संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ॐकारका ब्रह्माजीको प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। जिससे अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद प्रकट होते हैं, जो वृषभरूप यज्ञमय परमेश्वर मन्त्र, ब्राह्मण और कल्प—तीनोंसे सम्बद्ध होकर बार-बार शब्द करता है अर्थात् वैदिक मन्त्रोंसे ध्वनित होता है, जो तेजोमय तथा सबसे श्रेष्ठ है। जिसमें ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का लय होता है, इसीलिये जो साधुपुरुषोंद्वारा लिंग-नामसे पूजित होता है उसी ॐकार लिंगका ब्रह्माजीने प्रत्यक्ष दर्शन किया। तदनन्तर अ, उ, म, नाद, विन्दु—इन पाँच अक्षरोंसे युक्त प्रपंचसे भिन्न लिंगरूपधारी ॐकारेश्वरका ब्रह्माजीने इस प्रकार स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले—सदाशिव! अक्षरस्वरूप धारण करनेवाले आप ॐकाररूप परमेश्वरको नमस्कार है। आप ही अकार आदि अक्षरोंके उत्पत्तिस्थान हैं, आपको नमस्कार है। निराकार परमात्मन्! आप अकार, उकार और मकार हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आपके ही स्वरूप हैं, आप रूपातीत परमेश्वरको नमस्कार है। आप ही नाद, विन्दु और कलास्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। लिंगरहित होते हुए भी लिंगरूपसे प्रकट होनेवाले आप सर्वस्वरूप महेश्वरको नमस्कार है। आप आदि-अन्तसे रहित एवं तेजकी निधि हैं, आपको नमस्कार है। आप भव (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), रुद्र (दुःख दूर करनेवाले) और शर्व (संहारकारी) हैं, आपको नमस्कार है। आप पापियोंके लिये उग्र और भीमरूप हैं, आपको नमस्कार है। पशुओं (अज्ञानी जीवों)-का पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप तारक प्रणवरूप हैं, आपसे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है, आपको नमस्कार है। आप मायासे परे परम कल्याणस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ—ये सब स्वर आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। 'क'से लेकर 'ह'तक सम्पूर्ण व्यंजन भी आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। उदात्त, अनुदात्त और स्वरितरूप आपको बार-बार नमस्कार है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतके नियन्ता तथा विसर्गसहित वर्णस्वरूप आपको नमस्कार है। अनुस्वाररूप आपको नमस्कार है। अनुनासिकमय आपको नमस्कार है। निरनुनासिक अक्षर तथा दन्त और तालुसे उच्चारित होनेवाले वर्ण आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। ओष्ठ और हृदयसे निकलनेवाले अक्षर भी आपसे भिन्न नहीं हैं, ऊष्मा और अन्तःस्थवर्ण आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्येक वर्गके पंचम वर्ण हैं, आपको नमस्कार है। आप पिनाक धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही निषाद (किरात) और निषादोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। वीणा, वेणु और मृदंग आदि वाद्य भी आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। उच्च और गम्भीर ध्वनि-स्वरूप आपको नमस्कार है। आप पापियोंके लिये घोर (भयंकर) और भक्तोंके लिये अघोर (सौम्य)-रूप धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप ही तानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ही इक्कीस मूर्छनाओंके पति हैं, आपको नमस्कार है। स्थायी और संचारीके भेदसे द्विविध भावरूप आपको नमस्कार है। आप तालप्रिय, तालस्वरूप तथा लास्य और ताण्डव नृत्यको प्रकट करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। तौर्यत्रिक (नृत्य, गान और वाद्य) आपका स्वरूप है। आप नृत्य, गान और वाद्यके बड़े प्रेमी हैं तथा भक्तिपूर्वक नृत्य, गान एवं वाद्यके द्वारा आपकी आराधना करनेवाले भक्तोंको आप मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं, आपको नमस्कार है। स्थूल और सूक्ष्म आपके ही स्वरूप हैं। दृश्य और अदृश्य रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। अर्वाचीन (नवीन) और प्राचीन सब आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। वाणीका विस्तार भी आपका ही रूप है। आप समस्त वाङ्मय-प्रपंचसे परे हैं, आपको नमस्कार है। एक, अनेक रूप तथा सत्-असत्के स्वामी आपको नमस्कार है। शब्दब्रह्म (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है। परब्रह्म! आपको नमस्कार है। वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य आपको नमस्कार है। वेदोंका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप वेदस्वरूप हैं, आपका रूप