संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-उत्तरार्ध *
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प्राप्ति करानेवाले तथा अविमुक्त धामके हृदय हैं। प्रिये! इस क्षेत्रमें निश्चय ही सबकी मुक्ति होती है, ऐसी जो प्रसिद्धि है, उसमें ये मेरे चौदह महालिंग ही कारण हैं। जिन भक्तों ने आनन्द-वनमें इन लिंगोंका चिन्तन किया है, वे ही व्रतधारी और तपस्वी हैं। जिन्होंने दूरसे भी इन लिंगोंका दर्शन कर लिया है, वे ही उत्तम योगाभ्यासी और महादानी हैं।
तदनन्तर भगवान् शंकरने अपने भक्तोंके हितके लिये पार्वतीदेवीसे अन्य लिंगोंका भी इस प्रकार परिचय दिया—शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भेश्वर, ईशानेश्वर, गोप्रेक्षेश्वर, वृषभध्वजेश्वर, उपशान्तेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, निवासेश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर और जम्बुकेश्वर—ये चौदह लिंग भी काशीके महत्त्वपूर्ण आयतन हैं। इनकी सेवासे भी मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है। वैशाख कृष्ण प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीतक श्रेष्ठ पुरुषोंको इन लिंगोंकी पूजा करनी चाहिये। देवि! इनमेंसे एक-एक लिंगकी महिमाका भी कहीं आदि-अन्त नहीं है।
पार्वतीजी बोलीं—समस्त कारणोंके ईश्वर महादेव! आपने जो यह कहा है कि पूर्वोक्त लिंगोंमेंसे एक-एक लिंग भी काशीमें परम मोक्षका कारण है, इससे मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ गयी है। जिनके नामश्रवणसे भी समस्त पापोंका अपहरण हो जाता है, उन चौदह लिंगोंमेंसे प्रत्येककी महिमाका वर्णन कीजिये। ॐकारेश्वर लिंगका स्वरूप क्या है, उनकी क्या महिमा है, पूर्वकालमें किसने इनकी आराधना की थी और आराधित होनेपर इन्होंने उसे कौन-सा फल प्रदान किया था?
महादेवजीने कहा—महादेवी! पूर्वकालकी बात है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने आनन्दवनमें समाधि लगाकर बड़ी भारी तपस्या की। तपस्या करते-करते जब एक सहस्र युग बीत गया तब सातों पातालोंका भेदन करके उनके आगे एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उसके प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं। उनकी निर्व्याज समाधिसे जो परम ज्योति अन्तःकरणमें प्रकट हुई थी, वही बाहर व्यक्त हो गयी। ब्रह्माजीने समाधि त्याग करके जब आँखें खोलीं तब सामने आदि अक्षर ॐकारको प्रकट देखा। उसीमें अकारका दर्शन हुआ जो सत्त्वगुणसम्पन्न, ऋग्वेदका अधिष्ठान, सृष्टिपालक, साक्षात् नारायणस्वरूप तथा अज्ञानमय अन्धकारसे परे प्रतिष्ठित है। उसके बाद उकार दृष्टिगोचर हुआ जो रजोगुणस्वरूप, यजुर्वेदकी उत्पत्तिका स्थान तथा उन्हींके प्रतिबिम्बित स्वरूपकी भाँति ब्रह्ममय प्रतीत होता था। उसके बाद ब्रह्माजीने मकारको प्रत्यक्ष किया जो किसी प्रकारकी ध्वनिसे रहित, अन्धकारके संकेतस्थानके सदृश तथा तमोगुणस्वरूप ज्ञात हुआ। वह साक्षात् रुद्रस्वरूप मकार भी सामवेदकी उत्पत्तिका स्थान है। उसके बाद ब्रह्माजीने परमानन्दस्वरूप परा वाणीके आश्रयभूत नादतत्त्वका साक्षात्कार किया, जिसकी आकृति विश्वरूपमय है तथा जो सगुण और निर्गुणस्वरूप है। उसीको शब्दब्रह्म कहते हैं तथा वही समस्त वाङ्मयका कारण है। तत्पश्चात् विधाताने तपस्यासे प्रत्यक्ष हुए विन्दुतत्त्वका अवलोकन किया, जो समस्त कारणोंका भी कारण, समस्त जगत्की उत्पत्तिका स्थान तथा परम शिवरूप है। अपने प्रभावसे सबका अवन- (रक्षण) करनेके कारण प्रणवको ॐ कहते हैं अथवा भक्तमुन्नयति—भक्तको ऊर्ध्वलोकमें ले जाता है, इसलिये जिसे ॐ कहते हैं वह प्रणव निराकार होकर भी साकाररूपसे ब्रह्माजीको दृष्टिगोचर हुआ। जो अपने जपमें मन लगानेवाले भक्तको भवसागरसे तार देता है, इसीलिये जिसे 'तार' कहते हैं, उसी प्रणवका ब्रह्माजीने साक्षात्कार किया। समस्त मोक्षकामी पुरुषोंद्वारा यह प्रणुत्त (स्तुत अथवा प्रशंसित) होता है, इसलिये इसका नाम प्रणव है अथवा यह अपनी उपासना करनेवाले पुरुषोंको परम पदमें पहुँचाता है, इस कारण इसे प्रणव कहते हैं। वेदत्रयी जिसका स्वरूप है, जो तुरीय, तुरीयातीत और सर्वात्मक है उसी नादविन्दुस्वरूप