भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 903
८७४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

समस्त विघ्नसमूहोंका नाश और सद्बुद्धि प्रदान करेंगी। काशीमें दुर्गाकुण्डके भीतर स्नान करके समस्त दुर्गम पीड़ाओंका नाश करनेवाली दुर्गादेवीकी विधिवत् पूजा करनेवाला मनुष्य नौ जन्मोंके पापको त्याग देता है। दुर्गादेवी अपनी शक्तियोंके साथ सब ओरसे काशीकी रक्षा करती हैं। महादेवीकी उन कालरात्रि आदि शक्तियोंका प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य नाना शक्तियोंसे युक्त इस दुर्गविजय नामक पुण्यमय अध्यायको श्रवण करता है वह दुर्गम संकटसे शीघ्र ही पार हो जायगा।

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काशीके अट्ठाईस प्रमुख लिंगोंका संक्षिप्त वर्णन तथा ॐकारेश्वरके प्राकट्यकी कथा, ब्रह्माजीके द्वारा ॐकारेश्वरका स्तवन और उनकी महिमा

अगस्त्यजीने पूछा— षडानन! जगदम्बा पार्वतीजीके साथ त्रिलोचन महादेवके समीप जाकर भगवान् शिवने क्या किया?

स्कन्दजी बोले— अगस्त्यजी! त्रिलोचन (या त्रिविष्टप) लिंगके समीप जानेपर माता पार्वतीदेवीने भगवान् शिवसे कहा—‘देवदेव! विश्वनाथ! आप सर्वव्यापी तथा सब कुछ देनेवाले हैं। आप ही सबके साक्षी तथा जनक हैं। आपका परम प्रिय यह क्षेत्र कर्मजनित रोगकी ओषधि है, मोक्षलक्ष्मीका लीला निकेतन है। मुझे भी यह क्षेत्र अत्यन्त प्रिय है। इस क्षेत्रके एक-एक धूलि-कणके समक्ष सम्पूर्ण त्रिलोकी भी तिनकेके समान है। फिर इस सम्पूर्ण तीर्थकी महिमाको कौन जान सकता है? प्रभो! मैं यह जानना चाहती हूँ कि इस काशीधाममें कौन-कौनसे शिवलिंग अनादिसिद्ध हैं, जिनका जन्मभरमें एक बार भी पूजन करनेसे काशीमें स्थित सम्पूर्ण लिंग पूजित हो जाते हैं? मुझे उन सबका परिचय दीजिये।'

देवीका यह वचन सुनकर महेश्वरने कहा—प्रिये! जिनके नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे समस्त पाप क्षीण हो जाते हैं और पुण्यराशिकी प्राप्ति होती है, ऐसे स्थूल, सूक्ष्म एवं रत्ननिर्मित शिवलिंग काशीमें असंख्य हैं। अनेकों धातुमय लिंग हैं और बहुतसे प्रस्तरमय लिंग भी हैं। इनमें बहुतेरे तो स्वयम्भू हैं—स्वतः प्रकट हुए हैं और बहुतसे देवताओं एवं ऋषियोंद्वारा स्थापित किये हुए हैं। सुन्दरि! तुमने जिन शिवलिंगोंका परिचय पूछा है, उनका वर्णन करता हूँ। वे लिंग कलियुगमें अत्यन्त गोप्य होंगे, परंतु उनका प्रभाव अपने-अपने स्थानका परित्याग नहीं करेगा। जो कलियुगके पापसे पुष्ट हो रहे हैं तथा जो दुष्ट, नास्तिक और शठ हैं, वे इन सिद्ध लिंगोंके नाम भी नहीं जान सकेंगे। उनमेंसे प्रथम ॐकार लिंग है, दूसरा त्रिलोचन, तीसरा महादेव, चौथा कृत्तिवासा, पाँचवाँ रत्नेश्वर, छठा चन्द्रेश्वर, सातवाँ केदारेश्वर, आठवाँ धर्मेश्वर, नवाँ वीरेश्वर, दसवाँ कामेश्वर, ग्यारहवाँ विश्वकर्मेश्वर, बारहवाँ मणिकर्णीश्वर, तेरहवाँ अविमुक्तेश्वर और चौदहवाँ विश्वेश्वर महालिंग है। प्रिये! ये चौदहों लिंग कल्याणके हेतु हैं, इनका समुदाय ही मुक्तिक्षेत्र कहा गया है। ये सब इस क्षेत्रके अधिष्ठाता देवता हैं और आराधना करनेपर मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं। प्रिये! इस आनन्दकाननमें देहधारियोंकी मुक्तिके लिये ये ही चौदह महालिंग परम पूजनीय माने गये हैं। प्रत्येक मासकी मंगलमयी प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीतक इन प्रधान-प्रधान लिंगोंकी यत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। जो इन चौदह महालिंगोंकी आराधना करता है, उसकी इस संसारमार्गमें कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। यह काशीतीर्थका अनुपम कोष है, इसको जहाँ-तहाँ सब ओर प्रकाशित नहीं करना चाहिये। देवि! बहुत बड़ी विपत्तिमें भी इन लिंगोंके नामोंका उच्चारण किया जाय तो ये सब दुःख हर लेते हैं। यह इस क्षेत्रका परम गोपनीय रहस्य है। गिरिराजकुमारी! ये चौदह लिंग मेरे सामीप्यकी