संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रकार वह नागकन्या अपनी दोनों सखियोंके साथ प्रतिदिन काशीमें आती और त्रिलोचनकी पूजा करके लौट जाती थी।
एक समय वैशाख मासकी तृतीयाको उपवासपूर्वक रात्रिमें नृत्य, गीत और कथा आदिके द्वारा जागरण करके रत्नावलीने प्रातःकाल चतुर्थीको शुभ 'पिलपिला' तीर्थमें स्नान किया और त्रिलोचनदेवकी पूजा करके उन्हींके रंगमण्डपमें सो गयी। उस समय शुद्ध कर्पूरके समान गोरे अंगोंवाले जटा-मुकुटमण्डित शशिभूषण भगवान् त्रिलोचन उस लिंगसे निकलकर बोले—'कन्याओ! तुम सब लोग उठो।' तब उन्होंने उठकर, जिनके आगमनकी कोई सम्भावना नहीं थी उन, भगवान् त्रिलोचनको प्रत्यक्ष देखा और उन्हें लक्षणोंसे ईश्वर जानकर उनके चरणोंमें वन्दना की। भगवद्दर्शनसे उन कुमारियोंके मुखपर प्रसन्नता छा गयी और वे गद्गद कण्ठसे भगवान् शिवकी स्तुति करने लगीं—'शम्भो! आपकी जय हो, ईशान! आपकी जय हो, सर्वव्यापी और सब कुछ देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। त्रिभुवनको उत्पन्न करनेवाले तथा भक्तजनोंके अधीन रहनेवाले प्रमथनायक! आपकी जय हो। प्रणतजनोंको सब कुछ देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। सब विधियोंके ज्ञाता, विधाता भी आपकी स्तुति करनेमें कुशल नहीं हैं। नाथ! आपकी स्तुति करनेमें बृहस्पतिकी भी वाणी कुण्ठित हो जाती है। सर्वज्ञ! स्वामिन्! वेद भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते, आप अनादि और अनन्त हैं, मन आपको मनन नहीं कर सकता। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। त्रिलोचन! आपको नमस्कार है। त्रिविष्टिप! आपको नमस्कार है।'
यों कहकर उन कुमारियोंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर प्रणाम किया। तब उन्हें उठाकर भगवान् चन्द्रभूषणने कहा—'मन्दारदामाका पुत्र परिमलालय समस्त विद्याधरोंमें श्रेष्ठ है, वही तुमलोगोंका पति होगा। तुम तीनों मेरी भक्त हो और वह तरुण विद्याधर भी मुझमें भक्ति रखता है। तुम चारों इस जीवनका अन्त होनेपर मोक्ष प्राप्त करोगे। जन्मान्तरमें तुम सबने मेरी सेवा की है, इससे तुमलोगोंको भक्तिभावित निर्मल जन्म प्राप्त हुआ है।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर उन कन्याओंने प्रसन्नचित्त होकर हाथ जोड़ प्रणाम करके पूछा— नाथ! हम चारोंने पूर्वजन्ममें किस प्रकारसे आपकी सेवा की है?
भगवान् शिव बोले—नागकन्याओ! सुनो, यह रत्नावली पूर्वजन्ममें कपोती थी और श्रेष्ठ विद्याधर इसका पति कपोत था। यहीं मेरे मन्दिरमें इन दोनोंने दीर्घकालतक सुखपूर्वक निवास किया है। इन्होंने अपने पंखोंकी हवासे मेरे मन्दिरमें लगी हुई धूलको उड़ाकर साफ किया है। ऊपरसे लेकर नीचेतक प्रतिदिन अनेक बार मेरी परिक्रमाएँ की हैं। आकाशमें उड़ते और मेरे आँगनमें विचरते समय भी इन्होंने मेरी प्रदक्षिणा की है। यहाँके चतुर्नदतीर्थमें स्नान किया और बार-बार उसीका जल पीया है। मेरे भक्तोंके यहाँ जो-जो उत्सव और कौतुक किये हैं, उन सबको इन्होंने देखा है। अनेकों बार मेरी मंगल आरतीका दर्शन किया है और कानोंसे मेरे नामामृतका पान (श्रवण) किया है। यद्यपि इनकी मृत्यु मेरे समीप नहीं हुई तो भी इन्होंने काशीकी प्राप्ति करानेवाली अयोध्यामें प्राणत्याग किया है। अयोध्यामें मरनेसे ही यह रत्नद्वीप नागकी कन्या हुई है और इसका पति कबूतर विद्याधरका पुत्र हुआ है। तुमलोगोंमें जो ये प्रभावती और कलावती हैं, ये इससे तीसरे जन्म पहले महर्षि चारण्यकी पुत्रियाँ थीं। दोनोंमें परस्पर बड़ा अनुराग था और दोनों ही शील एवं सदाचारसे सम्पन्न थीं। इनके पिता चारण्यने आमुष्यायणके पुत्र नारायणसे इनका विवाह कर दिया। नारायण अभी किशोरावस्थाके थे। एक