भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 867

८३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

काशीखण्ड ( उत्तरार्ध )

अरुणादित्य, वृद्धादित्य, केशवादित्य, विमलादित्य, गंगादित्य तथा यमादित्यकी महिमाका वर्णन

स्कन्दजी कहते हैं—महामते! विनतानन्दन अरुणने काशीमें तपस्या करके भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे प्रसन्न होकर आदित्यने अरुणको अनेक वर दिये और उन्हींके नामपर अरुणादित्य नामसे विख्यात हुए।

सूर्यदेव बोले—विनतानन्दन! तुम जगत्‌के हितके लिये घोर अन्धकारका नाश करते हुए सदा मेरे रथपर आगे सारथिके स्थानपर बैठा करो। जो यहाँ अरुणादित्य नामसे प्रसिद्ध मेरा निरन्तर पूजन करेंगे, उन्हें दुःख, दरिद्रता और पापकी प्राप्ति नहीं होगी। वे न तो रोगोंसे पीड़ित होंगे और न उन्हें कोई उपद्रव ही सतावेंगे।

ऐसा कहकर भगवान् सूर्य उन्हें रथपर बिठाकर अपने साथ ले गये। तबसे लेकर आज भी प्रातःकाल सूर्यके रथपर अरुणका उदय होता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन सूर्यसहित अरुणको नमस्कार करता है, उसे दुःखका भय कहाँसे हो सकता है। जो श्रेष्ठ मनुष्य अरुणादित्यका माहात्म्य सुनेगा, उसे किसी प्रकारके पापकी प्राप्ति नहीं होगी।

अगस्त्य! अब वृद्धादित्यका माहात्म्य सुनो। प्राचीन कालमें काशीपुरीमें महातपस्वी वृद्ध हारीतने भगवान् सूर्यकी आराधना की। विशालाक्षी-देवीके दक्षिण भागमें सूर्यदेवकी शुभ लक्षणोंसे युक्त शुभदायिनी मूर्ति स्थापित करके दृढ़भक्तिके साथ उन्होंने सूर्यदेवका आराधन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने वृद्धतपस्वी हारीतसे कहा—'माँगो, तुम्हें कौन-सा वर अभीष्ट है, जो दिया जाय?'

मुनिने कहा—मुझको पुनः युवावस्था प्रदान कीजिये। युवावस्था प्राप्त होनेपर मैं उत्तम तपस्या करूँगा; क्योंकि तपस्या ही श्रेष्ठ धर्म है, तपस्या ही श्रेष्ठ धन है, तपस्या ही श्रेष्ठ काम है और तपस्या ही श्रेष्ठ मोक्ष है। जितेन्द्रिय पुरुष दीर्घकालतक तपस्या करनेके लिये ही चिरस्थायी आयु चाहते हैं। दान करनेके लिये ही धन चाहते हैं, पुत्र प्राप्त करनेके लिये ही स्त्री चाहते हैं और मोक्षके लिये ही उत्तम ज्ञान चाहते हैं। तब सूर्यदेवने तत्काल ही वृद्धहारीतका बुढ़ापा दूर करके उन्हें रमणीयताकी हेतु और पुण्यकी साधनभूता युवावस्था प्रदान की। इस प्रकार महामुनि वृद्धहारीतने काशीमें सूर्यदेवसे युवावस्था प्राप्त करके उग्र तपस्या की। वृद्धसे पूजित होनेके कारण वहाँ भगवान् सूर्य वृद्धादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। कुम्भज! बुढ़ापा, दुर्गति तथा रोगका नाश करनेवाले वृद्धादित्यकी काशीमें आराधना करके बहुतोंने सिद्धि प्राप्त की है। काशीमें रविवारके दिन वृद्धादित्यको नमस्कार करके मनुष्य मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसकी कभी भी दुर्गति नहीं होती।

मुने! इसके बाद मैं तुम्हें केशवादित्यका उत्तम माहात्म्य सुनाता हूँ, सुनो। जिस प्रकार भगवान् केशवके समीप पहुँचकर सूर्यदेवने ज्ञान प्राप्त किया था, वह प्रसंग इस प्रकार है। एक दिन आकाशमें विचरण करते हुए सूर्यदेवने काशीमें भगवान् केशवको विश्वनाथजीकी पूजा करते देखा। तब वे कौतूहलवश दूसरे रूपसे आकाशसे उतर आये और भगवान् केशवके समीप बैठे। उस समय वे मौन होकर अविचल भावसे स्थित हो महान् आश्चर्यमें डूबे हुए अवसरकी प्रतीक्षा करते रहे। जब भगवान् विष्णुने पूजा समाप्त की, तब सूर्यदेवने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। श्रीहरिने