भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 910
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८१

दिन वे वनमें समिधा लानेके लिये गये, इतनेहीमें भाग्यवश किसी सर्पने उनको काट लिया। चारण्यकी दोनों कन्याएँ भवानी और गौतमी वैधव्य दुःखसे अत्यन्त दुःखी हो बड़ी दीनताको प्राप्त हो गयीं। इसीलिये ब्याह करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह देवता और नदी नामवाली कन्यासे विवाह न करे। तदनन्तर किसी ऋषिके अद्भुत आश्रममें जाकर इन कन्याओंने मोहवश ऋषिके दिये बिना ही कुछ केलेके फल तोड़ लिये। फलकी चोरीका परिणाम यह हुआ कि ये दोनों दूसरे जन्ममें वानरी हो गयीं, परंतु इन्होंने शील और सदाचारकी रक्षा की थी, अतः उस धर्मके प्रभावसे इनका जन्म काशीमें हुआ। वे नारायण ब्राह्मण सर्पसे डसे जानेपर भी अपने पिताकी सेवारूप व्रतके प्रभावसे काशीमें कबूतर हुए। इस प्रकार यह विद्याधर युवक जन्मान्तरमें इन दोनोंका भी पति रह चुका है और इस समय भी तुम तीनोंका पति होगा। इस मन्दिरके पार्श्वभागमें जो बहुत बड़ा बरगदका वृक्ष है, उसीपर वे दोनों वानरियाँ रहती थीं। वे चतुःस्रोतस्विनीतीर्थमें जलक्रीड़ापूर्वक स्नान करतीं और प्यास लगनेपर उसीका जल पीती थीं। वानरजातिके स्वभावसे इनमें चपलता तो थी ही, सब ओर क्रीड़ा करती हुई मन्दिरकी परिक्रमा करतीं और अनेक बार बहुतसे शिवलिंगोंका दर्शन करती थीं। एक दिन इस वटवृक्षके समीप स्वेच्छापूर्वक विचरती हुई दोनों वानरियोंको किसीने फँसाकर रस्सीमें बाँध लिया। तदनन्तर किसी समय कालवश उनकी मृत्यु हो गयी। काशीनिवासजनित पुण्य और भगवान् त्रिलोचनकी सेवा एवं प्रदक्षिणा आदिके पुण्यसे वे दोनों नागकुमारियाँ हुई हैं। अब तुम तीनों ही विद्याधरकुमार परिमलालयको पतिरूपमें प्राप्त करके स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करोगी और अन्तमें काशीमें आकर यहीं मृत्युको प्राप्त हो मुक्तिको प्राप्त होओगी। काशीमें आकर यदि थोड़ा भी शुभ कर्म किया गया हो तो मेरे अनुग्रहसे उसका फल निश्चय ही मोक्ष होता है। तीनों लोकोंमें काशीपुरी सबसे श्रेष्ठ है, काशीमें भी ॐकारेश्वर लिंग सबसे श्रेष्ठ है, ॐकारेश्वरसे भी श्रेष्ठ त्रिलोचन लिंग है। इसमें सदा ही स्थित होकर मैं अपने भक्तोंको मोक्ष प्रदान करता हूँ। अतः काशीमें सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् त्रिलोचनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् शिव मन्दिरके भीतर चले गये। वे कन्याएँ भी अपने-अपने घर गयीं और वहाँ माताके आगे सब बातें बताकर कृतकृत्य-सी हो गयीं।

तदनन्तर एक दिन वैशाख मासमें महायात्राका समय आया। उसमें विद्याधर और नाग त्रिलोचन महादेवके समीप विरज महाक्षेत्रमें एकत्र हुए। फिर भगवान्‌के वरदानसे परस्पर कुलका परिचय पूछकर उन नागोंने अपनी तीनों कन्याओंको विद्याधरकुमार परिमलालयके साथ ब्याह दिया। इस विवाहसे तीनों पुत्रवधुओंको पाकर विद्याधरराज मन्दारदामा बहुत प्रसन्न हुए। इधर नागराज रत्नद्वीप, भुजंगराज पद्मी और फणीन्द्र त्रिशिख भी परिमलालयको जामाताके रूपमें पाकर परम सन्तुष्ट हुए। इस विवाहोत्सवको सम्पन्न करके सभी स्वजन भगवान् त्रिलोचन लिंगके गौरवका वर्णन करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये। श्रीमान् विद्याधर परिमलालय उन नागकन्याओंके साथ पर्याप्त सुख भोगनेके पश्चात् काशीमें आकर भगवान् त्रिलोचनकी सेवामें संलग्न हुए और वहाँ मधुर गीत गाते हुए पत्नियोंसहित त्रिलोचन लिंगमें लयको प्राप्त हो गये।

स्कन्दजी कहते हैं—कलियुगमें भगवान् त्रिलोचनकी महिमा महादेवजीने गुप्त रखी है। इसलिये जिनमें सात्त्विक भावकी कमी है, ऐसे मनुष्य उस शिवलिंगकी उपासना नहीं करते हैं।

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