भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 908
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७९

भी दूर चले जाओ, क्योंकि तुम्हारे जीवित रहनेपर इस भूतलमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। तुम्हें पुनः स्त्री, मित्र, धन और गृह प्राप्त हो जायगा। यदि पुरुषने स्त्री और धनके द्वारा भी अपने आपकी रक्षा कर ली तो राजा हरिश्चन्द्रकी भाँति उसे इस लोकमें सब कुछ मिल जाता है। यह आत्मा ही प्रिय बन्धु है और यह आत्मा ही महान् धन है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका उपार्जन करनेवाला भी यह आत्मा ही है। जबतक आत्मामें क्षेम है, तभीतक त्रिलोकीमें क्षेम है किंतु उत्तम बुद्धिसे युक्त पुरुष उस क्षेमको भी यशके साथ प्राप्त करना चाहते हैं। जिस क्षेममें सुयशका अभाव है उससे तो मृत्यु ही अच्छी है। पुरुष जब नीतिके मार्गपर चलता है तभी उसे यशकी प्राप्ति होती है। अतः नाथ! इस नीतिके मार्गका श्रवण करके इस स्थानसे अन्यत्र चले जाइये।

उत्तम बुद्धिवाली अपनी स्त्री कपोतीके ऐसा कहनेपर भी कबूतर उस स्थानसे नहीं निकला। तब प्रातःकाल आकर उस बलवान् बाजने कपोतके निकलनेके मार्गको रोक लिया और उससे कहा—'कपोत! तुझे धिक्कार है, तुझमें तो जरा भी पौरुष नहीं है। अरे! दुर्बुद्धि! या तो युद्ध कर या मेरी बात मानकर यहाँसे निकल भाग। यदि भूखसे क्षीण होकर तू यहाँ प्राण देगा तो तुझे पीछे निश्चय ही नरकमें जाना पड़ेगा। उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य पुरुषार्थका आश्रय लेकर संकटसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न करते हैं।' इस प्रकार बाजके फटकारने और पत्नीके उत्साह दिलानेपर कबूतर अपने दुर्गके द्वारपर आकर उस बाजसे युद्ध करने लगा। बेचारा भूख-प्याससे पीड़ित था, अतः बलवान् बाजने उसे पंजोंसे पकड़ लिया और कबूतरीको भी चोंचमें दबा लिया। इस प्रकार उन दोनोंको पकड़कर बाज शीघ्र ही आकाशमें उड़ गया। तब कबूतरीने कहा—'नाथ! यह स्त्री है, ऐसा समझकर तुमने मेरी बातोंकी उपेक्षा की। इसीसे आज इस अवस्थाको प्राप्त हुए हो। क्या करूँ, मैं अबला हूँ, परंतु अब भी मैं तुम्हारे हितकी बात कहती हूँ। तुम बिना विचारे ही उसका पालन करो। जबतक मैं इसकी चोंचमें पड़ी हूँ और जबतक यह पृथ्वीपर पहुँचकर स्वस्थ नहीं हो जाता है तबतक ही तुम अपनेको इसके चंगुलसे छुड़ानेके लिये इस शत्रुके पंजेमें चोंच मारो।' पत्नीकी यह बात सुनकर कबूतरने वैसा ही किया। फिर तो पैरमें पीड़ा होनेसे बाज बहुत देरतक चीं-चीं करता रहा। इतनेमें ही कपोती उसके मुखसे छूटकर उड़ गयी। इधर पाँवकी अंगुलियोंके शिथिल होनेसे कबूतर भी छूटकर गिर पड़ा। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको विपत्तिमें भी कभी उद्योग नहीं छोड़ना चाहिये, क्योंकि उद्यमी पुरुष दुर्बल हों तो भी सफलताके भागी होते हैं। अतः मनीषी पुरुष विपत्तिकालमें भी उद्यमकी प्रशंसा करते हैं। तदनन्तर वे दोनों पक्षी कालयोगसे मुक्तिपुरी अयोध्यामें सरयूके किनारे मृत्युको प्राप्त हुए। उनमेंसे एक कबूतर तो विद्याधर हुआ। वह मन्दारदामाका पुत्र था और उसका नाम परिमलालय रखा गया था। वह कुमारावस्थासे ही शिवजीकी भक्तिमें तत्पर हुआ। उसने अपने मन और इन्द्रियोंको पूर्णतः जीत लिया था। भगवान् त्रिलोचनकी शरण लेनेसे पूर्वजन्मके अभ्यासवश उसने यह नियम कर लिया कि 'जबतक शरीर स्वस्थ है, जबतक इन्द्रियोंमें शिथिलता नहीं आ जाती तबतक काशीमें भगवान् त्रिलोचनकी पूजा किये बिना मैं थोड़ा भी भोजन नहीं करूँगा।' ऐसी प्रतिज्ञा लेकर वह परिमलालय प्रतिदिन काशीमें त्रिलोचनका दर्शन करनेके लिये आता था।

उधर वह कपोती भी पातालमें नागराज रत्नद्वीपके घरमें कन्यारूपसे उत्पन्न हुई। उसका नाम रत्नावली रखा गया। उसकी दो सखियाँ थीं, जिनमेंसे एकका नाम प्रभावती और दूसरीका नाम कलावती था। ये दोनों सदा रत्नावलीके साथ रहती थीं। उस कन्याने अपने पिताको शिवभक्तिमें तत्पर देख यह नियम लिया—'मैं प्रतिदिन अपनी दोनों सखियोंके साथ काशीमें त्रिलोचनकी पूजा करके ही मौन व्रतका त्याग करूँगी, अन्यथा नहीं।' इस