संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 902, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७३
शक्ति और तुम्हीं परमेश्वरी हो। तुम्हीं गौरी हो, तुम्हीं सावित्री हो और तुम्हीं गायत्री एवं सरस्वती हो। तुम्हीं प्रकृति, तुम्हीं मति और तुम्हीं अहंकारस्वरूपा हो। तुम्हीं चित्त और समस्त इन्द्रियरूप हो, पंचतन्मात्राएँ भी तुम्हारा ही स्वरूप हैं। पंचमहाभूत-स्वरूपा जगदम्बिके! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं शब्दादि विषयरूपिणी हो, तुम्हीं इन्द्रियोंकी अधिष्ठातृ देवता हो, देवि! तुम्हीं ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेवाली हो तथा इस ब्रह्माण्डके भीतर भी तुम्हीं व्याप्त हो। महादेवि! तुम्हीं पराशक्ति और तुम्हीं परापर (कार्य-कारण)-स्वरूपा तथा तुम्हीं पर और अपरसे भी परे रहनेवाली परमात्मस्वरूपिणी हो। ईशानि! तुम्हीं सर्वरूपा हो और तुम्हीं सर्वव्यापिनी निराकारस्वरूपा हो। महामाये! तुम्हीं चित्-शक्ति, तुम्हीं स्वाहा और तुम्हीं स्वधा हो। अकृतस्वरूपे! वषट् और वौषट् भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं प्रणव हो तथा अन्य सब मन्त्र भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। ब्रह्मा आदि सब देवता तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों वर्ग तुम्हारे ही स्वरूप हैं। चारों पुरुषार्थरूपी फलका उदय तुम्हींसे होता है। यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हींसे उत्पन्न हुआ है, तुम्हींमें स्थित है और तुम्हींमें इसका लय होता है। तुम्हीं जगत्की आधारशक्ति हो। दृश्य, अदृश्य, स्थूल और सूक्ष्मरूपसे जो कुछ उपलब्ध होता है, सबमें तुम्हीं शक्तिरूपसे विद्यमान हो। तुम्हारे बिना कहीं किसी भी वस्तुकी स्थिति नहीं है। प्रणतजनोंको सदा शरण देनेवाली देवि! मातः! आज तुमने महादैत्यपति दुर्गको, जो स्वभावसे ही देवताओंके विरुद्ध दैत्यसेनाको प्रेरित करता रहता था, मारकर हमारी रक्षा की है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन है, जिसकी शरणमें हम जायँ? तुम्हीं हमें शरण देनेवाली हो। अहो! इस युद्धमें वह दुर्ग नामक दैत्य तुम्हारे अमृतमय दृष्टिपातको पाकर जो मृत्युके अधीन हुआ है, यह बड़ी ही अद्भुत बात है। भवानी! आज हमलोगोंने यह जान लिया कि तुम्हारी दृष्टिमें पड़कर कोई दुष्ट भी दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता। देवि! आपकी शस्त्राग्निमें पतंगोंकी भाँति जलकर भी दैत्यलोग सूर्यकी-सी कान्ति प्राप्त करके दिव्य धामको जा रहे हैं। सच है, संतपुरुष दुष्टोंके प्रति भी दुष्टबुद्धि नहीं करते, अपितु साधुओंके प्रति जैसा स्नेह रखते हैं वैसा ही स्नेह उन दुष्टोंके प्रति भी रखकर उन्हें अपना मार्ग प्रदान करते हैं। मृडानी! हम तुम्हारे चरणोंमें नतमस्तक हैं, तुम सदा अब ओरसे हमारी रक्षा करो। भवानी! तुम प्रतिक्षण पग-पगपर विपत्तियोंसे हम सबकी रक्षा करो।
इस प्रकार जगदम्बाकी स्तुति करके ऋषि, गन्धर्व और चारणोंसहित इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने जगदम्बाके चरणोंमें बारंबार प्रणाम किया। तब सन्तुष्ट हुई जगन्माता महादेवीने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—'आजसे सब देवता पहलेकी भाँति अपने-अपने अधिकारोंका पालन करें। तुमलोगोंने जो यह मेरी यथार्थ स्तुति की है, इससे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हें दूसरा वरदान देती हूँ। जो मनुष्य पवित्रभावसे भक्तिपूर्वक इस स्तुतिद्वारा मेरा स्तवन करेगा उसकी विपत्तिका मैं पग-पगपर नाश करूँगी। संग्राममें अत्यन्त दुर्गम दुर्ग नामक दैत्यको मार गिरानेके कारण आजसे मेरा 'दुर्गा' नाम प्रसिद्ध होगा*। जो मुझ दुर्गाकी शरणमें आयेंगे, उनकी कभी दुर्गति नहीं होगी। यह वज्रपिंजर नामवाली दुर्गास्तुति पुण्यकी वृद्धि करनेवाली है।'
देवताओंको इस प्रकार वरदान देकर महादेवी उसी समय अन्तर्धान हो गयीं और स्वर्गवासी देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। कुम्भज! इस प्रकार महादेवीका नाम दुर्गा हुआ। काशीमें अष्टमी, चतुर्दशी एवं विशेषतः मंगलवारको दुर्गतिनाशिनी दुर्गादेवीका सदैव पूजन करना चाहिये। नवरात्रमें प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन पूजित हुई दुर्गादेवी
* अद्यप्रभृति मे नाम दुर्गेति ख्यातिमेष्यति। दुर्गदैत्यस्य समरे पातनाद्दतिदुर्गमात्॥ (स्क० पु०, का० उ० ७२। ७१)