संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है, तीसरा नाम क्षीरसागर है। इसके सिवा वृषभध्वजतीर्थ, पितामहतीर्थ, गदाधरतीर्थ और पितृतीर्थ आदि नाम हैं। इतना ही नहीं—कपिलधारा, सुधाखनि और शिवगया नामसे भी इस शुभ तीर्थको जानना चाहिये। पितरो! इस तीर्थके ये दस नाम बिना श्राद्ध और तर्पणके भी आपलोगोंको तृप्ति देनेवाले हैं। जो लोग पितरोंको तृप्त करनेकी इच्छा लेकर सूर्य-चन्द्रमाके संगम (अमावस्या)-के अवसरपर यहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करावेंगे उनके द्वारा किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होगा। जो पितरोंकी तृप्तिके लिये यहाँ श्राद्धमें कपिला गौका दान करेंगे उनके पितर क्षीरसागरके तटपर निवास करेंगे। जिन्होंने इस वृषभध्वजतीर्थमें वृषोत्सर्ग किया है उन्होंने अपने पितरोंको अश्वमेध यज्ञके पुरोडाशसे तृप्त कर दिया। पिताके गोत्रमें और माताके पक्षमें जो लोग मरे हैं उनको यहाँ किया हुआ पिण्डदान अक्षय तृप्ति देनेवाला होता है। पत्नीवर्ग अथवा मित्रवर्गमें जो लोग मृत्युको प्राप्त हुए हैं वे भी वृषभध्वजतीर्थमें तर्पण करनेपर तृप्तिको प्राप्त होते हैं। जिनका वृषभध्वजतीर्थमें तर्पण किया गया है वे सब पितर ब्रह्मलोकको चले जाते हैं। यह तीर्थ सत्ययुगमें दूधसे भरा रहता है, त्रेतामें मधुसे पूर्ण होता है, द्वापरमें घीसे भरा होता है और कलियुगमें जलसे परिपूर्ण रहता है। यद्यपि यह शुभ तीर्थ काशीकी सीमासे बाहर है, तो भी यहाँ मेरा सामीप्य होनेके कारण इसे काशीपुरीके भीतर ही जानना चाहिये। काशीनिवासियोंने यहाँ मेरे वृषचिह्नयुक्त ध्वजका दर्शन किया है, इसलिये मैं इस तीर्थमें 'वृषभध्वज' नामसे निवास करूँगा। पितरो ! मैं तुम्हारे सन्तोषके लिये यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा अपने पार्षदोंके साथ निवास करूँगा।'
इस प्रकार शिवजी पितरोंको वरदान दे रहे थे, इतनेहीमें नन्दिकेश्वरने निवेदन किया—प्रभो! रथ सुसज्जित होकर तैयार है, अतः अब श्रीचरणोंकी विजययात्रा प्रारम्भ हो। तब आठ मातृकाओंने भगवान् शिवकी आरती उतारी और भगवान् विश्वनाथ श्रीहरिसे हाथ मिलाये हुए उठकर खड़े हुए। उस समय दिव्य वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिसे पृथ्वीसे लेकर आकाशतक गूँज उठा। देवियोंके मंगलगीत और चारणोंद्वारा की हुई स्तुतिके शब्दोंसे वह तुमुलनाद और भी बढ़ गया था। तैंतीस करोड़ देवता, बीस करोड़ शिवगण, नौ करोड़ चामुण्डा, एक करोड़ भैरवी तथा आठ करोड़ मेरे (स्कन्दके) महाबली अनुचर, जो छः मुखोंसे सुशोभित और मयूरके वाहनपर आरूढ़ थे, आये। चमकता हुआ फरसा हाथमें लिये सात करोड़ गणेशके गण उपस्थित हुए जो महावेगवान्, तोंदवाले, हाथीके-से मुखवाले तथा विघ्नविनाशक थे। छियासी हजार ब्रह्मवादी मुनि और इतने ही गृहस्थ भी वहाँ आये। तीन करोड़ पातालनिवासी नाग, दो-दो करोड़ शिवभक्त दानव और दैत्य, आठ लाख गन्धर्व, पचास लाख यक्ष और राक्षस, दो लाख दस हजार विद्याधर, साठ हजार सुन्दरी दिव्य अप्सराएँ, आठ लाख गोमाताएँ, साठ हजार गरुड़, नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट देनेवाले सात समुद्र, तिरपन हजार नदियाँ, आठ हजार पर्वत, तीन सौ वनस्पतियाँ और आठों दिग्गज—ये सब लोग उस स्थानपर उपस्थित हुए जहाँ पिनाकपाणि महादेवजी विराजमान थे। इन सबके साथ परम सन्तुष्ट भगवान् शिवने इधर-उधरसे अपनी स्तुति सुनते हुए रथपर आरूढ़ हो उत्तम काशीपुरीमें प्रवेश किया। उनके साथ गिरिराजनन्दिनी उमा भी थीं।
स्कन्दजी कहते हैं—यह परम उत्तम उपाख्यान कोटि जन्मोंका पाप नष्ट करनेवाला है। इसका पाठ करके अथवा ब्राह्मणद्वारा कराकर मनुष्य भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो इस आख्यानका प्रसन्नतापूर्वक पाठ करके नूतन गृहमें प्रवेश करता है वह सब प्रकारके सुखका निकेतन बन जाता है। यह उत्तम उपाख्यान तीनों लोकोंके लिये आनन्दजनक है। इसके श्रवणमात्रसे भगवान् विश्वनाथ प्रसन्न होते हैं।
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