संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 900, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७१
पकड़ लो इसे। इसीको प्राप्त करनेके लिये मैंने देवर्षियों तथा राजाओंको बन्दी बनाया है। आज मेरे सौभाग्यका उदय होनेसे यह अनायास ही प्राप्त हो गयी। अन्तःपुरके रक्षको! इसे मेरे अन्तःपुरमें ले जाओ।
दैत्यराजके ऐसा कहनेपर जब रनिवासके रक्षक उस देवीको लेनेके लिये आये, तब उसने दैत्यराजसे कहा—दैत्यराज! हमलोग तो दूतियाँ हैं। दूतियाँ सदैव परवश होती हैं। कोई क्षुद्र पुरुष भी दूतको कभी पीड़ा नहीं देते, फिर जो तुझ-जैसे महाबली हैं, राजा हैं, वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? हमलोगोंकी जो स्वामिनी हैं उनको संग्राममें जीतकर तू हम-जैसी सहस्रों स्त्रियोंका यथेष्ट उपभोग कर सकता है।
कालरात्रिका यह वचन सुनकर काम और क्रोधसे मोहित हुए असुरने मृत्युकी दूतीके तुल्य उस एक ही दूतीको अपने लिये बहुत माना और अन्तःपुरके रक्षकोंको आदेश दिया कि 'इसे शीघ्र रनिवासमें पहुँचाओ।' दैत्यकी यह आज्ञा पाकर अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले सब खोजे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे, किंतु देवीने उन्हें पास आते ही हुंकारजनित अग्निसे शीघ्र भस्म कर दिया। यह देख दैत्यराज दुर्गने तीस हजार दैत्योंको भेजा और कहा—'दानवो! इस दुष्टाको पाशोंसे बाँधकर शीघ्र ले आओ।' दैत्यराजका यह आदेश पाकर बड़े-बड़े दैत्योंने उसे पकड़नेका प्रयास किया, परंतु देवीके निःश्वासवायुसे आहत होकर सब दूर चले गये। तदनन्तर देवी कालरात्रि वहाँसे उड़कर आकाशमार्गसे गमन करने लगीं। तब सहस्रों महादैत्य उनके पीछे लग गये। दैत्यराज दुर्गने भी दैत्योंकी असंख्य सेनाके साथ प्रस्थान किया। उस समय महादेवी विन्ध्याचलमें निवास करती थीं। कालरात्रिने वहाँ आकर देवीका दर्शन किया और दुर्गके अपराध भी कह सुनाये। दैत्यराज दुर्गने भी महादेवीको देखकर अपने सेनापतियोंको आदेश दिया—'वीरो! तुममेंसे जो कोई भी धैर्य, बुद्धि, बल अथवा छलसे भी इस विन्ध्यवासिनीको मेरे समीप ले आयेगा, उसे मैं अवश्य इन्द्रका पद दे दूँगा।'
दानवराजका यह वचन सुनकर दैत्य दोनों हाथ जोड़े हुए उच्चस्वरसे बोले—महाराज! यह कौन-सा कठिन कार्य है। एक तो वह अनाथ, दूसरे अबला। भला, उसको पकड़ लानेमें महान् प्रयत्नकी क्या आवश्यकता है। राजन्! आप हमारा पुरुषार्थ तो देखिये। हम केवल अपने बल-पराक्रमसे ही उस स्त्रीको आपके पास पकड़ लाते हैं।
ऐसा कहकर वे सब दैत्य एक ही साथ चल पड़े, सब ओरसे रणभेरियाँ बज उठीं। दैत्योंका यह आक्रमण देखकर देवता भी भयसे त्रस्त हो उठे, धरती काँपने लगी। तब महादेवीने अपने श्रीअंगोंसे सहस्रों शक्तियोंको प्रकट किया। उन शक्तियोंने इन महाबली दैत्योंकी सेनाके प्रत्येक सैनिकको आगे बढ़नेसे रोक दिया। मानो सीमाका उल्लंघन करके उमड़ता हुआ समुद्र ही रोक दिया गया हो। महादैत्योंने उस युद्धमें जिन-जिन भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार किया, उन सबको शक्तियोंने तृणके समान समझकर हाथमें ले-लेकर फेंक दिया। तब दैत्योंने मेघोंके समान अनेक प्रकारके अस्त्रों, वृक्षों तथा पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा की। यह देख विन्ध्यपर्वतपर निवास करनेवाली महामायाने प्रचण्ड धनुष लेकर उसपर वायव्यास्त्रका अनुसन्धान किया और उसके द्वारा शस्त्रास्त्रसमूहोंको लीलापूर्वक दूर फेंक दिया। तब महासुर दुर्गने अपनी सेनाको शस्त्रहीन देख एक जलती हुई शक्ति हाथमें ली और उसे देवीके ऊपर दे मारा, परंतु देवीने अपनी ओर आती हुई उस महावेगवती शक्तिको अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा चूर्ण कर डाला। शक्तिको टूटी हुई देख उस महादैत्यने चक्र चलाया, किंतु देवीके सैकड़ों बाणोंसे वह बीचमें ही कटकर टूक-टूक हो गया। तब दैत्यने सींगका बना हुआ धनुष लेकर देवीकी छातीमें ताककर बाण मारा, परन्तु देवीने कालदण्डके समान उस बाणको अपने