भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 896, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 896
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * | ८६७ ---|---

समीप वह कुण्ड लोकमें हंसतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। इस तीर्थके सब ओर मुनियोंद्वारा स्थापित दस हजार दो सौ शिवलिंग हैं जिनमें कात्यायनेश्वर प्रथम और च्यवनेश्वर अन्तिम हैं। इनमेंसे एक-एक शिवलिंग भी अपनी पूजा की जानेपर समस्त काशीवासी मनुष्योंको सिद्धि देनेवाला है।


विभिन्न तीर्थोंके देवविग्रहोंका काशीमें आगमन और उनका स्थान

स्कन्दजी कहते हैं—जहाँ महादेवजीने लीलापूर्वक गजासुरके चर्मको ओढ़ा था, वह स्थान रुद्रावासके नामसे विख्यात हुआ। तदनन्तर महादेवजी पार्वतीजीके साथ स्वेच्छानुसार कृत्तिवास तीर्थमें निवास करने लगे। वहीं नन्दीने आकर उन्हें प्रणामपूर्वक यह सूचना दी—'भगवन् ! तीनों लोकोंमें जो शुभ एवं मुक्तिदायक तीर्थ और देवता हैं, उन सबको मैं यहाँ ले आया हूँ। कुरुक्षेत्रसे उस तीर्थके साथ स्थाणु लिंगका आगमन हुआ है। कुरुक्षेत्रस्थली लोलार्कसे पश्चिम भागमें स्थित है। वह सब सिद्धियोंको देनेवाली है। ढुण्ढिराजसे उत्तर भागमें साधकको सिद्धि प्रदान करनेवाला देवदेवेश्वर नामसे प्रसिद्ध लिंग है। यहाँ गोकर्णस्थानसे स्वयं ही प्रकट हुआ महाबल नामक शिवलिंग साम्बादित्यके समीप स्थित है। ऋणमोचनसे पूर्वभागमें शशिभूषण नामक लिंग प्रतिष्ठित है। ॐकारेश्वर महालिंगसे पूर्व महाकाल नामक शिवलिंग है जो दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। श्रेष्ठ तीर्थ पुष्करसे आकर अयोगन्धेश्वर नामक शिवलिंग यहाँ स्वतः प्रकट हुआ है। मत्स्योदरीके उत्तर भागमें उसकी स्थिति है। महोत्कटेश्वर लिंग मरुत्कोटिसे आकर यहाँ प्रकट हुआ है। वह कामेश्वरके उत्तर भागमें है। विमलेश्वर लिंग भी विश्वस्थानसे यहाँ आया है। स्वर्नीलेश्वरसे पश्चिम भागमें उसका दर्शन होता है। जो मनुष्य इस अविमुक्त क्षेत्रमें महादेवजीका दर्शन करेगा, वह कहीं भी क्यों न मृत्युको प्राप्त हो, निश्चय ही भगवान् शिवके लोकमें जायगा। जिस लिंगस्वरूप महादेवने कल्पान्तरमें भी काशीपुरीका कभी त्याग नहीं किया, वह हिरण्यगर्भतीर्थसे पश्चिममें हैं। गयातीर्थसे यहाँ पितामहेश्वर लिंगका आगमन हुआ है, जो यहाँ फल्गु आदि साढ़े आठ करोड़ तीर्थोंके साथ वर्तमान है। प्रयागतीर्थके साथ शूलटंकेश्वर नामक महादेव वहाँसे स्वयं यहाँ आकर स्थित हुए हैं। परम सुन्दर मुक्तिमण्डपसे दक्षिण दिशामें उनका स्थान है। शंकुकर्ण नामक महाक्षेत्रसे यहाँ आकर महातेज नामक लिंग प्रकट हुआ है। उसका स्थान विनायकेश्वरसे पूर्वभागमें है। रुद्रकोटि नामक परम पावन तीर्थसे यहाँ स्वयं आकर महायोगीश्वर लिंग प्रकट हुआ है। वह पार्वतीश्वर लिंगके समीप स्थित है। उसके मन्दिरके सब ओर करोड़ों रुद्र-मन्दिर हैं, जो रुद्रमूर्तियोंद्वारा बड़े सुन्दर बनाये गये हैं। काशीमें वेदवादी विद्वान् उसे रुद्रस्थली कहते हैं। रुद्रस्थलीमें जिनकी मृत्यु हुई है वे कृमि, कीट, पतंग, पशु, पक्षी, मृग, मनुष्य, यज्ञदीक्षित यजमान अथवा म्लेच्छ ही क्यों न हों—साक्षात् रुद्रस्वरूप हो जाते हैं और उनका इस संसारमें पुनरागमन नहीं होता। कोई सकाम हो या निष्काम अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें ही क्यों न हो, यदि वह रुद्रस्थलीमें प्राण त्याग करता है तो उत्तम मोक्षको प्राप्त होता है। एकाम्बर क्षेत्रसे स्वयं भगवान् कृत्तिवासा यहाँ पधारे हैं। वे यहाँके कृत्तिवासेश्वर लिंगमें प्रतिष्ठित हैं। इस स्थानमें पार्वती और ऋषियोंके साथ भगवान् शिव स्वयं ही अपने भक्तोंके कानमें वेदोंद्वारा प्रशंसित तारक ब्रह्मका उपदेश करते हैं। साक्षात् भगवान् चण्डीश्वर मरु-जांगल क्षेत्रसे आकर इस सिद्धिदायक क्षेत्रमें विराज रहे हैं। कालञ्जरसे भगवान् नीलकण्ठ स्वयं ही इस तीर्थमें पधारे हैं और दन्तकूट नामक गणेशजीके समीप उनका स्थान है। काश्मीरसे बीजेश्वर लिंग