संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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त्रिलोचन लिंगकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! महादेवजीने त्रिविष्टप लिंगकी उत्पत्तिके विषयमें जो श्रमहारिणी कथा कही है, उसे सुनाता हूँ, सुनो।
महादेवजी बोले—पार्वती! पृथ्वीपर यह आनन्दवन सबसे श्रेष्ठ है। इसमें भी सब तीर्थ श्रेष्ठ हैं। तीर्थोंमें भी ॐकारेश्वरकी भूमि श्रेष्ठ है। मुक्तिका मार्ग प्रकाशित करनेवाले ॐकारेश्वर लिंगसे भी अत्यन्त श्रेष्ठ कल्याणस्वरूप त्रिलोचन लिंग है। जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य और दर्शनीय वस्तुओंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त लिंगोंमें त्रिलोचन लिंग श्रेष्ठ है। जो महाबुद्धिमान् मनुष्य काशीमें त्रिलोचन लिंगकी पूजा करते हैं वे मेरी प्रीति चाहनेवाले त्रिलोकनिवासियोंके द्वारा पूजनीय हैं। गिरिराजनन्दिनी! यद्यपि ॐकार आदि सभी मुख्य लिंग समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं, परन्तु भगवान् त्रिलोचनकी शक्ति कुछ और ही है। प्रिये! पूर्वकालमें जब मैं योगयुक्त होकर बैठा था, उस समय यह महान् लिंग सात पातालोंका भेदन करके भूतलसे मेरे सामने प्रकट हुआ था। यह त्रिलोचन लिंग ज्ञानदृष्टि देनेवाला बताया गया है। जो भगवान् त्रिलोचनके भक्त हैं वे सभी त्रिलोचनस्वरूप हैं, मेरे पार्षद हैं और जीवन्मुक्त हैं। वैशाख शुक्ला तृतीयाको पिलपिला कुण्डमें स्नान करके जो भक्तिपूर्वक उपवास करके रात्रिमें जागरण और त्रिलोचनकी पूजा करते हैं, फिर प्रातःकाल वहीं स्नान करके त्रिलोचन लिंगकी पूजा करके पितरोंके उद्देश्यसे अन्न और दक्षिणासहित धर्मघट दान करते हैं, तत्पश्चात् शिवभक्तोंके साथ बैठकर पारणा करते हैं वे इस पार्थिव शरीरका त्याग करके पुण्यसे प्रेरित हो निश्चय ही मेरे आगे चलनेवाले पार्षद होते हैं।
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! प्राचीन रथन्तर कल्पकी बात है। भगवान् त्रिलोचनके मणि-माणिक्यनिर्मित मन्दिरमें कभी कबूतरोंका एक जोड़ा निवास करता था। वे दोनों कबूतर प्रतिदिन प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें मन्दिरकी परिक्रमा करते हुए सब ओर उड़ते और अपने पंखोंकी हवासे मन्दिरमें लगी हुई धूलको दूर किया करते थे। भक्तलोग जो सदा त्रिलोचन और त्रिविष्टप आदि नामोंका उच्चारण करते वह सब उनके कानोंमें पड़ा करता था। उन दोनों पक्षियोंके नेत्रोंमें मंगल आरतीकी दिव्य ज्योति पड़कर उन्हें भक्तजनोंकी चेष्टाएँ दिखाती थी। कभी-कभी तो वे युगल पक्षी वहाँका कौतुक देखते हुए चारा चुगनेकी भी चिन्ता छोड़ देते और स्थिर चित्तसे वहीं ठहरकर दर्शन करते थे, वहाँसे उड़कर किसी अभीष्ट स्थानको नहीं जा पाते थे। भक्तजनोंसे भरे हुए उस मन्दिरके चारों ओर बिखरे चावलके दानोंको चुगते-चुगते वे परिक्रमा किया करते थे। भगवान् त्रिलोचनके दक्षिण भागमें चतुःस्रोतस्विनीका सुन्दर जल था। तृषासे आतुर होनेपर वे उसीका जल पीते और कभी-कभी उसमें स्नान भी कर लेते थे। इस प्रकार त्रिलोचनके समीप उत्तम चेष्टाके साथ विचरते हुए उन पक्षियोंके बहुत वर्ष बीत गये।
तदनन्तर देवमन्दिरके स्कन्धभागमें गवाक्षके भीतर सुखपूर्वक बैठे हुए उन दोनों पक्षियोंको एक बाजने बड़ी क्रूर दृष्टिसे देखा। एक दिन वह बाज फिर आया। तब डरी हुई कबूतरीने कहा—'प्रियतम! यह स्थान दुष्टकी दृष्टिसे दूषित हो गया है। अतः इसको त्याग देना चाहिये।' यह सुनकर कबूतरने अवहेलनापूर्वक कहा—'प्रिये! वह मेरा क्या कर लेगा।'
कबूतरी बोली—जो उपद्रव आनेपर भी अपने स्थानको छोड़कर अन्यत्र नहीं चला जाता वह पंगु नदीके किनारेके वृक्षकी भाँति नाशको प्राप्त होता है। नाथ! जबतक यह कालरूपी बाज हमलोगोंसे बहुत दूर है, तभीतक तुम मुझे त्यागकर