संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कृत्तिवासेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—कुम्भज ! इस प्रकार भगवान् शंकर जब रत्नेश्वर लिंगकी महिमाका वर्णन कर रहे थे इसी समय सब ओरसे 'रक्षा करो, रक्षा करो' का महान् कोलाहल सुनायी दिया। लोग कह रहे थे 'यह वीर्यके मदसे उन्मत्त गजासुर आ रहा है जो महिषासुरका पुत्र है। वह जहाँ-जहाँ पृथ्वीपर पैर रखता है वहाँ-वहाँ उसके भारसे पृथ्वी डगमगाने लगती है। वह ब्रह्माजीके द्वारा कामदेवसे हारे हुए स्त्री-पुरुषोंसे अवध्य होनेका वरदान पाकर तीनों लोकोंको तृणके समान समझता है।'
तब त्रिशूलधारी भगवान् शिवने अपनी ओर आते हुए उस दैत्यको दूसरेसे अवध्य जानकर उसके ऊपर त्रिशूलका प्रहार किया। गजासुर उस त्रिशूलमें गुँथ गया और अपनेको भगवान्के सिरपर छत्र बना हुआ-सा मानकर उनसे इस प्रकार बोला—'शूलपाणे ! देवेश्वर ! मैं जानता हूँ, आपने कामदेवको परास्त किया है। अतः आपके हाथसे मेरा वध होना श्रेष्ठ ही है। मृत्युंजय ! मेरी एक बात सुनिये। एकमात्र आप ही सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय हैं और सबके ऊपर विराजमान हैं। फिर भी आज मैं आपके भी ऊपर स्थित हूँ। अतः मेरी ही विजय हुई है। आपके त्रिशूलके अग्रभागपर स्थित होकर आज मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ। एक दिन सभीको कालके द्वारा मरना है, परंतु ऐसी मृत्यु परम कल्याणके लिये होती है।'
उसका ऐसा वचन सुनकर कृपानिधान भगवान् शिव हँसते हुए बोले—गजासुर ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम अपने अनुकूल कोई वर माँगो।
गजासुर बोला—दिगम्बर ! यदि आप प्रसन्न हों तो मेरे इस चमड़ेको वस्त्रके स्थानमें धारण करें। इससे सदैव उत्तम गन्ध निकले और यह सदा अत्यन्त कोमल बना रहे। इसमें कभी किसी प्रकारकी मैल न बैठे और यह आपके अंगमें महान आभूषणकी भाँति सुशोभित हो। तपोधनोंकी महातपस्याजनित अग्निज्वालाको पाकर भी मेरा यह चर्म दग्ध नहीं हुआ है, अतः यह पुण्य और सुगन्धकी निधि है। इसे धारण करके आजसे आपका नाम 'कृत्तिवासा' हो जायगा।
तब 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शंकर बोले—दैत्य ! इस मुक्तिक्षेत्रमें तुम्हारा यह शरीर सबको मोक्ष देनेवाला मेरा लिंगविग्रह हो जाय। इसका नाम कृत्तिवासेश्वर होगा और यह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला होकर समस्त शिवलिंगोंका शिरोमणि होगा। रुद्र, पाशुपत, सिद्ध, ऋषि, तत्त्वचिन्तक, शान्त (मनको वशमें रखनेवाले), दान्त (जितेन्द्रिय), क्रोधको काबूमें रखनेवाले, द्वन्द्वरहित, परिग्रहशून्य तथा मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जो मेरे भक्त काशीपुरीमें रहकर मान और अपमानमें समभाव रखते तथा ढेला, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हैं, उन सबपर अनुग्रह करनेके लिये मैं कृत्तिवासेश्वर लिंगमें सदा निवास करूँगा। द्वापर और कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले पाप-बुद्धि मनुष्य भी कृत्तिवासेश्वरकी शरण लेकर सब पापोंसे मुक्त हो सुखसे मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, ठीक उसी तरह, जैसे पुण्यात्मा पुरुष प्राप्त करते हैं। जो माघ (फाल्गुन) कृष्णा चतुर्दशी (शिवरात्रि)-को उपवासपूर्वक कृत्तिवासेश्वरका पूजन करते हुए रातमें जागरण करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।
ऐसा कहकर देवेश्वर शिवने गजासुरके उस महान् चर्मको लेकर अपने ऊपर ओढ़ लिया। कुम्भज ! जिस दिन दिगम्बर-देवने कृत्तिवासा नाम धारण किया उस दिन बड़ा भारी उत्सव हुआ। जहाँ पृथ्वीपर त्रिशूल गाड़कर उस दैत्यको छत्रके समान धारण किया गया था, वहाँ उस शूलको उखाड़नेसे एक बड़ा भारी कुण्ड बन गया। उस कुण्डमें स्नान और पितरोंका तर्पण करके कृत्तिवासेश्वरका दर्शन करनेवाला मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। अगस्त्य ! कृत्तिवासेश्वरके