भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 880, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 880
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८५१
अपने श्रीअंगमें दिव्य रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था। उनकी अंगकान्ति सुन्दर नील कमलके समान श्याम थी। आकृति अत्यन्त स्निग्ध एवं मधुर प्रतीत होती थी। नाभिकुण्डमें कमल शोभा पा रहा था। ओठ बड़े ही सुन्दर और लाल थे, दाँत अनारके दानोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ थे। उनके किरीटकी द्युतिसे आकाश प्रकाशित हो रहा था, देवराज इन्द्र जिनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, सनक आदि महात्मा जिनकी स्तुति करते हैं, नारद आदि देवर्षियोंने जिनके महान् अभ्युदयका गीत गाया है तथा प्रह्लाद आदि भगवद्भक्त जिनके मनको सदा आनन्दित करते रहते हैं, जिन्होंने शार्ङ्ग नामक धनुषका दण्ड हाथमें ले रखा है, जो इन्द्रियोंके अविषय, निराकार और कैवल्यस्वरूप परब्रह्म हैं, वे ही प्रभु भक्तोंकी भक्तिके कारण यहाँ पुरुषरूपमें प्रकट हुए थे। जिनके उपनिषद्वर्णित स्वरूपको वेद भी नहीं जानते, ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं समझ पाते, उन्हीं भगवान् विष्णुका उन तपस्वी मुनिने अपने नेत्रोंसे प्रत्यक्ष दर्शन किया और आनन्दमें भरकर पृथ्वीपर मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया। उन महर्षिका नाम अग्निविन्दु था। महातपस्वी अग्निविन्दुने मस्तकके समीप अंजलि बाँधकर भगवान् विष्णुका भलीभाँति स्तवन किया।<br><br>अग्निविन्दु बोले-ॐ कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् नारायण! आप बाहर और भीतरको पवित्र करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं। आप अन्तर्यामी पुरुष हैं, आपके दोनों चरण सब प्रकारके द्वन्द्वोंका निवारण करनेवाले हैं। इन्द्रादि देवताओंसे वन्दित विष्णो! आपके उन चरणोंको मैं द्वन्द्व-रहित शान्त बुद्धिसे प्रणाम करता हूँ। बृहस्पतिकी वाणी भी जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पाती, उन भगवान्‌की स्तुति करनेके लिये इसलोकमें कौन समर्थ हो सकता है। परंतु यहाँ भक्ति ही प्रबल है (भगवान् केवल भक्तिसे ही प्रसन्न हो जाते हैं)। जो भगवान् विष्णु पुरातन ब्रह्मा आदिके भी मन-वाणीके अगोचर हैं, उनकी स्तुति मेरे-जैसे अल्पबुद्धि पुरुष कैसे कर सकते हैं। जहाँ वाणीका प्रवेश नहीं है, मन जिनका मनन नहीं कर सकता, जो मन और वाणीसे सर्वथा परे हैं, उन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ होगा। छः अंग, पद और क्रमसहित वेद जिनके निःश्वाससे प्रकट हुए हैं, उन भगवान् विष्णुकी महान् महिमाका यथावत् ज्ञान किनको हो सकता है? जिनकी मन-बुद्धि सदा जाग्रत् रहती हैं, वे सनकादि महर्षि अपने हृदयाकाशमें जिनका निरन्तर ध्यान करते रहनेपर भी उन्हें यथार्थरूपसे उपलब्ध नहीं कर पाते, आबालब्रह्मचारी नारद आदि मुनीश्वर जिनके चरित्रको सदा गाते रहते हैं, तो भी सम्यक्‌रूपसे जिनके तत्त्वका ज्ञान नहीं हो पाता, जो चराचरस्वरूप होकर भी चराचर जगत्‌से सर्वथा भिन्न हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जो अजन्मा, अविकारी, एक, आदिकारण, ब्रह्मा आदिके अगोचर, अजेय, अनन्तशक्ति, निरामय, नित्य, निराकार एवं अचिन्त्यस्वरूप हैं, उन आप परमेश्वरको पूर्णरूपसे कौन जान सकता है? भगवन्, मुरारे, मुकुन्द, मधुसूदन, माधव इत्यादि रूपसे आपके एक-एक नामका भी यदि जप किया जाय तो वह पापियोंके जन्मभरके उपार्जित पापपुंजको उनकी महाविपत्तियोंके साथ हर लेता है और बड़े-बड़े यज्ञोंका महत्त्वपूर्ण फल प्रदान करता है। नारायण, नरकार्णवतारण, दामोदर, मधुसूदन, चतुर्भुज, विश्वम्भर, विरज और जनार्दन इत्यादि नामोंका जप करनेवाले पुरुषोंका इस संसारमें कहाँ जन्म हो सकता है तथा उन्हें कालका भय भी कहाँ प्राप्त हो सकता है *। त्रिविक्रम ! आपकी कान्ति

* एकैकमेव तव नाम हरेन्नुरारे जन्माजिताघमघिनां च महापदाद्यम्।
दद्यात्फलं च महितं महतो मखस्य जप्तं मुकुन्द मधुसूदन माधवेति॥
नारायणेति नरकार्णवतारणेति दामोदरेति मधुहेति चतुर्भुजेति।
विश्वम्भरेति विरजेति जनार्दनेति कास्तीह जन्म जपतां क्व कृतान्तभीतिः॥ (स्क० पु०, का० उ० ६०। ३४-३५)

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