध नहीं होता। परंतु यदि यहीं उसकी मृत्यु हो तो उसे तीस हजार वर्षोंतक रुद्रपिशाच होकर रहना पड़ता है। जो काशीमें रहकर सदा पातकोंमें ही तत्पर रहता है, वह तीस हजार वर्षोंतक पिशाचयोनिमें रहेगा। उसके बाद फिर यहीं रहते हुए उसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होगी और उसी ज्ञानसे उसे परम उत्तम मोक्ष प्राप्त हो जायगा। इस संसारमें सब कुछ अनित्य है और मनुष्य-जन्म अनेक प्रकारके पापोंसे भरा हुआ है, ऐसा जानकर संसारभयसे छुड़ानेवाले अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम)-का सदैव सेवन करना चाहिये। ब्राह्मणो! मेरी भक्तिमें तत्पर जो पतिव्रता स्त्रियाँ अविमुक्त क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होती हैं, वे परम गतिको पाती हैं। द्विजवरो! यहाँ प्राण निकलते समय मैं स्वयं ही जीवको तारक ब्रह्मका उपदेश देता हूँ जिससे वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। मुझमें मन लगाये रखनेवाला तथा अपने सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें ही समर्पित करनेवाला मेरा भक्त इस काशीमें जिस प्रकार मोक्षको प्राप्त होता है वैसा अन्य किसी पुण्य क्षेत्रमें नहीं। देहधारी जीवकी मृत्यु निश्चित है, कर्मोंसे प्राप्त होनेवाली गति भी दुःखरूप ही है तथा प्रत्येक आगन्तुक वस्तु एक-न-एक दिन चली जानेवाली है। ऐसा समझकर काशीकी शरण लेनी चाहिये। जो अपने न्यायोपार्जित धनसे एक भी काशीवासी पुरुषको तृप्त करता है, उसने मेरे साथ सम्पूर्ण त्रिलोकीको तृप्त कर दिया। धर्मसे काशीकी रक्षा करनेवाले राजर्षि दिवोदास सशरीर मेरे उस लोकको प्राप्त हुए हैं जहाँसे पुनः इस संसारमें आना नहीं होता। जो पृथ्वीके अन्तमें रहकर भी मेरे अविमुक्त नामक लिंगका स्मरण करते हैं वे निश्चय ही बड़े-बड़े पापोंसे भी मुक्त हो जाते हैं। इस क्षेत्रमें जिसने भी मेरा दर्शन, स्पर्श और पूजन किया है वह तारक-ज्ञान प्राप्त करके पुनः इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो इस तीर्थमें मेरी पूजा करके अन्यत्र कहीं मृत्युको प्राप्त होता है वह दूसरे जन्ममें भी मुझे प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा। इस प्रकार ब्राह्मणोंके आगे काशीक्षेत्रकी महिमाका वर्णन करके महादेवजी उन सब ब्राह्मणोंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। वे ब्राह्मण भी भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रसन्नचित्त हो अपने-अपने आश्रमको चले गये।

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