भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 886

* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८५७


जैगीषव्यपर भगवान् शिवकी कृपा और उनके द्वारा शिवकी स्तुति

अगस्त्यजी कहते हैं—भगवन् ! काशीपुरीका दर्शन करके त्रिपुरारि भगवान् शिवने क्या किया ?

स्कन्दजी बोले—अगस्त्य ! सर्वज्ञ नाथ भक्त-वत्सल भगवान् शिवने काशीपुरीको देखनेके पश्चात् सबसे प्रथम किसी गुहामें बैठे हुए जैगीषव्य-मुनिको दर्शन दिया। जिस दिन भगवान् शिव काशी छोड़कर मन्दराचल गये उसी दिनसे जैगीषव्य-मुनिने यह दृढ़ नियम कर लिया था कि 'जब मैं पुनः यहाँ भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका दर्शन करूँगा तभी एक बूँद जल भी मुँहमें डालूँगा।' किसी अद्भुत धारणाशक्तिसे अथवा भगवान् शंकरके अनुग्रहसे अन्न-जल त्याग देनेपर भी जैगीषव्य-मुनि वहाँ जीवित रहे। इस बातको केवल भगवान् शंकर जानते थे, दूसरा कोई नहीं। इसीलिए भगवान् विश्वनाथ सबसे पहले वहीं गये और नन्दीश्वरको सम्बोधित करके सब देवताओंके सुनते हुए इस प्रकार बोले—'शिलादपुत्र ! यहाँ बड़ी मनोहर गुफा है, तुम शीघ्र इसके भीतर प्रवेश करो। इसके भीतर मेरे भक्त तपोधन जैगीषव्यमुनि रहते हैं, जिन्होंने मेरे दर्शनके लिये दृढ़तापूर्वक कठोर व्रत धारण किया है। उनको गुफासे बाहर ले आओ। जब मैं मन्दराचल पर्वतपर गया था तबसे लेकर आजतक उन्होंने आहार त्यागकर बड़े भारी नियमका पालन किया है। यह लीलाकमल ले लो, यह अमृतके समान पोषण करनेवाला है, इससे उनके अंगोंका स्पर्श करा दो।' तब नन्दी देवदेवेश्वर महादेवजीको प्रणाम करके वह लीलाकमल हाथमें ले गुफाके भीतर गये और वहाँ धारणामें दृढ़तापूर्वक चित्तको लगाये हुए तपस्याकी अग्निसे सूखे अंगोंवाले मुनिको देखकर उन्होंने उनके शरीरसे कमलका स्पर्श करा दिया। उस कमलका स्पर्श होते ही योगीश्वर जैगीषव्य उल्लसित हो उठे। तदनन्तर नन्दी उन मुनीश्वरको लेकर शीघ्र आये और देवाधिदेव महादेवके चरणोंके आगे नमस्कारपूर्वक डाल दिया। अपने आगे भगवान् शंकरको देखकर वे हर्षसे फूल उठे। शंकरजीके वामांगमें गिरिराज-नन्दिनी पार्वती भी थीं। जैगीषव्यने भगवान्‌के आगे भूमिपर सब ओर लोटकर साष्टांग प्रणाम किया और अतिशय भक्ति पूर्वक उनकी स्तुति प्रारम्भ की।

जैगीषव्य बोले—शान्त, सर्वज्ञ एवं शुभस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। जगत्‌के आनन्दका मूलस्थान तथा परमानन्दकी प्राप्तिके हेतुभूत महादेवजीको नमस्कार है। प्रभो ! आप ही स्थावर और जंगमरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। सर्वात्मन् ! आपको नमस्कार है। परमात्मन् ! आपको नमस्कार है। आप शेषनागका भुजबन्द धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके आधे शरीरमें शक्तिस्वरूपा पार्वतीका निवास है, आपको नमस्कार है। आप शरीररहित तथा सुन्दर शरीरसे