संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शीघ्रगामी बाणसे मारकर रोक दिया। यह देख दुर्गमासुरने प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित शूल लेकर बड़े वेगसे देवीके ऊपर चलाया, किंतु चण्डिकाने अपने शूलद्वारा उसे बीचमें ही काट दिया। शूलके असफल होनेपर दैत्यराज दुर्ग गदा हाथमें लेकर सहसा कूद पड़ा और देवीकी भुजामें आघात किया। देवीकी भुजासे टकराते ही उस गदाके टूट-फूटकर सहस्रों टुकड़े हो गये। तदनन्तर देवीने अपने बायें पैरसे दैत्यराजकी छातीमें मारा। इससे दैत्यराज घायल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और उसके हृदयमें बड़ी पीड़ा हुई। गिरनेके बाद पुन: उसी क्षण वह उठकर खड़ा हुआ और सहसा अदृश्य हो गया। उस समय जगदम्बाकी प्रेरणासे उनकी शक्तियाँ दैत्योंकी सेनामें इस प्रकार विचरण करने लगीं, जैसे प्रलयकालमें मृत्युकी सेना संसारमें विचरण करती है।
दुर्गदैत्यका वध, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति और दुर्गा नामकी प्रसिद्धि
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! देवीकी शक्तियोंने दैत्योंकी विशाल सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे प्रलयाग्निकी लपटें समस्त संसारको दग्ध कर देती हैं। इतनेमें ही दैत्यराज दुर्ग बादलोंकी आड़में खड़ा हो प्रचण्ड आँधी और बवण्डरके साथ कंकड़-पत्थरोंकी वर्षा करने लगा। तब महादेवीने शोषणास्त्रका प्रयोग करके पानी और पत्थरोंकी वर्षाको क्षणभरमें रोक दिया। यह देख दैत्यराजने क्रोधमें पर्वतके शिखरको उखाड़कर आकाशसे ही देवीके ऊपर गिराया। अपने ऊपर गिरते हुए उस पर्वतशिखरको देखकर महादेवीने वज्रके प्रहारसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तब वह दैत्य हाथीका स्वरूप धारण करके अपने कुण्डलमण्डित मस्तकको डुलाता हुआ शीघ्रतापूर्वक देवीके सम्मुख दौड़ा। उस पर्वताकार हाथीको आते देख भगवतीने शीघ्रतापूर्वक पाशसे बाँधकर उसकी सूँड़को तलवारसे काट डाला। तदनन्तर उसने भैंसेका स्वरूप धारण किया और अपने सींगोंसे पर्वतोंको उखाड़कर देवीके ऊपर फेंका। उसके उपद्रवसे समस्त ब्रह्माण्डको व्याकुल देखकर भगवतीने दानवपर त्रिशूलसे आघात किया। तब वह भैंसेका रूप छोड़कर सहस्र भुजाधारी पुरुष बन गया और देवीका हाथ पकड़कर उन्हें आकाशमें खींच ले गया। वहाँ ऊँचेसे उसने जगदम्बिकाको छोड़ दिया और क्षणभरमें बाणोंके जालसे उन्हें आच्छादित कर दिया। तब महादेवीने अपने बाणोंसे शरसमूहको काटकर एक महाबाणके द्वारा उस दैत्यको बींध डाला। देवीका वह बाण दैत्यकी छातीमें घुस गया, उसकी आँखें नाचने लगीं और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। महापराक्रमी दुर्गके गिरते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। समस्त संसारमें उल्लास छा गया। सूर्य, चन्द्रमा और अग्निदेवको अपने खोये हुए तेजकी प्राप्ति हुई। तदनन्तर सब देवता फूलोंकी वर्षा करते हुए महर्षियोंके साथ वहाँ आये और महादेवीकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—सम्पूर्ण जगत्का धारण-पोषण करनेवाली महादेवि! तुम्हें नमस्कार है। तीनों लोकोंकी उत्पत्तिकी आधारभूता महामहेश्वरकी शक्ति! तुम दैत्यरूपी वृक्षोंको काटनेके लिये कुठार हो, तुम्हें नमस्कार है। त्रैलोक्यव्यापिनी कल्याणमयी शिवे! तुम्हें नमस्कार है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाली तथा अपने व्यग्र हाथोंमें शार्ङ्ग-धनुषको उठानेवाली विष्णुस्वरूपे देवि! तुम्हें नमस्कार है। सबकी सृष्टि करनेवाली, प्राचीनोंकी भाषा, संस्कृतिकी जन्मभूमि तथा हंसकी सवारीसे यात्रा करनेवाली चतुराननस्वरूपे देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं इन्द्र, कुबेर, वायु, वरुण, यम, निर्ऋति, ईशान और अग्निकी शक्ति हो, तुम्हीं चन्द्रमाकी चाँदनी और सूर्यकी शक्ति प्रभा हो। तुम्हीं सर्वदेवमयी