संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 868, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८३९
सूर्यदेवको अपने समीप बैठा लिया। तत्पश्चात् नमस्कार करके सूर्यदेवने कहा—'जगत्पते ! आप सम्पूर्ण विश्वके पालक तथा समस्त जगत्के अन्तरात्मा हैं। जगत्पूज्य माधव ! क्या इस काशीपुरीमें आपके लिये भी कोई पूजनीय है? यह समस्त संसार आपसे ही प्रकट होता और आपमें ही लयको प्राप्त होता है। आप ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। नाथ ! समस्त संसारका सन्ताप दूर करनेवाले आप यह किसकी पूजा कर रहे हैं? आपके इस आश्चर्ययुक्त कार्यको देखकर ही मैं आपके समीप आया हूँ।'
सहस्रों किरणोंसे सुशोभित श्रीसूर्यदेवका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णुने हाथके संकेतसे उन्हें मना किया कि 'जोरसे न बोलो।' तत्पश्चात् श्रीसूर्यको समझाते हुए कहा—'इस काशीपुरीमें समस्त कारणोंके कारणभूत एकमात्र देवदेव, नीलकण्ठ, उमानाथ महादेवजी ही पूजनीय हैं। जन्म-मृत्यु और जराका नाश करनेवाले एकमात्र मृत्युंजय ही पूज्य देवता हैं। राजा श्वेत भगवान् मृत्युंजयकी पूजा करके स्वयं भी मृत्युंजय हो गये थे। कालके भी काल महाकालकी आराधना करके भृंगीने भी कालपर विजय पायी। मृत्युंजयकी पूजा करनेवाले शिलादपुत्र नन्दीको भी मृत्युने छोड़ दिया है। जिन्होंने लीलापूर्वक एक ही बाणके प्रहारसे त्रिपुरासुरपर विजय पायी, उन भगवान् भूतनाथकी आराधना करके कौन पुरुष पूजनीय नहीं हो सकता। वे भगवान् शिव तीनों लोकोंपर विजय पानेवाले सबके सार तत्त्व हैं; उनकी उत्तम आराधना कौन नहीं करेगा। जिनके नेत्रोंकी पलकके संकोचमात्रसे सम्पूर्ण जगत्का संकोच (प्रलय) हो जाता है और जिनके नेत्रोंके खुलनेसे ही समस्त संसारकी सृष्टि होती है, वे भगवान् शिव किसके परम पूजनीय नहीं हैं। यहाँ भगवान् शिवके शिवविग्रहकी पूजा करके मनुष्य शीघ्र ही चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है। काशीमें शिवलिंगकी आराधना करके मनुष्य क्षणभरमें सौ जन्मोंके संचित पाप-समूहको भी त्याग देता है। सूर्य ! तुम भी अपने महान् तेजको बढ़ानेवाली परम शोभा-सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये भगवान् महेश्वरके श्रीविग्रहकी पूजा करो।'
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर श्रीसूर्यदेव स्फटिक मणिका शिवलिंग बनाकर आज भी इसकी पूजा करते हैं। वे भगवान् केशवको गुरु मानकर उनके उत्तर भागमें आज भी स्थित हैं। इसीलिये वे केशवादित्यके नामसे विख्यात हैं। वे काशीमें अपने भक्तोंके अज्ञानमय अन्धकारको दूर करते हैं और पूजित होनेसे मनोवांछित फल देते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य काशीमें केशवादित्यकी आराधना करके उस परम ज्ञानको पा लेता है, जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ पादोदकतीर्थमें स्नान, सन्ध्या और तर्पण आदि करके जो केशवादित्यका दर्शन करता है, वह जन्मभरके पातकोंसे छूट जाता है। अगस्त्य ! यदि माघमासकी रथसप्तमी (अचला सप्तमी)—को रविवारका योग प्राप्त हो तो आदि-केशवके समीप पादोदकतीर्थमें प्रातःकाल स्नान करके केशवादित्यकी पूजा करनेसे मनुष्य सात जन्मोंके पातकोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। सप्तमीकी अधिष्ठात्री देवीसे यह प्रार्थना करे—'मैंने पहलेके सात जन्मोंमें जन्मभर जो-जो पातक किये हैं, उन सबको तथा मेरे रोग और शोकको भी माघमासकी सप्तमी नष्ट कर दे। हे माघकी सप्तमी! इस जन्मके किये हुए, दूसरे जन्मोंके किये हुए, मनसे, वाणीसे और शरीरसे किये हुए, जानकर या अनजानमें किये हुए—इन सात प्रकारके पापोंको, जो सात रोगोंसे युक्त हैं, तुम आजके स्नानसे हर लो।' इस प्रकार तीन मन्त्रोंका जप (मन्त्रार्थकी भावना) करके मनुष्य पादोदकतीर्थमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्रीकेशवादित्यका दर्शन करके वह क्षणभरमें पापमुक्त हो जाता है। केशवादित्यके माहात्म्यका श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेवाला मनुष्य पापसे लिप्त नहीं होता और भगवान् शिवकी भक्ति पा लेता है।
मुने ! इसके पश्चात् अब विमलादित्यका उत्तम माहात्म्य सुनो। काशीके परम सुन्दर हरिकेश—