संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मेघमालाके समान सुन्दर एवं श्याम है। आपका श्रीअंग विद्युत्की भाँति प्रकाशमान पीताम्बरसे आवृत है और आपके नेत्र कमलदलके समान परम सुन्दर हैं। जो लोग आपकी इस छविका अपने हृदयमें सदा चिन्तन करते हैं, वे भी आपकी अचिन्त्य कान्तिको प्राप्त कर लेते हैं। श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित श्रीहरे! अच्युत! कैटभारे! गोविन्द! गरुड़वाहन! केशव! चक्रपाणे! लक्ष्मीपते! दैत्यसूदन! शाङ्गपाणे! आपके प्रति भक्ति रखनेवाले पुरुषोंको कहीं भी भय नहीं प्राप्त होता। कमलनयन! जिनकी जिह्वापर आपका मनोवांछित फल देनेवाला नाम शोभा पाता है, जिनके कानोंमें आपकी कथाके सुमधुर अक्षर पड़ते हैं तथा जिनके हृदयरूपी भित्तिपर आपका स्वरूप अंकित होता है, उनके लिये राजाका पद दुर्लभ नहीं है। प्रभो! ब्रह्माजी आपके युगल चरणारविन्दोंकी वन्दना करते हैं। आप लीलासे ही अनेक प्रकारके लीलामय स्वरूप धारण करते हैं। आप ही क्षणभरमें जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। आप ही विश्व हैं, आप ही विश्वसे परे विश्वनाथ हैं तथा आप ही इस विश्वके बीज (आदिकारण) हैं, मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप ही स्तुति करनेवाले हैं, आप ही स्तुति हैं और आप ही स्तवन करनेयोग्य देवता हैं। इस जगत्में जो कुछ है, वह सब एकमात्र आप ही हैं। विष्णो! आपसे भिन्न किसी भी वस्तुको मैं नहीं जानता, आप संसारबन्धनका नाश करनेवाले हैं, सांसारिक विषयोंके प्रति होनेवाली मेरी तृष्णाका सदाके लिये नाश कीजिये।
इस प्रकार भगवान् विष्णुकी स्तुति करके महातपस्वी अग्निविन्दु चुप हो गये। तब वर देनेवाले भगवान् विष्णुने मुनिसे इस प्रकार कहा— 'अग्निविन्दो! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'
अग्निविन्दु बोले—भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही माँगता हूँ कि आप सर्वव्यापी होकर भी समस्त जन्तुओं, विशेषतः मुमुक्षु जीवोंके हितके लिये यहाँ पंचनदतीर्थमें निवास करें। साथ ही मुझे आपके चरणारविन्दोंमें भक्ति प्राप्त हो। इसके सिवा मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता हूँ।
इस प्रकार दूसरोंके उपकारके लिये माँगे हुए अग्निविन्दुके वरको सुनकर भगवान् मधुसूदन बड़े प्रसन्न हुए और बोले—मुनिश्रेष्ठ! तथास्तु, तुम जैसा चाहते हो वैसा ही होगा। मैं काशीपुरीके प्रति भक्ति रखनेवाले मनुष्योंको मुक्तिमार्गका उपदेश करता हुआ इस तीर्थमें निश्चय ही निवास करूँगा। मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो। मुने! यह काशीपुरी जबतक यहाँ विद्यमान है, तबतक मैं यहाँ रहूँगा।
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर महामुनि अग्निविन्दु फिर बोले—माधव! इस कल्याणमय पंचनदतीर्थमें मेरे नामसे स्थित होकर आप भक्त और अभक्त सभी जीवोंको सदा मुक्ति प्रदान करें। जो इस पंचनदतीर्थमें स्नान करके यहाँसे जाकर देशान्तरमें भी मृत्युको प्राप्त हों उनको भी आप निश्चय ही मुक्ति दें।
भगवान् विष्णु बोले—मुने! तुमने जो वर