भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 894

* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * \hfill ८६५

तर्पण करके प्रसन्नतापूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार दान देंगे, उनकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होगी। शुभे! शैलेश्वर नामवाले इस महालिंगमें मैं सदा निवास करूँगा तथा जो इस लिंगका पूजन करेगा उस मनुष्यको मैं परम मोक्ष प्रदान करूँगा। जो वरणाके सुन्दर तटपर शैलेश्वरका दर्शन करेंगे, काशीमें निवास करनेवाले उन लोगोंको कभी दुःख नहीं दबा सकेगा।'

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रत्नेश्वर लिंगकी महिमा

स्कन्दजी कहते हैं—मुने! शैलेश्वरका दर्शन करके पार्वतीसहित भगवान् शिव उस स्थानपर आये, जहाँ रत्नमय लिंग प्रकट हुआ था। सब प्रकारके रत्नोंसे प्रकट हुए उस शुभ लिंगका दर्शन करके भवानीने शंकरजीसे पूछा—'देवदेव! जगन्नाथ! आप सब भक्तोंको अभय देनेवाले हैं, यह लिंग कहाँसे प्रकट हुआ है? इसका मूल तो सातों पातालतक चला गया है! इसका क्या नाम है, क्या स्वरूप है और क्या प्रभाव है?'

महादेवजी बोले—देवि! तुम्हारे पिता गिरिराज हिमवान् तुम्हें देनेके लिये बहुतसे रत्नोंका भार यहाँ ला रहे थे, उन्हीं रत्नोंको यहाँ जमा करके वे पुनः अपने घर लौट गये। तुम्हारे या मेरे लिये काशीमें जो कुछ श्रद्धापूर्वक समर्पित किया जाता है, उसका फल ऐसा ही होता है। यहाँ जितने भी शिवलिंग हैं, उन सबमें यह श्रेष्ठ रत्नरूप है तथा मोक्षरत्नको देनेवाला है। इसलिये इसका नाम रत्नेश्वर है। काशीमें इसका प्रभाव बहुत बड़ा है। तुम्हारे पिताने जो यहाँ स्वर्णराशि जमा की है, उसीसे तुम यहाँ इस शिवलिंगके लिये मन्दिर बनवा दो। शिवमन्दिर बनानेसे या टूटे-फूटे मन्दिरकी मरम्मत करनेसे शिवलिंग-स्थापनका पुण्य अनायास ही प्राप्त हो जाता है।

'बहुत अच्छा' कहकर देवी पार्वतीने शिवमन्दिर बनवानेके लिये शिवनन्दी आदि असंख्य पार्षदोंको नियुक्त किया। उन पार्षदोंने एक ही पहरमें सुमेरुशिखरके समान सुन्दर सुवर्णमय मन्दिरका निर्माण कर दिया। तदनन्तर देवी पार्वतीने महादेव-जीको प्रणाम करके उस शिवलिंगकी महिमा पूछी।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवि! यह कल्याणदायक शिवलिंग अनादिसिद्ध है। इस समय तुम्हारे पिताके पुण्य-गौरवसे प्रकट हुआ है। यह गोपनीय वस्तुओंमें परम गोपनीय है और इस क्षेत्रमें समस्त मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाला है। कलियुगमें जो पापबुद्धिवाले मनुष्य हैं उनसे यह रहस्य प्रयत्नपूर्वक छिपाये रखनेयोग्य है। देवि! कोटि-कोटि रुद्रसूक्तोंके जपसे जो फल बताया गया है वह रत्नेश्वरकी पूजा करनेसे प्राप्त हो जाता है। सबको सब कुछ देनेवाले मेरे इस रत्नेश्वर लिंगका प्रभाव अनुपम है। इस लिंगकी आराधना करके सहस्रों सिद्धोंने सिद्धि प्राप्त की है। सुन्दरी! अबतक यह लिंग गुप्त रहा है, अब मेरे भक्त एवं तुम्हारे पिता हिमवान्‌ने अपने पुण्यसे उपार्जित महारत्नद्वारा रत्नेश्वरको प्रकट किया है। गिरिराजनन्दिनी! इस शिवलिंगमें मेरी निरन्तर प्रीति बनी रहती है। काशीमें इस शिवलिंगका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये।

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