संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८१
दिन वे वनमें समिधा लानेके लिये गये, इतनेहीमें भाग्यवश किसी सर्पने उनको काट लिया। चारण्यकी दोनों कन्याएँ भवानी और गौतमी वैधव्य दुःखसे अत्यन्त दुःखी हो बड़ी दीनताको प्राप्त हो गयीं। इसीलिये ब्याह करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह देवता और नदी नामवाली कन्यासे विवाह न करे। तदनन्तर किसी ऋषिके अद्भुत आश्रममें जाकर इन कन्याओंने मोहवश ऋषिके दिये बिना ही कुछ केलेके फल तोड़ लिये। फलकी चोरीका परिणाम यह हुआ कि ये दोनों दूसरे जन्ममें वानरी हो गयीं, परंतु इन्होंने शील और सदाचारकी रक्षा की थी, अतः उस धर्मके प्रभावसे इनका जन्म काशीमें हुआ। वे नारायण ब्राह्मण सर्पसे डसे जानेपर भी अपने पिताकी सेवारूप व्रतके प्रभावसे काशीमें कबूतर हुए। इस प्रकार यह विद्याधर युवक जन्मान्तरमें इन दोनोंका भी पति रह चुका है और इस समय भी तुम तीनोंका पति होगा। इस मन्दिरके पार्श्वभागमें जो बहुत बड़ा बरगदका वृक्ष है, उसीपर वे दोनों वानरियाँ रहती थीं। वे चतुःस्रोतस्विनीतीर्थमें जलक्रीड़ापूर्वक स्नान करतीं और प्यास लगनेपर उसीका जल पीती थीं। वानरजातिके स्वभावसे इनमें चपलता तो थी ही, सब ओर क्रीड़ा करती हुई मन्दिरकी परिक्रमा करतीं और अनेक बार बहुतसे शिवलिंगोंका दर्शन करती थीं। एक दिन इस वटवृक्षके समीप स्वेच्छापूर्वक विचरती हुई दोनों वानरियोंको किसीने फँसाकर रस्सीमें बाँध लिया। तदनन्तर किसी समय कालवश उनकी मृत्यु हो गयी। काशीनिवासजनित पुण्य और भगवान् त्रिलोचनकी सेवा एवं प्रदक्षिणा आदिके पुण्यसे वे दोनों नागकुमारियाँ हुई हैं। अब तुम तीनों ही विद्याधरकुमार परिमलालयको पतिरूपमें प्राप्त करके स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करोगी और अन्तमें काशीमें आकर यहीं मृत्युको प्राप्त हो मुक्तिको प्राप्त होओगी। काशीमें आकर यदि थोड़ा भी शुभ कर्म किया गया हो तो मेरे अनुग्रहसे उसका फल निश्चय ही मोक्ष होता है। तीनों लोकोंमें काशीपुरी सबसे श्रेष्ठ है, काशीमें भी ॐकारेश्वर लिंग सबसे श्रेष्ठ है, ॐकारेश्वरसे भी श्रेष्ठ त्रिलोचन लिंग है। इसमें सदा ही स्थित होकर मैं अपने भक्तोंको मोक्ष प्रदान करता हूँ। अतः काशीमें सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् त्रिलोचनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् शिव मन्दिरके भीतर चले गये। वे कन्याएँ भी अपने-अपने घर गयीं और वहाँ माताके आगे सब बातें बताकर कृतकृत्य-सी हो गयीं।
तदनन्तर एक दिन वैशाख मासमें महायात्राका समय आया। उसमें विद्याधर और नाग त्रिलोचन महादेवके समीप विरज महाक्षेत्रमें एकत्र हुए। फिर भगवान्के वरदानसे परस्पर कुलका परिचय पूछकर उन नागोंने अपनी तीनों कन्याओंको विद्याधरकुमार परिमलालयके साथ ब्याह दिया। इस विवाहसे तीनों पुत्रवधुओंको पाकर विद्याधरराज मन्दारदामा बहुत प्रसन्न हुए। इधर नागराज रत्नद्वीप, भुजंगराज पद्मी और फणीन्द्र त्रिशिख भी परिमलालयको जामाताके रूपमें पाकर परम सन्तुष्ट हुए। इस विवाहोत्सवको सम्पन्न करके सभी स्वजन भगवान् त्रिलोचन लिंगके गौरवका वर्णन करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये। श्रीमान् विद्याधर परिमलालय उन नागकन्याओंके साथ पर्याप्त सुख भोगनेके पश्चात् काशीमें आकर भगवान् त्रिलोचनकी सेवामें संलग्न हुए और वहाँ मधुर गीत गाते हुए पत्नियोंसहित त्रिलोचन लिंगमें लयको प्राप्त हो गये।
स्कन्दजी कहते हैं—कलियुगमें भगवान् त्रिलोचनकी महिमा महादेवजीने गुप्त रखी है। इसलिये जिनमें सात्त्विक भावकी कमी है, ऐसे मनुष्य उस शिवलिंगकी उपासना नहीं करते हैं।
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८८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
केदारेश्वर लिंगकी माहात्म्य-कथा
पार्वतीजी बोलीं—करुणानिधान ! अब अपने भक्तोंपर कृपा करके केदारका माहात्म्य कहिये।
श्रीमहादेवजीने कहा—पार्वती ! प्राचीन कालकी बात है। उज्जयिनीपुरीसे एक ब्राह्मण यहाँ आया था। पिताने उसका उपनयन-संस्कार कर दिया था और वह ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करता था। काशीपुरीका सब ओरसे अवलोकन करके उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने हिरण्यगर्भ नामक आचार्यसे पाशुपत नामक उत्तम व्रतकी दीक्षा ली। उसका नाम वशिष्ठ था। हिरण्यगर्भका वह शिष्य सब पाशुपतोंमें श्रेष्ठ हुआ। प्रतिदिन हरपाप नामक कुण्डमें प्रातःकाल स्नान करके तीनों कालमें वह शिवलिंगकी पूजा करता और नित्यप्रति विभूतिसे स्नान करता (सर्वांगमें विभूति लगाता) था। वह शिवलिंग तथा गुरुमें भेद नहीं मानता था। वशिष्ठकी अवस्था बारह वर्षकी थी, उसी समय वह अपने गुरुके साथ केदारतीर्थकी यात्रा करनेके लिये हिमालय पर्वतको गया। असिधार पर्वतपर पहुँचकर तपस्वी वशिष्ठके गुरु हिरण्यगर्भकी मृत्यु हो गयी। उस समय भगवान् शंकरके पार्षद आये और अन्य तपस्वियोंके देखते-देखते हिरण्यगर्भको विमानपर बिठाकर प्रसन्नतापूर्वक कैलासधामको ले गये। यह देखकर तपस्वी वशिष्ठने सब लिंगोंमें केदारलिंगको ही श्रेष्ठ माना। तदनन्तर केदार क्षेत्रकी यात्रा पूरी करके वह काशीपुरीमें लौट आया। यहाँ आकर उसने यह प्रतिज्ञा की कि 'मैं जबतक जीवित रहूँगा, तबतक काशीपुरीमें निवास करता हुआ प्रत्येक चैत्र मासकी पूर्णिमाको भगवान् केदारका अवश्य दर्शन करूँगा।' इस निश्चयके अनुसार उसने बड़े आनन्दके साथ सदा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक काशीमें निवास करते हुए हिमालयवर्ती केदार क्षेत्रकी इकसठ यात्राएँ पूरी कीं। तदनन्तर चैत्रमास निकट आनेपर उसने पुनः बड़े उत्साहके साथ यात्रा प्रारम्भ की। यद्यपि उसके सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीरपर वृद्धावस्थाका पूरा प्रभाव पड़ चुका था तथा उसके संगी-साथी तपस्वी जनोंने उसे करुणापूर्ण हृदयसे रोका भी, तो भी स्थिर चित्तवाले वशिष्ठका उत्साह भंग नहीं हुआ। उसने सोच लिया था कि 'यदि बीच रास्तेमें मृत्यु हो गयी तो गुरुजीकी तरह मेरी भी गति होगी।' देवि ! तपस्वी वशिष्ठके चित्तकी यह दृढ़ता देख मैं उसपर बहुत सन्तुष्ट हुआ और स्वप्नमें उसे दर्शन देकर कहा—'दृढ़व्रत ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, मुझको ही केदार समझो और मुझसे मनोवांछित वर माँगो। किसी प्रकारका अन्यथा विचार मनमें न लाओ।'
मेरे इस प्रकार कहनेपर वशिष्ठने कहा—देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो यहाँ मेरे साथ रहनेवाले जितने लोग हैं इन सबपर अनुग्रह करें। उस परोपकारीका यह वचन सुनकर मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी और मैंने कहा 'तथास्तु' ऐसा ही होगा। फिर उसके परोपकारजनित पुण्यसे उसकी तपस्याको मैंने द्विगुणित कर दिया और पुनः उससे वर माँगनेके लिये कहा। तब वशिष्ठने यह प्रार्थना की कि 'आप हिमालयसे यहीं आकर रहें।' उसकी तपस्यासे आकृष्ट होकर मैं कलामात्रसे हिमालयपर रहकर सर्वतोभावेन यहाँ काशीमें आकर बस गया। वशिष्ठको उसके साथियोंसहित आगे करके मैं यहाँ आया और उसपर अनुग्रह करके हरपापकुण्ड-तीर्थके समीप स्थित हुआ। मेरे निवाससे सब लोग हरपापकुण्डमें स्नान, सन्ध्या, तर्पण आदि करके इसी शरीरसे सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। तभीसे मैं साधकोंकी सिद्धिके लिये परम उत्तम अविमुक्त क्षेत्रमें इस केदार लिंगमें स्थित हुआ हूँ। हिमालयपर चढ़कर केदार-शिवका दर्शन करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही काशीमें केदारका दर्शन करनेपर सातगुना होकर मिलता है। हरपापतीर्थ सात जन्मोंके पापोंका नाश करनेवाला
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है। और पीछेसे गंगामें मिल जानेसे तो वह करोड़ों जन्मोंकी अघराशिका नाश करनेवाला बन गया है। यहाँ जडताका नाश करनेवाली अमृतस्रवा गंगा है। आगे चलकर मानसरोवरने यहाँ तपस्या की थी। इसलिये यह हरपापतीर्थ मनुष्योंमें मानसतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। जो केदारतीर्थमें स्नान करके बिना उतावलीके पितरोंके लिये पिण्डदान करता है, उसकी अनेक पीढ़ियाँ भवसागरसे पार हो जाती हैं। जब मंगलवारको अमावास्या तिथि हो, उस समय केदारतीर्थमें आकर जो श्राद्ध करता है, उसे गयामें श्राद्ध करनेकी क्या आवश्यकता। एक बार भी केदारेश्वरका दर्शन करके मनुष्य मेरा पार्षद हो सकता है। अतः काशीमें प्रयत्नपूर्वक केदारेश्वरका दर्शन करे। केदारसे उत्तरमें चित्रांगदेश्वर लिंग है। उसकी नित्य पूजा करनेसे मनुष्य स्वर्गीय भोग प्राप्त करता है। केदारके दक्षिण भागमें नीलकण्ठका दर्शन करनेपर मनुष्यको संसाररूपी सर्पके डँस लेनेपर भी उसके विषसे भय नहीं होता। केदारसे वायव्य कोणमें अम्बरीषेश्वर लिंग है। उसका दर्शन करनेसे मनुष्य दुःखसे भरे हुए इस संसारमें गर्भवासका कष्ट नहीं भोगता। उसीके समीप इन्द्रद्युम्नेश्वर लिंग है, जिसकी भलीभाँति पूजा करके भक्त पुरुष तेजोमय विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोककी भूमिमें आनन्दका अनुभव करता है। उसके दक्षिण भागमें कालंजरेश्वर लिंग है, उसका दर्शन करके मनुष्य वृद्धावस्था और कालपर विजय पाकर चिरकालतक मेरे लोकमें निवास करता है। चित्रांगदेश्वरसे उत्तर क्षेमेश्वर लिंगका दर्शन करनेपर इहलोक और परलोकमें सर्वत्र कल्याणकी प्राप्ति होती है।
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! केदारेश्वर लिंगके प्रकट होनेकी यह कथा सुनकर पुण्यात्मा पुरुष क्षणभरमें निष्पाप हो जाता है और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है।
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श्रीधर्मेश्वर लिंगका माहात्म्य, धर्मपीठका गौरव तथा मनोरथतृतीया व्रतकी विधि और महिमा
**श्रीमहादेवजी बोले—**देवि! जहाँ 'विश्वभुजा' नामसे तुम स्वयं स्थित रहती हो, जहाँ क्षेत्रके विघ्नका नाश करनेवाला तुम्हारा प्रिय पुत्र गणेश 'आशा-विनायक' नामसे प्रसिद्ध होकर रहता है, जिसका दर्शन करके राजा दुर्दम क्षणभरमें धर्मबुद्धि हो गया था उस लिंगका माहात्म्य और उसके आविर्भावका वृत्तान्त मैं तुमसे कहूँगा। पूर्वकालमें विवस्वान्के पुत्र परम संयमी यमने तुम्हारे आगे बड़ी भारी तपस्या की थी। मेरे दर्शनकी तीव्र इच्छासे उन्होंने तपस्या करते हुए एक दिव्य चतुर्युगी व्यतीत कर दी। उनके तपसे सन्तुष्ट होकर मैं उन्हें वरदान देनेके लिये गया और मैंने कहा—'सूर्यनन्दन! वर माँगो।' तब यमराज मुझे प्रणाम करके मेरी स्तुति करने लगे।
**यमराज बोले—**कारणोंके भी कारण शिव! आपको नमस्कार है। आपका रूप कारणसे रहित और कार्यसे भिन्न है, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप निराकार है, तो भी समस्त रूप आपके ही हैं। आप परमाणुस्वरूप तथा पर (कारण) और अपर (कार्य) हैं, कोई भी आपका पार नहीं पा सकता। संसाररूपी महासागरसे आप ही सबको पार उतारनेवाले हैं, आप भगवान् चन्द्रशेखरको नमस्कार है। आपका दूसरा कोई ईश्वर नहीं है, आप ही सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं। आप गुणोंसे रहित हैं, तो भी समस्त गुण आपके ही स्वरूप हैं। आप काल और प्रकृतिसे परे हैं, तो भी आप ही काल और प्रकृतिरूप हैं, आपको नमस्कार है। अनन्तशक्ते! आप ही मोक्षपद प्रदान करनेवाले
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तथा आप ही मोक्षरूप हैं। आप ही आत्मा, परमात्मा और चराचर जगत्के अन्तरात्मा हैं। आपसे ही जगत्की उत्पत्ति हुई है। आप साक्षात् जगत्स्वरूप ही हैं। यह जगत् आपका ही है। आप ही इसके एकमात्र बन्धु हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप होकर इस विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। वैदिक मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंके लिये आप ही मृड (सुख)-रूप हैं और वेदविरुद्ध पथपर चलनेवाले लोगोंके लिये आप भीम (अत्यन्त भयंकर) हैं। साम्बशिव! आप भक्तोंके लिये कल्याणकारी शंकर हैं। जिनके मन और वचनमें नम्रता है, ऐसे पुरुषोंके लिये आप शिवस्वरूप हैं। जो आपके चरणारविन्दोंकी शरण लेते हैं, ऐसे भक्तोंके लिये आप श्रीकण्ठ हैं—उनपर आयी हुई विपत्तिरूपी हालाहल विषको पी जानेवाले हैं। शान्त! शम्भो! शंकर! चन्द्रकलाविभूषण! पिनाकपाणे! सर्पोंको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, आपको नमस्कार है। प्रभो! वही धन्य है जो आपमें भक्ति रखता है। वही पुण्यात्मा है जो आपकी पूजा करनेवाला है। अनन्तशक्ते! मेरे-जैसा अल्प बुद्धि-वैभवसे युक्त कौन मनुष्य यहाँ आपकी स्तुति कर सकता है। प्राचीन वेदवाणीके लिये भी जो अगम्य हैं, ऐसे आपकी स्तुति केवल नमस्कारमात्र ही है।
स्कन्दजी कहते हैं—ऐसा कहकर यमराजने 'ॐ नमः शिवाय' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए भगवान् शंकरको सहस्रों बार प्रणाम किया। तदनन्तर परमेश्वर शिवने यमराजको नमस्कारसे रोककर इस प्रकार वरदान दिया—'सूर्यनन्दन! तुम (कर्म और स्वरूपसे तो धर्म हो ही,) नामसे भी 'धर्मराज' हो जाओ। आजसे तुम समस्त चराचर प्राणियोंके धर्माधर्मके निर्णयमें मेरे द्वारा नियुक्त होकर मेरी आज्ञासे सबका शासन करो। तुम दक्षिण दिशाके अधिपति और समस्त जीवोंके कर्मके साक्षी होओ। उत्तम और अधम मनुष्य तुम्हारे दिखाये हुए मार्गसे ही कर्मानुसार गति प्राप्त करें। धर्म! मुझमें भक्ति रखते हुए तुमने जो यहाँ मेरे लिंगविग्रहकी आराधना की है उसके दर्शन, स्पर्श और पूजनसे मनुष्योंको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होगी। जो विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष तुम्हारे आगे इस धर्म-तीर्थमें स्नान करके एक बार भी धर्मेश्वरका दर्शन करेगा उसके समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धि उससे दूर नहीं है। जो मनुष्य कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवासपूर्वक धर्मेश्वर तीर्थकी यात्रा करेंगे तथा रात्रिकालमें महान् उत्सवके साथ जागरण करेंगे, वे फिर इस पृथ्वीपर जन्म नहीं लेंगे।'
ऐसा कहकर परम सुखदायक भगवान् शिवने अपने हाथोंसे धर्मराजका स्पर्श किया। उनके करस्पर्शजनित सुखसे आनन्दमग्न हो धर्मराजने महादेवजीसे कहा—'सर्वज्ञ! करुणानिधान! ईश्वर! जब आपका प्रत्यक्ष दर्शन मिल गया तब मुझे दूसरे किसी वरकी क्या आवश्यकता है? नाथ! जिनको वेद भी भलीभाँति नहीं जानते तथा वेद-पुरुष ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं जानते, उनसे भी यदि मैं वर पानेयोग्य हूँ, तो यही प्रार्थना करता हूँ कि ये जो पक्षियोंके मधुर बोली बोलनेवाले बच्चे हैं, जिनका कि मेरे सामने जन्म हुआ है, इनकी उत्पत्तिके समय रोगसे पीड़ित हो इनकी माता शुकी मृत्युको प्राप्त हुई और इनके पिता शुकको बाजने खा डाला है। अनाथनाथ! मेरे द्वारा रक्षित इन असहाय बच्चोंको आप वरदान दीजिये।' अगस्त्य! इस प्रकार धर्मराजका परोपकारयुक्त निर्मल वचन सुनकर शंकरजीने उन पक्षियोंको बुलाया और कहा—'पक्षियो! तुम बोलो, तुम्हारे लिये कौन-सा वरदान देना चाहिये।'
पक्षी बोले—संसारबन्धनका नाश करनेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है। अनाथनाथ! सर्वज्ञ! त्रिनेत्र! हम पक्षीकी योनिमें जन्म लेकर भी जो आपका प्रत्यक्ष दर्शन कर सके हैं तथा आपकी कृपादृष्टिके भाजन हो सके हैं, इससे बढ़कर मनोवांछित वर और क्या हो सकता
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है? गिरीश! लोकमें उद्यम करनेवाले लोगोंको सदा सैकड़ों लाभ मिला करें, परंतु सबसे महान् लाभ यही है कि आपका प्रत्यक्ष दर्शन हो। नाथ! यह जो कुछ दिखायी देता है, सब क्षणभंगुर है। एकमात्र आप ही अविनाशी हैं और आपकी आराधना भी अक्षय है। इन तपस्वीद्वारा की हुई आपके श्रीलिंगकी पूजा देखनेसे इस समय हमें अपने विचित्र-विचित्र करोड़ों जन्मोंका स्मरण हो आया है। महेश्वर! हमने दीर्घकालतक देवयोनिका सुख भी प्राप्त किया है। लीलापूर्वक सहस्रों दिव्यांगनाओंका उपभोग किया है। असुर, दानव, नाग, राक्षस, किन्नर, विद्याधर और गन्धर्वोंकी योनि भी हमने प्राप्त की है। मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर राज्यका भी उपभोग किया है। जलमें जलचर और स्थलमें स्थलचर भी हमें होना पड़ा है। परंतु शम्भो ! इस योनिसे उस योनिमें और उस योनिसे किसी तीसरी योनिमें भटकते हुए हमने कहीं भी किंचिन्मात्र भी सुख नहीं पाया है। इस समय धर्मेश्वरके दर्शनसे और सूर्यनन्दन यमकी तपस्यारूपी अग्निकी ज्वालासे हमारे सारे पाप जल गये हैं और हम आपका प्रत्यक्ष दर्शन करके कृतकृत्य हो गये हैं। भगवन्! अब आप हमें वह ज्ञान प्रदान करें जिससे मायामय बन्धनमें बँधे हुए हम सब लोग उससे मुक्त हो जायँ। हमें इन्द्र, चन्द्र तथा अन्य किसी देवताका लोक नहीं चाहिये। आपका सामीप्य प्राप्त होनेसे हम सब लोकोंकी स्थितिको अच्छी तरह जान गये हैं। समयानुसार आपके आनन्दवन-काशीमें शरीरका त्याग करना संसारबन्धनके विनाशका कारण तथा परम उत्तम ज्ञान है। प्रभो ! तिर्यग्योनिमें पड़े हुए हम पक्षी भी धर्मराजकी तपस्यासे विकल्पहीन ज्ञानके पात्र हो गये हैं।
उन पक्षियोंकी यह बात सुनकर महादेवजीने धर्मपीठके गौरवका वर्णन करते हुए कहा— इस त्रिलोकनगरमें काशी ही मेरा राजभवन है और उसमें भी मोक्षलक्ष्मीविलास नामक मन्दिर (धर्मेश्वरका स्थान) मेरे लिये अत्यन्त सुखप्रद स्थान है। इस शिवालयके व्याजसे आनन्दकन्दका कोई अंकुर ही भूमि फोड़कर प्रकट हुआ है। उपनिषद्की वाणीद्वारा जिस निराकार परब्रह्मका वर्णन किया गया है, वही मैं हूँ। अपने भक्तोंपर कृपा करके साकाररूपसे प्रकट हो गया हूँ। उससे दक्षिण दिशामें मोक्षलक्ष्मीका धामस्वरूप मेरा मण्डप है, उसमें मैं सदा स्थित रहता हूँ। वह मेरा सभामण्डप (दरबार) है। पृथ्वीपर वह स्थान निर्वाणमण्डपके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ एक ऋचाका भी भलीभाँति जप करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण वेदोंके पाठका फल पाता है। जो मुक्तिमण्डपमें षडक्षर मन्त्रका एक बार भी उच्चारण कर लेता है, वह रुद्राध्यायके कोटि बार जप करनेका फल पा लेता है। जो वहाँ निष्कामभावसे मेरे मन्दिरमें धर्मशास्त्र, पुराण और इतिहासका पाठ करता है, वह मेरे लोकमें निवास करता है। मेरे मन्दिरसे पूर्वभागमें जो ज्ञानमण्डप है वहाँ सदा मेरा ध्यान करनेवाले सत्पुरुषोंको मैं ज्ञानका उपदेश देता हूँ। यहाँ काशीमें पग-पगपर अनेक सिद्धपीठ हैं, परंतु धर्मेशपीठकी कोई और ही शक्ति है, जो सबसे श्रेष्ठ है। जहाँ ये छोटे शुकशावक त्रात, त्रात (रक्षा करो, रक्षा करो)—का उच्चारण करते हुए मेरे सदुपदेशसे निर्मल ज्ञानके भाजन हो गये। सूर्यनन्दन धर्म! आजसे मैं तुम्हारे इस उत्तम तपोवन—धर्मेश्वरपीठका कभी त्याग नहीं करूँगा। देखो, मेरी कृपासे ये शुकपक्षी दिव्य विमानपर बैठकर मेरे परम धामको जा रहे हैं।
देवेश्वर भगवान् शंकरके ऐसा कहते ही कैलासशिखरके समान एक विशाल दिव्य विमान आ पहुँचा। वे निर्मल पक्षी दिव्य रूप धारण करके उसी विमानपर बैठे और धर्मराजसे पूछकर कैलासपर्वतपर चले गये।
अगस्त्य! उस आश्चर्यजनक वृत्तान्तको देखकर
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जगदम्बा पार्वती ने कहा— महादेव! महेश्वर! इस धर्मपीठका यह माहात्म्य जानकर मैं आजसे धर्मेश्वरके समीपमें ही निवास करूँगी। जो स्त्री अथवा पुरुष इस धर्मेश्वर लिंगमें भक्ति रखनेवाले होंगे, उन सबकी मनोवांछित कामनाओंको मैं सदा सिद्ध करूँगी।
महादेवजी बोले— देवि यह तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। यहाँ तुम विश्वभुजाके नामसे विख्यात होओगी। जो यहाँ तुम्हारी पूजा करेंगे वे समस्त भोगोंसे सम्पन्न एवं सर्वमान्य होंगे। मनोरथतृतीयाको (चैत्र शुक्ला तृतीयाको) जो तुम्हारी भक्तिपूर्वक आराधना करेगा, मेरे अनुग्रहसे उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होगी। पूर्वकालमें पुलोमकन्या इन्द्राणीने किसी मनोरथकी प्राप्तिके लिये बड़ी भारी तपस्या की, किंतु उन्हें तपस्याका फल नहीं मिला। तब उन्होंने बड़ी भक्ति और प्रसन्नताके साथ कोकिलाके समान मधुरस्वरसे रहस्ययुक्त गीत गाकर मेरी आराधना की। मृदु, मधुर, ताल-स्वरयुक्त तान, मात्रा और कलासे विशिष्ट उस गानके द्वारा मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैंने उसके पास जाकर कहा—'पुलोमनन्दिनि! मैं तुम्हारे इस सुमधुर गीत और मेरे श्रीविग्रहके पूजनसे प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'
शची बोली— देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो जो सब देवताओंमें माननीय, सुन्दर और यज्ञकर्ताओंमें श्रेष्ठ हों, वे ही मेरे पति हों। आप मुझे मेरी इच्छाके अनुसार रूप, सुख और आयु प्रदान करें। आपके अर्चाविग्रहकी पूजामें मेरी उत्तम भक्ति सदा बनी रहे और मेरा पातिव्रत्य कभी नष्ट न हो।
पुलोमपुत्री शचीके मनोरथको सुनकर महादेवजीने कहा— तुम व्रतका अनुष्ठान करनेसे पूर्वोक्त मनोरथोंको प्राप्त करोगी। मनोरथतृतीया नामका जो व्रत है, उसके पालनसे मनोरथकी सिद्धि होगी। बीस भुजाओंसे सुशोभित विश्वभुजा नामक गौरीदेवी उस व्रतकी अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। देवीके आगे वरदायक आशा-विनायकका भी पूजन करना चाहिये। चैत्र शुक्ला द्वितीयाको दन्त-धावन आदि करके सायंकालिक नियमोंका पालन करनेके पश्चात् अधिक तृप्तिपूर्वक भोजन न करके थोड़ा-सा आहार करे। तदनन्तर इस प्रकार नियम ग्रहण करे—'माता विश्वभुजा देवी! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये कल प्रातःकाल मैं क्रोधको जीतकर, इन्द्रियोंको संयममें रखकर, अस्पृश्य वस्तुओंके स्पर्शसे दूर रहकर, व्रतमें ही मन लगाये हुए पवित्रतापूर्वक 'मनोरथतृतीया' नामक व्रतका अनुष्ठान करूँगा, इसमें मेरे मनोरथकी सिद्धिके लिये तुम सदा मेरे समीप रहो।'
बुद्धिमान् पुरुष प्रातःकाल उठकर आवश्यक कर्म करके शौच एवं आचमनसे निवृत्त हो अशोक वृक्षका उत्तम दन्तधावन ग्रहण करे। फिर नित्यकी स्नान आदि क्रिया पूरी करके दिनभर उपवास करे। तत्पश्चात् सायंकालमें स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारणकर गौरीजीकी पूजा प्रारम्भ करे। सबसे पहले गणेशजीकी पूजा करके उन्हें घृतपक्व (पूरी, पूआ, घेवर आदि)-का भोग लगावे। तदनन्तर अशोकके सुन्दर फूलोंसे विश्वभुजा देवीकी पूजा करे। पहले कुंकुमसे अनुलेपन करके अशोकवर्ति, नैवेद्य, धूप, अगर आदिसे देवीकी पूजा करनेके पश्चात् एक बार देवीका प्रसाद भोजन करे। इस प्रकार चैत्रकी तृतीया बीत जानेपर वैशाखसे फाल्गुनातक प्रत्येक मासकी शुक्ला तृतीयाको इस उत्तम व्रतका पालन करे। जम्बू, अपामार्ग, खदिर, जाती, आम्र, कदम्ब, प्लक्ष, उदुम्बर, खर्जूर, बीजपूर और दाड़िम (अनार)—इन ग्यारह प्रकारके काष्ठोंका क्रमशः वैशाखसे लेकर फाल्गुनातक व्रतके दिन दातन करे। सिन्दूर, अगर, कस्तूरी, चन्दन, रक्तचन्दन, गोरोचन, देवदारु, पद्माक्ष और दो प्रकारकी हल्दी
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(हल्दी और दारुहल्दी) तथा यक्षकर्दम—इनके द्वारा क्रमशः वैशाख आदि मासोंके व्रतमें देवीको अनुलेपन लगाना चाहिये। यदि पूर्वोक्त सब वस्तुओंकी प्राप्ति न हो तो प्रत्येक मासमें यक्षकर्दम ही उत्तम है। दो भाग कस्तूरी, दो भाग कुंकुम, तीन भाग चन्दन और एक भाग कपूर—इन सबको मिलाकर जो अनुलेपन तैयार किया जाता है उसका नाम यक्षकर्दम है। यह समस्त देवताओंको प्रिय है। गुलाब, बेला, कमल, केतकी, कनेर, उत्पल, राजचम्पा, तगर, चमेली, कुमारी और कर्णिकार—इन पुष्पोंद्वारा वैशाख आदि मासोंमें पूजन करना उचित है। फूल न मिले तो उनके पत्तोंसे ही पूजा करे। फूल और पत्ते दोनों न मिलें तो किन्हीं भी सुगन्धित पुष्पोंसे पूजा की जा सकती है। करम्भ (दधिमिश्रित सत्तू), दही-भात, आमके रससे युक्त मण्डक (मैदेकी एक प्रकारकी रोटी), फेणिक (पानीमें पकाया हुआ चावलका चूर्ण), बटक (बड़ा), शक्कर मिलाया हुआ पायस (खीर), इनका क्रमशः वैशाखसे आश्विनतक भोग लगावे। कार्तिकमें मूँग और घीके साथ भात निवेदन करे। अगहनमें इण्डेरिका (ईंड़हर), पौषमें लड्डू, माघमें लम्पसिका (लपसी) और फाल्गुनमें चीनी भरकर घीमें पकायी हुई पूरियाँ श्रीगणेशजी तथा विश्वभुजा देवीको निवेदन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासकी शुक्ला तृतीयाको विश्वभुजा देवीकी आराधना करके व्रतकी पूर्तिके लिये वेदीपर अग्निकी स्थापना करे। तत्पश्चात् अग्निदेवतासम्बन्धी मन्त्रद्वारा तिल और घी आदि द्रव्यसे एक सौ आठ बार होम करे। इस व्रतके लिये सदा रातमें ही पूजा बतायी गयी है। रातमें ही भोजनका नियम है, रातमें ही यह होम होता है तथा रातमें ही देवीसे क्षमा-प्रार्थना की जाती है। प्रार्थनाके लिये मन्त्र इस प्रकार हैं—
गृहाण पूजां मे भक्त्या मातर्विघ्नजिता सह।
नमोऽस्तु ते विश्वभुजे पूरयाशु मनोरथम्॥
नमो विघ्नकृते तुभ्यं नम आशाविनायक।
त्वं विश्वभुजया सार्धं मम देहि मनोरथम्॥
'मातः! आप विघ्नविजयी गणेशजीके साथ मेरी भक्तिपूर्वक की हुई यह पूजा स्वीकार करें। विश्वभुजे! आपको नमस्कार है। आप मेरे मनोरथको शीघ्र पूर्ण करें। आशाविनायक! आप विघ्नोंके स्रष्टा हैं (अथवा विघ्नोंको उच्छेद करनेवाले हैं), आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विश्वभुजा देवीके साथ कृपा करके मेरा मनोरथ पूर्ण करें।'
इन दोनों मन्त्रोंका उच्चारण करके गौरी-गणेशकी पूजा करनी चाहिये। व्रतके लिये क्षमा-प्रार्थना करते समय पलंग, गद्दा, तकिया, दीवट, दीप और दर्पण देना चाहिये। आचार्यसे प्रार्थना करे—'भगवन्! मैंने मनोरथतृतीयाका व्रत किया है, इसमें जो न्यूनता या अधिकताका दोष आ गया हो वह दूर होकर आपके वचनसे मेरा यह व्रत पूर्ण हो जाय।' इस प्रकार आचार्यसे आज्ञा और आशीर्वाद लेकर गाँवकी सीमातक उन्हें पहुँचा आवे। यथाशक्ति दूसरोंको भी दान दे। फिर अपने परिवारके साथ रात्रिमें प्रसन्नतापूर्वक भोजन करे। प्रातःकाल चतुर्थीको चार कुमारों और बारह कुमारियोंको भोजन कराकर गन्ध, पुष्प, माला आदिसे उनकी पूजा करे। इस प्रकार यह निर्मल व्रत पूर्णताको प्राप्त होता है। मनोरथतृतीयाका यह व्रत करनेसे जिसका जो मनोरथ हो वह पूर्ण होता है।
इस उत्तम व्रतको सुनकर पुलोमकुमारी शचीने उसका पालन किया। इससे उनकी मनोवांछित कामना सिद्ध हुई। जो बुद्धिमान् पुरुष मन लगाकर इस पुण्यमयी कथाको सुनता है, वह शुभ बुद्धिको प्राप्त होता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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८८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वीरेश्वर लिंगकी महिमाके प्रसंगमें राजा अमित्रजित और मलयगन्धिनीका चरित्र
पार्वतीजीने कहा—महेश्वर! सुनती हूँ, वीरेश्वर लिंगकी बड़ी भारी महिमा है। काशीमें उस श्रेष्ठ लिंगका आविर्भाव किस प्रकार हुआ, यह मुझसे कहिये।
महादेवजी बोले—महादेवि! पूर्वकालमें अमित्रजित नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, सत्त्वगुणसम्पन्न, प्रजाको प्रसन्न रखनेवाले, यशके धनी, उदार, उत्तम बुद्धिसे युक्त तथा ब्राह्मणोंको देवताके समान माननेवाले थे। सदा यज्ञान्त-स्नान करनेके कारण उनके केश गीले रहते थे। वे विनयशील, नीतिज्ञ, सम्पूर्ण कर्मोंमें कुशल, समस्त विद्याओंमें पारंगत, गुणवान्, गुणी जनोंपर स्नेह रखनेवाले, कृतज्ञ, मृदुभाषी, पाप कर्मोंसे विमुख, सत्यवादी, पवित्रताके स्थान, कम बोलनेवाले और जितेन्द्रिय थे। उन्होंने भगवान् वासुदेवके युगल चरणोंमें अपनी चित्तवृत्ति लगाकर ईति-भीतिसे रहित निर्द्वन्द्व राज्य किया। शिवे! उस परम सौभाग्यवान् नरेशके राज्यमें प्रत्येक महलके भीतर पग-पगपर भगवान्के ऊँचे-ऊँचे मन्दिर थे। वहाँके प्रत्येक मन्दिरमें गोविन्द, गोप, गोपाल, गोपीजनमनोहर, गदापाणे, गुणातीत, गुणाढ्य, गरुड़ध्वज, कमलापते, कृष्ण, केशव, कमलाक्ष, कालभयनाशन, पुरुषोत्तम, पापारि, पुण्डरीकलोचन, पीताम्बरधारी, पद्मनाभ, परात्पर, जनार्दन, जगन्नाथ, जाह्नवी-जलकी जन्मभूमि, जीवजन्महर, जंजपूकाघनाशन (नाम-जप करनेवालोंकी अघराशिका नाश करनेवाले), श्रीवत्सवक्ष, श्रीकान्त, श्रीकर, श्रेयोनिधे, श्रीरंग, शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, शौरे, शीतांशुलोचन, दामोदर, देवकीहृदयानन्द, नागराजकी शय्यापर सोनेवाले, विष्णु, वैकुण्ठनिलय, विष्टरश्रवा, विष्वक्सेन, वनमालिन्, त्रिविक्रम, त्रिलोकीश, चक्रपाणे और चतुर्भुज इत्यादि पवित्र नामोंका कीर्तन होता था। स्त्री, वृद्ध, बाल और गोपाल सभीके मुखसे भगवन्नामका उच्चारण होता था। जहाँ-तहाँ सब ओर भगवान् विष्णुकी मनोहर लीला-कथा सुनायी पड़ती थी। घर-घरमें तुलसीके बगीचे देखे जाते थे। भगवान् लक्ष्मीपतिके पवित्र एवं विचित्र चरित्रोंकी चर्चा होती थी। महलकी दीवारोंपर श्रीहरिके विचित्र चरित्र ही चित्रकारोंद्वारा अंकित किये गये थे। भगवत्कथाके सिवा दूसरी कोई वार्ता वहाँ नहीं सुनायी देती थी। उस राजाके भयसे व्याधलोग हरिणोंपर बाण नहीं चलाते थे, क्योंकि वे हरिण श्रीहरिके नामका एक अंश धारण करते हैं। इसीलिये वे वनमें सुखपूर्वक विचरते थे। कोई मछली और मांस खानेवाला मनुष्य भी उस राजाके डरसे कभी मछली, कछुवा और वराह आदिका वध नहीं करता था। एकादशी तिथि आनेपर उस अमित्रजितके राज्यमें उत्तान सोनेवाले शिशु भी स्तनपान नहीं करते थे। पशु भी एकादशीको घास चरना छोड़कर उपवास करते थे, फिर औरोंकी तो बात ही क्या है। उस हरिभक्त राजाके शासनकालमें एकादशी प्राप्त होनेपर समस्त पुरवासी मिलकर बड़ा भारी उत्सव मनाते थे। वहाँके लोग प्रतिदिन जो शुभकर्म करते थे उन्हें निष्कामभावसे भगवान् वासुदेवको समर्पित कर देते थे। महाराज अमित्रजितके लिये श्रीकृष्ण ही परम देवता, श्रीकृष्ण ही परम गति और श्रीकृष्ण ही परम बन्धु थे।
इस प्रकार उस राजाके राज्य करते समय एक दिन श्रीमान् देवर्षि नारद उनसे मिलनेके लिये आये। राजाने मधुपर्ककी विधिसे उनका यथावत् स्वागत-सत्कार किया। तब नारदजीने उनसे कहा—‘राजन्! तुम धन्य हो, कृतार्थ हो तथा सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी माननीय हो; क्योंकि समस्त प्राणियोंमें तुम्हें भगवान् गोविन्दका ही दर्शन होता है। जो भगवान् विष्णु वेदपुरुष हैं,
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८९
यज्ञपुरुष हैं, इस जगत्के अन्तरात्मा हैं तथा इसकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भी हैं, इस सम्पूर्ण विश्वको उन्हीं भगवान्का स्वरूप समझनेवाले भूपालशिरोमणे ! आज तुम्हारा कल्याणकारी दर्शन पाकर मैं परम पवित्र हो गया। इस क्षणभंगुर संसारमें एक ही सार वस्तु है, वह यह कि भगवान् लक्ष्मीकान्तके चरणारविन्दोंमें भक्ति-भाव बढ़ाया जाय; क्योंकि वह समस्त पुरुषार्थोंको देनेवाला है। जो सब कुछ छोड़कर सदा एकमात्र भगवान् विष्णुका भजन करता है, उस उत्तम बुद्धिवाले पुरुषकी सेवामें सब पदार्थ स्वयं ही उपस्थित होते हैं। जिसकी इन्द्रियाँ भगवान् हृषीकेशके चिन्तनमें स्थिर हो गयी हैं, वही इस अत्यन्त चंचल (क्षणभंगुर) ब्रह्माण्डमें स्थिरताको प्राप्त होता है। यौवन, धन और आयुको कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलविन्दुके समान अत्यन्त चपल जानकर एकमात्र भगवान् अच्युतकी शरण लेनी चाहिये *। जिसकी वाणीमें, चित्तमें सर्वत्र भगवान् जनार्दन विद्यमान रहते हैं, वह नररूपमें साक्षात् नारायण है। सदा उसीकी वन्दना करनी चाहिये। भगवान् लक्ष्मीपतिका निष्कपटभावसे ध्यान और पूजन करके इस पृथ्वीपर कौन श्रेष्ठपुरुष नहीं हो गया है। भूपाल ! तुम्हारी इस विष्णुभक्तिसे सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हारा कुछ उपकार करना चाहता हूँ और इसीलिये जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। विद्याधर-राजकुमारी मलयगन्धिनी अपने पिताके उद्यानमें अपनी सखियोंके साथ खेल रही थी। उसी समय कपालकेतुके पुत्र कंकालकेतु नामक महाबली दानवने आकर उसे हर लिया। आगामी तृतीयाको उसका पाणिग्रहण निश्चित हुआ है। वह कुमारी इस समय पाताललोककी चम्पकावती नगरीमें है। हाटकेश्वर शिवके स्थानसे मैं आ रहा था, तो उसने मुझे देखा और प्रणाम करके आँसू बहाते हुए कहा- "भगवन् ! राजा अमित्रजितसे आप मेरा यह संदेश कह दें-'महाराज ! मैं गन्धमादन पर्वतपर अपने पिताके उद्यानमें बालोचित खेल-कूदमें लगी हुई थी। उसी समय दुराचारी कंकालकेतु मुझे मूर्च्छित करके वहाँसे हर लाया। उसको दूसरे किसी अस्त्रके आघातसे जीतना कठिन है। वह अपने ही त्रिशूलसे मर सकता है। अन्यथा युद्धमें उसे परास्त करना असम्भव है। यदि कोई कृतज्ञ वीर मेरे दिये हुए त्रिशूलसे इस दुष्ट दानवको मारकर मुझे यहाँसे ले जाता, तो मेरा बड़ा उपकार होता। यदि यहाँ आकर आप मेरा उपकार करना चाहें, तो अवश्य आवें और उस दुष्ट दानवके हाथसे मेरा उद्धार करें। मुझे भी भगवती जगदम्बाने यह वर दिया है कि बेटी ! परम बुद्धिमान् विष्णुभक्त पुरुष तुमसे विवाह करेगा। तृतीया तिथितक देवीका यह वरदान जिस प्रकार सत्य हो सके वैसा प्रयत्न करें। आप केवल निमित्तमात्र हो जायँ।' राजन् ! इस प्रकार मलयगन्धिनीके वचनसे मैं तुम्हारे पास आया हूँ। तुम विष्णुभक्तिपरायण, तरुण और बुद्धिमान् हो। अतः कार्यकी सिद्धिके लिये जाओ और उस दुष्ट दानवको मारकर मलयगन्धिनीको शीघ्र ले आओ। नरेश्वर ! वह विद्याधरकुमारी तुम्हारी राह देखकर ही जीवित है।"
नारदजीका यह वचन सुनकर राजा अमित्रजितने चम्पकावती नगरीमें जानेका उपाय पूछा। तब नारदजीने पुन: कहा—'राजन् ! तुम पूर्णिमाके दिन शीघ्र ही समुद्रके तटपर पहुँचकर वहाँ एक नावपर बैठ जाओ। वहाँ तुम्हें एक रथपर कल्पवृक्ष दिखायी देगा। वहीं एक दिव्य पलंगपर कोई दिव्यांगना वीणा लेकर यह गाथा गान करती होगी—
यत्कर्म विहितं येन शुभं वाथ शुभेतरम्।
स एव भुङ्क्ते तत्तथ्यं विधिसूत्रनियन्त्रितः ॥
'जिस मनुष्यके द्वारा जो शुभ या अशुभ किया गया है, वही भाग्यसूत्रमें बँधकर उस कर्मका फल भोगता है। यह सर्वथा सत्य है।'
इस गाथाका भलीभाँति गान करके वह बाला रथ, कल्पवृक्ष और पलंगके साथ क्षणभरमें समुद्रके भीतर प्रवेश कर जायगी। उस समय तुम भी
* यौवनं धनमायुष्यं पद्मिनीजलविन्दुवत्। अतीव चपलं ज्ञात्वाच्युतमेकं समाश्रयेत्॥ (स्क० पु०, का० उ० ८२।४३)
८९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
निःशंक होकर नावसे उतरकर यज्ञवाराहकी स्तुति करते हुए शीघ्र उसके पीछे-पीछे चले जाना। ऐसा करनेपर तुम पाताललोकमें चम्पकावती नगरीको देखोगे।
यों कहकर ब्रह्मकुमार नारदजी अन्तर्धान हो गये। राजाने भी समुद्रतटपर पहुँचकर पूर्वोक्त सब बातोंका अवलोकन करके नारदजीके कहे अनुसार समुद्रके भीतर प्रवेश किया और वे चम्पकावती नगरीमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने उस विद्याधरकुमारीको देखा, मानो तीनों लोकोंकी सौन्दर्यलक्ष्मी एकत्र मूर्तिमान् हो गयी है। राजा उसके समीप गये। वह भी झूलेपरसे उतरकर लज्जाके भारसे नीचे मुख किये उनसे बोली—'मनोहर रूपवाले पुरुष ! आप कौन हैं, जो मुझ अभागिनीके चित्तको अपनी ओर खींचते हुए इस कालके घरमें चले आये हैं? वह क्रूर आकृतिवाला कंकालकेतु जबतक आ नहीं जाता, उसके पहले ही आप इस शस्त्रागारमें छिपकर बैठ जाइये। श्रीपार्वतीजीके वरदानसे वह मेरे कन्या-व्रतको भंग करनेमें समर्थ नहीं है, किंतु परसों आनेवाली तृतीया तिथिको वह मेरा पाणिग्रहण करना अवश्य चाहता है।'
विद्याधरीके ऐसा कहनेपर महाबाहु अमित्रजित् शस्त्रागारमें छिपे हुए-से बैठ गये। तदनन्तर सायंकालमें मृत्युको भी भयभीत करनेवाला वह भयंकर आकारवाला दानव आकर विद्याधरीसे बोला—'सुन्दरी ! इन दिव्य रत्नोंको ग्रहण करो। परसों पाणिग्रहण होनेसे तुम्हारा कन्याभाव निवृत्त हो जायगा। कल प्रातःकाल तुम्हारी सेवाके लिये सहस्रों दासियाँ दूँगा। दिक्पालोंके घरमें जितना भी वैभव है, उस सबकी तुम स्वामिनी होओगी। मेरी पत्नी बननेसे तुम मेरे साथ दिव्य भोगोंका उपभोग कर सकोगी।' इस प्रकार प्रलाप करके वह दानव अपनी गोदमें त्रिशूल रखकर उन्मत्त एवं निडर होकर सो गया। तब उसको सोया हुआ जानकर पार्वतीजीके वरदानको याद करती हुई विद्याधरकुमारीने मनुष्योंमें श्रेष्ठ सर्वांगसुन्दर तथा विष्णुभक्तिसे सुरक्षित राजाको बुलाया और दैत्यके अंगसे त्रिशूल लेकर कहा—'इसे ग्रहण कीजिये तथा इस दानवको शीघ्र मार डालिये।'
कन्याके हाथसे त्रिशूल लेकर बालसूर्यके समान कान्तिमान् राजा अमित्रजित्ने हर्षका अनुभव किया और उस विद्याधरकुमारीको अभयदान दिया। फिर जगत्की रक्षा करनेवाले मणिरत्नस्वरूप चक्रसुदर्शनधारी श्रीहरिका मन-ही-मन स्मरण करके निर्भय हो, बायीं लातसे उस दानवको मारा और कहा—'अरे ओ दुष्ट ! उठकर खड़ा हो। कन्याओंपर बलात्कार करनेवाले लम्पट ! आ, मेरे साथ युद्ध कर। मैं सोते हुए शत्रुको नहीं मारता।'
यह सुनकर वह दानव बड़े वेगसे उठा और बार-बार कहने लगा—प्रिये ! मेरा त्रिशूल तो दो। यह कौन है, जो मौतके घरमें आ गया है? मैंने इसे देख लिया है, अतः आज इसकी आयु पूरी हो चुकी है। ऐसा कहकर उस दानवने राजाकी छातीमें बड़े जोरसे मुक्का मारा। राजाके रक्षक भगवान् थे। अतः उन्होंने उस आघातसे थोड़ी-सी भी वेदनाका अनुभव नहीं किया। प्रत्युत उनकी कठोर छातीसे टकराकर दानवका हाथ ही टूटने-सा लगा। तब राजाने उसके मुखमें एक तमाचा मारा। इससे दानवका सिर घूम गया और वह एक बार धरतीपर गिरकर पुनः उठ खड़ा हुआ। किसी प्रकार धैर्य धारण करके उसने राजासे कहा—'मैंने जान लिया तुम मनुष्य नहीं, मनुष्यरूपमें साक्षात् विष्णु हो। मधुसूदन ! यदि तुम बलवान् हो तो एक बात करो। इस बड़े भारी त्रिशूलको त्यागकर अपने आयुधोंसे मेरे साथ युद्ध करो। तुमने वामनरूप धारण करके बलिको पातालमें भेजा है। तुम्हींने नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया था। तुमने ही जटाधारी रामरूपसे लंकापति रावणको मारा था और तुम्हींने गोपवेष ग्रहण करके कंस आदि असुरोंका संहार किया है। मत्स्यरूपसे तुम्हारे द्वारा शंख आदि बहुतसे दानव मारे गये हैं। मायावियोंमें अग्रगण्य मैं तुमसे डरता नहीं हूँ।
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * । ८९१
आज या कल प्रत्येक शरीरधारीको अवश्य मरना है। बल अथवा छलसे भी यदि तुम्हारे हाथसे मृत्यु हो, तो वही श्रेष्ठ है। यह विद्याधरी कन्या सती-साध्वी है। मैंने इसे कलंकित नहीं किया है, अपितु तुम्हारे लिये इसकी रक्षा की है।'
ऐसा कहकर दानवने पर्वतको भी हिला देनेवाले अपने बायें हाथके प्रहारसे राजाकी छातीपर आघात किया। राजाने उस प्रहारको सह लिया और हाथमें त्रिशूलको तौलते हुए उसकी छातीको निशाना बनाया। त्रिशूलकी मार खाकर दानवने उसी क्षण प्राण त्याग दिया। इस प्रकार देवताओंको कम्पित करनेवाले कंकालकेतुको मारकर राजाने विद्याधरीसे कहा—'सुन्दरि ! देवर्षि नारदके मुखसे तुम्हारा सन्देश पाकर मैंने तुम्हारी इच्छाके अनुसार यह कार्य किया है। अब बताओ और क्या करूँ?'
मलयगन्धिनी बोली—वीर ! तुम्हीं मेरे जीवन हो, मैं प्राणपणसे तुम्हारी हो चुकी हूँ, फिर मुझसे क्या पूछते हो।
विद्याधर-कन्याके ऐसा कहते ही देवलोकसे देवर्षि नारद मुनि आ पहुँचे। उनका दर्शन करके उन दोनोंको बड़ा सन्तोष हुआ। दोनोंने एक साथ मुनिको प्रणाम किया और मुनिने भी दोनोंको आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् नारदजीने पाणिग्रहणकी विधिसे दोनोंका मंगल अभिषेक किया और वे दोनों उन्हींके बताये हुए मार्गसे भूलोकमें आये। मलयगन्धिनीके साथ अमित्रजित काशीपुरीमें आये। वह पुरी पुरवासियोंद्वारा खूब सजायी गयी थी। विद्याधरीने दूरसे ही काशीका वैभव देखकर स्वर्गलोक और पातालनगरीको भी छोटा माना। राजा अमित्रजितने मलयगन्धिनीको धर्मपत्नीके रूपमें प्राप्त करके काशीमें धर्मप्रधान पीठका भलीभाँति सेवन किया और मनोवांछित उत्तम सुखको प्राप्त किया। एक समय उस पतिव्रता रानीने मनमें पुत्रकी कामना लेकर अपने विष्णुभक्त पतिसे एकान्तमें निवेदन किया—'राजन् ! प्राणनाथ ! यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं पुत्रकी कामनासे अभीष्ट तृतीयाका महान् व्रत करूँगी। वह व्रत मनोवांछित फलको देनेवाला है।'
राजाने पूछा—देवि ! अभीष्ट तृतीयाको कैसे व्रत किया जाता है, उसमें किस देवताकी पूजा होती है तथा उसका विधान और फल क्या है? जो नारी अपने पतिकी आज्ञा लिये बिना ही व्रत आदिका अनुष्ठान करती है, वह जीते-जी दुःख उठाती है और मरनेके बाद नरकमें जाती है।*
वीरेश्वरका जन्म, तपस्या, वीरेश्वरगलिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा
रानी बोली—पृथ्वीनाथ ! पूर्वकालमें पुत्रकी इच्छा रखनेवाली कुबेरपत्नी श्रीमुखीके आगे ब्रह्मपुत्र नारदजीने इस व्रतका वर्णन किया था। देवी श्रीमुखीने इस व्रतका पालन किया और उन्हें नलकुबर नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई। मार्गशीर्षमासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको कलशके ऊपर एक ताम्रपत्र रखकर उसे चावलसे भर दे। उसके ऊपर एक वस्त्र बिछावे, जो फटा-पुराना न हो, नवीन हो और उसे हल्दीके रंगमें रँग दे। उस वस्त्रके ऊपर सूर्यकी किरणोंसे विकसित हुए सुन्दर कमलपुष्पको रखकर उसकी कर्णिकापर स्वर्णनिर्मित ब्रह्माणीजीकी प्रतिमाकी स्थापना करके रत्न और रेशमी वस्त्र आदिके द्वारा उसकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पूजामें नाना प्रकारके सुन्दर पुष्प, नारंगी आदि फल, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थ, कपूर, कस्तूरी, उत्तम अन्न आदिके नैवेद्य, अनेक प्रकारके पकवान तथा अगर आदि धूप—इन सब वस्तुओंका यथावत् उपयोग करना चाहिये। फूलोंसे सजाये हुए सुन्दर मण्डपमें बैठकर निद्रारहित हो उत्तम उत्सव मनाते हुए रात्रिको जागरण करे।
* नारी पत्यननुज्ञाता या व्रतादि समाचरेत्। जीवन्ती दुःखिनी सा स्यान्मृता निरयमृच्छति ॥ (स्क० पु०, का० उ० ८२। १३९)
| ८९२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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मन्त्रवेत्ता द्विज एक हाथसे कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके 'जातवेदसे......' इत्यादि ऋचाद्वारा घृत और मधु आदिमें डुबोये हुए स्वतःविकसित एक सहस्र कमल-पुष्पोंकी आहुति दे। तत्पश्चात् नयी ब्यायी हुई सीधी-सादी सुलक्षणा कपिला गाय आचार्यको दान करे। पति-पत्नी नूतन वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो भक्तिपूर्वक उपवास करके दूसरे दिन चतुर्थीको प्रातःकाल स्नानके अनन्तर आचार्यकी आदरपूर्वक पूजा करें। उन्हें प्रसन्नतापूर्वक वस्त्र, आभूषण, माला एवं दक्षिणा दें। फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करके सब सामग्रियोंसहित स्वर्णप्रतिमा आचार्यको निवेदन करे—
नमो विश्वविधानज्ञे विधे विविधकारिणि।
सुतं वंशकरं देहि तुष्टामुष्माद्व्रताच्छुभात्॥
'सम्पूर्ण विश्वके विधानको जानने तथा नाना प्रकारकी सृष्टि करनेवाली देवी ब्रह्माणी! आपको नमस्कार है। इस शुभ व्रतके अनुष्ठानसे प्रसन्न होकर आप मुझे वंश चलानेवाला पुत्र दीजिये।'
तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणभोजन कराकर शेष अन्नसे स्वयं पारण करना चाहिये। राजन्! इस प्रकार यह व्रत मैं आपके साथ करना चाहती हूँ। आप मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करें।
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर श्रेष्ठ राजा अमित्रजितने प्रसन्नतापूर्वक पत्नीके साथ उस व्रतका अनुष्ठान किया। रानी गर्भवती हुई। गर्भावस्थामें उसने देवी पार्वतीसे यह प्रार्थना की—'महामाये! मुझे साक्षात् भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये, जो जन्म लेते ही स्वर्गलोकमें चला जाय और फिर लौट आवे। सम्पूर्ण भूमण्डलमें भगवान् शिवका वह सुप्रसिद्ध भक्त हो। मेरे स्तनोंका दूध पीये बिना ही वह क्षणभरमें सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाले किशोरके समान हो जाय।'
रानीकी भक्तिसे अत्यन्त सन्तुष्ट होकर गौरीदेवीने भी 'तथास्तु' कह दिया। तत्पश्चात् समय आनेपर रानीने मूलनक्षत्रमें एक पुत्रको जन्म दिया। उस समय हितैषी मन्त्रियोंने प्रसूतिगृहमें स्थित हुई रानीसे निवेदन किया—'देवि! आपका यह पुत्र दुष्ट नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। यदि आप राजाके जीवनकी रक्षा चाहती हैं, तो इस पुत्रको त्याग दें।' यह सुनकर पतिव्रता रानीने उस पुत्रको त्याग दिया। उन्होंने धाईको बुलाकर कहा—'धाय! पंचमुद्र नामक महापीठमें विकटा नामवाली एक मातृका रहती हैं। उनके आगे इस बालकको रखकर तू इस प्रकार कहना—'देवि! इस पुत्रको पार्वतीदेवीने दिया है। अब इसे मैं आपकी सेवामें सौंपती हूँ। पतिके हितकी इच्छा रखनेवाली महारानीने यह बालक आपको समर्पित किया है।'
रानीकी इस आज्ञाके अनुसार धाय उस सुन्दर बालकको विकटादेवीके आगे रखकर अपने घर लौट आयी। तब विकटादेवीने योगिनियोंको बुलाकर कहा—'इस बालकको तुम मातृकागणके आगे ले जाओ और उनकी जैसी आज्ञा हो, वह करो। इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना।' विकटाके कहनेसे आकाशगामिनी योगिनियोंने उस बालकको क्षणभरमें वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ ब्राह्मी आदि मातृकाएँ विद्यमान हैं। ब्रह्माणी, वैष्णवी, रौद्री, वाराही, नारसिंही, कौमारी, माहेन्द्री, चामुण्डा और चण्डिका—इन नौ मातृकाओंने विकटाके भेजे हुए उस सुन्दर बालकको देखकर उससे एक साथ पूछा—'बेटा! तेरे पिता और माता कौन हैं?' जब वह कुछ न बोल सका, तब मातृकागणने योगिनियोंसे कहा—'इसमें बड़े उत्तम लक्षण दिखायी देते हैं, यह बालक राजा होनेके योग्य है। अतः योगिनियो! तुम इसे पुनः उसी पीठमें ले जाओ, जहाँ महादेवी पंचमुद्रा (विकटा) रहती हैं। उस पीठकी सेवा और विश्वनाथजीकी कृपासे सोलह वर्षकी-सी आकृतिवाले इस बालकको उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी।' इस प्रकार मातृकागणोंका आशीर्वाद मिलनेपर योगिनियोंने पुनः क्षणभरमें उस बालकको उसी पंचमुद्रांकित पीठमें पहुँचा दिया। स्वर्गलोकसे इस लोकमें आया हुआ वह बालक काशीमें बड़ी भारी दिव्य तपस्या करने लगा। उसकी तीव्र तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिव लिंगरूपसे उसके आगे प्रकट हुए और बोले—'राजकुमार! तुम वर
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८९३
माँगो, मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ।'
अत्यन्त कृपापूर्वक सात पाताल फोड़कर अपने आगे स्थित हुए ज्योतिर्मय लिंगको देखकर बालकने दण्डके समान पृथ्वीपर गिरकर प्रणाम किया और रुद्रदेवतासम्बन्धी सूक्तोंसे उनकी स्तुति करके बोला— 'महादेव ! आप सांसारिक ताप हरनेवाले हैं। कृपया सदा इस शिवलिंगमें स्थित रहें और अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण किया करें। जो लोग यहाँ आकर आपका दर्शन, स्पर्श और नमस्कार करें, उन्हें आप परम उत्तम सिद्धि प्रदान करते रहें।' इस प्रकार उसके माँगे हुए वरको सुनकर भगवान् शिवने कहा— 'वीर ! तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब कुछ पूर्ण हो। विष्णुभक्त राजा अमित्रजित तुम्हारे पिता हैं, तुम उन्हींसे उत्पन्न हुए हो और साक्षात् भगवान् विष्णुके अंश हो। हे वीर ! यह शिवलिंग तुम्हारे ही नामपर 'वीरेश्वर' कहलायेगा। यह काशीमें अपने भक्तोंका मनोरथ सिद्ध करेगा। वीर ! आजसे मैं सदा इस लिंगमें स्थित रहूँगा और शरणागतोंको परम उत्तम सिद्धि दूँगा। कलियुगमें प्रायः कोई भी मेरी महिमाको नहीं जानेगा। जो भाग्यसे जानेगा, वह उत्तम सिद्धिको प्राप्त होगा। यहाँ किया हुआ जप, होम, दान, पूजन एवं जीर्णोद्धार आदि पुण्यकार्य अक्षय फलका साधक होगा। तुम सब राजाओंके लिये दुर्लभ, श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करके अन्तमें सिद्धि पाओगे। वीर ! वीरेश्वर-तीर्थमें स्नान और वीरेश्वरकी पूजा करके मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेगा। चतुर्दशी तिथिमें वीरेश्वरकी पूजा करके यत्नपूर्वक एक रात्रिमें भी जागरण कर लेनेपर मनुष्य फिर पांचभौतिक शरीरको नहीं ग्रहण करता है। जो वीरेश्वरके समीप एक महारुद्रियका जप करे अथवा करावेगा, उसे कोटि रुद्रियका फल प्राप्त होगा। वीरेश्वरके निकट व्रती मनुष्य जो व्रत और उद्यापन आदि करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म कोटिगुना हो जाता है। जिसने भगवान् वीरेश्वरके सम्मुख आठ बार नमस्कार कर लिये, उसे आठ करोड़ नमस्कारका फल मिलता है। वीर ! यह वीरेश्वर-लिंग मेरे वरदानसे सब प्रकारकी सम्पत्तियोंका स्थान होगा। वीरेश्वर-लिंगकी सेवा करनेवाले पुरुषोंको मेरी आज्ञासे जीते-जी ही तारक ज्ञानकी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको इस वीरेश्वर-लिंगका सेवन अवश्य करना चाहिये।'
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दुर्वासेश्वर (कामेश्वर)-लिंगकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—एक समय महातपस्वी दुर्वासा ऋषि भगवान् शंकरके आनन्दवनमें आये। यहाँ अनेक प्रकारके मन्दिरोंसे सुशोभित भगवान् शंकरका क्रीडास्थान, बहुत-से कुण्ड और पोखरे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। बहुत-से श्रेष्ठ शिवभक्त सब अंगोंमें विभूति लगाये, मस्तकपर जटा बढ़ाये, कौपीनमात्र पहने महादेवजीके ध्यानमें तत्पर थे। उनका दर्शन करके दुर्वासा मुनिको बड़ा हर्ष हुआ। कहीं-कहीं असंग, अपरिग्रह, कालसे भी भय न रखनेवाले तथा विश्वनाथजीके शरणागत त्रिदण्डी संन्यासी दिखायी देते थे। उन सबके दर्शनसे दुर्वासाजी बड़े आनन्दित हुए और मन-ही-मन कहने लगे 'यह परम कल्याणका स्थान है, ऐसा स्थान स्वर्गलोकमें भी कहाँ है। यह काशीपुरी तो पशु-पक्षियोंके भी परमानन्दको बढ़ानेवाली है। यह विश्वनाथपुरी मेरे चित्तको जिस प्रकार आकृष्ट कर रही है, वैसा आकर्षण न तो सम्पूर्ण भूमण्डलमें है, न स्वर्गलोकमें है और न पातालमें ही है।' इस प्रकार उस पुरीकी प्रशंसा करके दुर्वासाजीकी चित्तवृत्ति शान्त हुई। फिर वे वहाँ दीर्घकालतक भारी तपस्यामें लगे रहे, परंतु जब उसका कोई फल नहीं दिखायी दिया, तब उनके क्रोधकी सीमा नहीं रही। वे कहने लगे 'मुझको धिक्कार है, मेरे कठोर तपको
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भी धिक्कार है और सबको ठगनेवाले इस शिवक्षेत्रको भी धिक्कार है। अब मैं ऐसा करूँ जिससे यहाँ किसीकी मुक्ति न हो।' ऐसा विचारकर जब वे काशीको शाप देनेके लिये उद्यत हुए, तब भगवान् शिव जोर-जोरसे हँसने लगे। तत्काल ही वहाँ एक शिवलिंग प्रकट हो गया, जो 'प्रहसितेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। उससे साक्षात् भगवान् शंकर दुर्वासाके शापसे पुरीकी रक्षा करनेके लिये प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'महाक्रोधी तापस! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'
शाप देनेके लिये जिनका हाथ उठ चुका था, वे दुर्वासा मुनि भगवान् शंकरका करुणामय वचन सुनकर लज्जित हो गये और बोले—तीनों लोकोंको अभय देनेवाली इस काशीपुरीको शाप देनेके लिये उद्यत होनेवाले मुझको धिक्कार है। जो बुद्धिमान् काशीपुरीकी स्तुति करता है, जो काशीको हृदयमें धारण करता है, उसने बड़ी भारी तपस्या की है और उसीने करोड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। 'काशी' यह दो अक्षरोंका नाम जिसकी जिह्वाके अग्रभागपर स्थित है, उस उत्तम बुद्धिवाले पुरुषको कभी गर्भमें नहीं आना पड़ता। जो 'काशी' इस दो अक्षरके मन्त्रका प्रतिदिन प्रातःकाल जप करता है, वह इहलोक और परलोक—दोनोंको जीतकर लोकातीत पदको प्राप्त होता है।
भगवान् शिव बोले—अनसूयानन्दन! इस समय काशीकी स्तुतिके पुण्यसे तुम्हें जैसा उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ है, वैसा पहले तपस्यासे भी नहीं प्राप्त हुआ था। मुने! काशीकी स्तुतिकी लालसा रखनेवाला मनुष्य मुझे जैसा अतिशय प्रिय प्रतीत होता है, वैसा प्रिय यज्ञकी दीक्षा लेकर निरन्तर मेरा यजन करनेवाला पुरुष भी नहीं लगता।
यह सुनकर दुर्वासाजीने भगवान् शिवका स्तवन किया और प्रसन्न होकर वर माँगते हुए कहा—देवदेव! जगन्नाथ! करुणाकर! शंकर! मृत्युंजय! उग्र! भूतनाथ! पार्वतीपते! त्रिलोचन! नाथ! धूर्जटे! यहाँ प्रकट हुआ यह लिंग 'कामद' नामसे प्रसिद्ध होवे और यह तड़ाग 'कामकुण्ड' कहलाये।
देवदेवने कहा—महातेजस्वी मुने! 'एवमस्तु'। तुमने जो दुर्वासेश्वर-लिंगकी स्थापना की है, वही मनुष्योंकी कामना पूर्ण करनेके कारण कामेश्वर नामसे विख्यात होगा। जो शनिवारयुक्त त्रयोदशीको प्रातःकाल तुम्हारे स्थानपर स्थित कामकुण्डमें स्नान और तुम्हारे द्वारा स्थापित कामेश्वर-लिंगका दर्शन करेगा, वह कामजनित दोषसे यमयातनाको नहीं प्राप्त होगा। अनेक जन्मोंके उपार्जित नाना प्रकारके पाप काम-तीर्थके जलमें स्नान करनेसे क्षण भरमें नष्ट हो जायेंगे। कामेश्वरकी सेवासे समस्त कामनाएँ पूर्ण होंगी।
ऐसा वरदान देकर भगवान् शिव उसी लिंगमें विलीन हो गये। उस शिवलिंगकी आराधनासे दुर्वासा ऋषिने सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लीं। इसलिये बड़ी-बड़ी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सदा प्रयत्नपूर्वक काशीमें कामेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। महापातकोंकी शान्तिके लिये कामकुण्डमें स्नान करके कामेश्वरका दर्शन-पूजन करना चाहिये।
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श्रीविश्वकर्मेश्वर-लिंगकी महिमा
पार्वतीजी बोलीं—भगवान्! काशीमें परम विख्यात जो विश्वकर्मेश्वर-लिंग है, उसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कहिये।
महादेवजीने कहा—देवि! पूर्वकालमें त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वकर्मा हुए, जो ब्रह्माजीके द्वितीय स्वरूप हैं। उपनयन-संस्कार हो जानेपर वे गुरुकुलमें रहकर भिक्षान्न-भोजन एवं गुरुशुश्रूषा करने लगे। एक दिन वर्षाकाल आनेपर गुरुने उन्हें आज्ञा दी—'वत्स! तुम मेरे लिये एक पर्णशाला बना दो, जहाँ वर्षाका कष्ट न हो, जो कभी नष्ट
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८९५
और पुरानी न हो।' तत्पश्चात् गुरुपत्नीने आज्ञा दी—'तुम मेरे लिये चोली बना दो, जो मेरे शरीरके अनुरूप हो, न कसी हुई हो और न ढीली ही हो। वह कपड़ेके बिना केवल वल्कलसे बनी हो, बहुत सुन्दर हो और सदा स्वच्छ रहनेवाली हो।' इसके बाद गुरुके पुत्रने आदेश दिया—'मेरे लिये दो खड़ाऊँ तैयार करो, जिनपर चढ़कर मेरे पैरोंको कभी कीचड़का स्पर्श न हो, उनमें चमड़े आदिका बन्धन न लगा हो, जो दौड़ते समय भी मुझे आराम देनेवाली हों तथा जिनके द्वारा मैं स्थल—भूमिकी भाँति जलके ऊपर भी अच्छी तरह चल सकूँ।' अन्तमें गुरुपुत्री बोली—'मेरे लिये अपने ही हाथसे दो सोनेके कर्णफूल बना दो। साथ ही लड़कियोंके खेलनेयोग्य खिलौने भी दो, जो हाथीदाँतके बने हुए और तुम्हारे ही हाथसे तैयार किये गये हों।'
पार्वती! तब विश्वकर्माने सबके आगे 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा' इस प्रकार प्रतिज्ञा की और वनके भीतर प्रवेश करके वे चिन्ता करने लगे। कुछ करना तो जानते नहीं थे, परंतु 'मैं सब करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा सबके सामने कर चुके थे। अतः मन-ही-मन इस विचारमें पड़े कि 'क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कौन मुझे बुद्धिकी भी सहायता देगा, मैं किसकी शरणमें जाऊँ। जो मूढ़ मानव गुरु, गुरुपत्नी और गुरु-पुत्रकी आज्ञा स्वीकार करके उसे पूर्ण नहीं करता, वह नरकगामी होता है। ब्रह्मचारियोंका प्रधान धर्म गुरुशुश्रूषा ही है। गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन न करनेपर जो दोष लगेगा, उससे मेरा उद्धार कैसे होगा। मैं इस वनमें रहकर उनकी बात कैसे पूरी कर सकूँगा। गुरुजनोंकी तो बात दूर रही, दूसरे छोटे मनुष्योंके भी कार्यको 'हाँ' कहकर स्वीकार कर लेनेपर जो उसे पूरा नहीं करता, वह नरकगामी होता है। मैं अज्ञानी हूँ, असहाय हूँ। इन सब कार्योंको मैं कैसे पूर्ण कर सकूँगा। इन्हें स्वीकार तो मैंने भयके कारण कर लिया है।'
वनके मध्यभागमें बैठे हुए विश्वकर्मा जब इस प्रकार चिन्तामें लगे थे, उसी समय उन्हें अकस्मात् एक तपस्वी महात्मा दिखायी दिये। उनको नमस्कार करके विश्वकर्माने पूछा—'आप कौन हैं, जो मेरे मनको बहुत सुखी कर रहे हैं? आप तापसरूपमें मेरे प्रारब्ध हैं अथवा साक्षात् करुणावरुणालय भगवान् शिव ही प्रकट हो गये हैं। आप जो हों, सो हों, आपको नमस्कार है। मुझे उपदेश दें, मैं गुरुकी, गुरुपत्नीकी तथा गुरुपुत्रोंकी आज्ञाका पालन कैसे कर सकता हूँ, इसके लिये कोई उपाय बताइये।' वनमें उस ब्रह्मचारी बालकके ऐसा कहनेपर तपस्वी बोले—'त्वाष्ट्र! यह कौन-सी अद्भुत बात है? ब्रह्माजी भी भगवान् विश्वनाथकी कृपासे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेमें प्रवीण हुए हैं। यदि तुम काशीमें जाकर सर्वज्ञ विश्वनाथजीकी आराधना करोगे तो तुम्हारा विश्वकर्मा नाम सार्थक होगा। श्रीकाशीपुरीमें विश्वनाथजीकी कृपासे कोई भी मनोरथ दुर्लभ नहीं है। बालक! यदि तुम अपने मनोरथोंको प्राप्त करना चाहते हो तो विश्वनाथजीके स्थान काशीपुरीमें जाओ।'
इस प्रकार तपस्वीका वचन सुनकर विश्वकर्माने पूछा—महात्मन्! भगवान् शिवका वह आनन्दवन-काशी कहाँ है?
तपस्वी बोले—मैं भी वहाँ जानेकी इच्छा रखता हूँ, मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें पहुँचा देता हूँ।
तब उन अतिशय कृपालु महर्षिके साथ विश्वकर्मा विश्वनाथजीकी पुरीमें गये। वहाँ जानेसे उनका मन स्वस्थ हो गया। विश्वकर्माको काशीमें पहुँचाकर वे तपस्वी कहीं असम्भावित गतिसे चले गये। विश्वकर्मा सोचने लगे, 'कहाँ तो उस वनमें व्याकुल चित्तवाला मैं और कहाँ वे तापस मुनि, जो मुझे उत्तम उपदेश देकर यहाँ ले आये। यह सब उन्हीं त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवकी लीला है, जिनके भक्तको कहीं कुछ भी दुर्लभ नहीं है। मेरी गुरुभक्ति ही भगवान् शिवको प्रसन्न करनेमें कारण हुई है। उसीसे सन्तुष्ट होकर परम दयालु भगवान् विश्वनाथने मुझपर अनुग्रह किया है। यदि मुझपर उनकी कृपा न होती तो तपस्वीका संग कैसे प्राप्त
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होता। मनुष्य जब साधु पुरुषोंद्वारा सेवित वेदोक्त मार्गका त्याग नहीं करता, तभी उसपर भगवान् विश्वनाथ अपनी उत्तम दयाका विस्तार करते हैं।'
इस प्रकार अपने ऊपर भगवान् विश्वेश्वरकी कृपाका समर्थन करके विश्वकर्माने पवित्र भावसे एक शिवलिंगको स्थापित किया और स्वस्थचित्त होकर भगवान् विश्वनाथकी आराधना की। वे वनसे ऋतुके अनुकूल बहुत-से पुष्प लाकर स्नान करके नित्य भगवान् शिवकी पूजा करते तथा कन्द, मूल और फलसे जीविका चलाते थे। इस प्रकार शिवलिंगकी आराधनामें मन लगाये हुए विश्वकर्माके जब तीन वर्ष व्यतीत हो गये, तब करुणानिधान भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न हो उसी लिंगसे प्रकट होकर बोले—'त्वाष्ट्र! मैं तुम्हारी दृढ़ भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई वर माँगो। बालक! गुरु-गुरुपत्नी तथा गुरुपुत्रोंने तुमसे जो कुछ माँगा है, वह सब पूर्ण करनेकी शक्ति तुम्हें प्राप्त होगी। धातु, लकड़ी, पत्थर, मणि, रत्न, फूल, वस्त्र, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ, जल, कन्दमूल, फल, द्रव्य और वल्कल—इन सब वस्तुओंका काम बनानेकी विद्या तुम्हें प्राप्त होगी। जिस-जिस पुरुषकी, जैसे-जैसे घर या मन्दिर बनवानेकी रुचि होगी, उस-उसके सन्तोषके लिये तुम सब कुछ उसी प्रकार करनेकी कलामें प्रवीण होओगे। सब प्रकारके शृंगार और आभूषणोंकी रचना, सब प्रकारकी रसोईके संस्कार, सभी तरहके शिल्पकर्म, नृत्य, गीत और वाद्यसम्बन्धी सब वस्तुओंको बनानेकी विधि तुम्हें ज्ञात होगी। शिल्पनिर्माणकी कलामें तुम दूसरे ब्रह्मा समझे जाओगे। अनेक प्रकारके यन्त्र (मशीन), भाँति-भाँतिके अस्त्रोंका निर्माण, जलाशय (कूप, तड़ाग, बावली आदि) तथा उत्तम दुर्गकी रचनाका भी तुम्हें ज्ञान होगा। तुम मेरे वरदानसे सम्पूर्ण कलाओंके ज्ञाता हो जाओगे। सारी इन्द्रजाल-विद्या भी तुम्हारे अधीन होगी। सब कर्मोंमें कुशलता, सब बुद्धियोंकी श्रेष्ठता और सबकी मनोवृत्तियोंका ज्ञान तुम्हें स्वतः प्राप्त होगा। सम्पूर्ण विश्वमें अखिल कर्मोंका ज्ञाता होनेके कारण तुम्हारा यह विश्वकर्मा नाम यथार्थ होगा।'
विश्वकर्मा बोले—भगवन्! मैंने अज्ञ होते हुए भी यह जो शिवलिंग स्थापित किया है, इसकी आराधना करके मेरी ही भाँति दूसरे लोग भी सद्बुद्धिके पात्र हों।
महादेवजीने कहा—'एवमस्तु'। तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंगकी आराधना करनेवाले सब लोग सद्बुद्धिके पात्र हों और सभी युक्तिकी दीक्षाके अधिकारी बनें। तात! ब्रह्माजीके वरदानसे जब दिवोदास यहाँके राजा होंगे, तब तुम मेरे आदेशसे मेरा मन्दिर निर्माण करोगे। विश्वकर्मन्! अब तुम जाओ और गुरुजीकी आज्ञाके पालनका यत्न करो, क्योंकि जो गुरुके भक्त हैं, वे निःसन्देह मेरे ही भक्त हैं। भक्तोंका अभीष्ट पूर्ण करनेवाला मैं तुम्हारे द्वारा स्थापित उस अर्चाविग्रहमें निरन्तर निवास करूँगा। अंगारेश्वरसे उत्तर भागमें जो तुम्हारे स्थापित किये हुए इस लिंगकी आराधना करेंगे, उन्हें पग-पगपर अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होगी।'
ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये और विश्वकर्मा अपने गुरुके पास आये। गुरुकी अभिलाषा पूर्ण करके वे अपने घर चले गये। घरपर भी अपने सत्कर्मसे उन्होंने माता-पिताको सन्तुष्ट किया और सदा उनकी आज्ञाका पालन किया। तत्पश्चात् वे काशी चले आये और अपने द्वारा स्थापित शिवलिंगकी आराधनामें संलग्न हो गये।
श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती! तुमने काशीपुरीमें मुक्ति देनेकी शक्ति रखनेवाले जिन शिवलिंगोंका परिचय पूछा था, उन सबका वर्णन मैंने किया। ॐकारेश्वर, त्रिविष्टपेश्वर, महादेवेश्वर, कृत्तिवासेश्वर, रत्नेश्वर, चन्द्रेश्वर, केदारेश्वर, धर्मेश्वर, वीरेश्वर, कामेश्वर, विश्वकर्मेश्वर तथा मणिकर्णिश्वर, अविमुक्तेश्वर और सम्पूर्ण विश्वको सुख देनेवाले विश्वनाथ नामसे प्रसिद्ध विश्वेश्वर—ये सभी मुक्तिदायक लिंग हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें आकर जिसने भगवान् विश्वेश्वरका पूजन कर लिया, उसका
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * । ८९७
सैकड़ों कल्पोंमें भी जन्म नहीं होता। जितेन्द्रिय संन्यासियोंको आठ महीने घूमनेका विधान है और वर्षाके चौमासेमें एक स्थानपर रहनेके लिये शास्त्रकी आज्ञा है। उन्हें किसी एक स्थानपर लगातार एक वर्षतक नहीं रहना चाहिये। परंतु अविमुक्त क्षेत्रमें जिनका प्रवेश हो गया है, ऐसे संन्यासियोंके लिये भ्रमण करनेका आदेश लागू नहीं होता और उन्हें यहाँ मोक्ष भी निःसन्देह प्राप्त हो जाता है। इसलिये कभी काशीपुरीका परित्याग नहीं करना चाहिये। इन चौदह लिंगोंकी माहात्म्य-कथा सुनकर श्रेष्ठ पुरुष चौदहों भुवनोंमें उत्तम सम्मान प्राप्त करेगा।
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दक्षेश्वर तथा पार्वतीश्वर लिंगका माहात्म्य
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! भगवान् शंकरके गणोंने जब दक्षयज्ञका विध्वंस कर दिया, उस समय ब्रह्माजीने दक्षको यह उपदेश दिया कि 'प्रजापते! भगवान् शंकरकी निन्दासे जो दुस्त्यज पापपंक उत्पन्न हो गया है, उसको धो डालनेकी इच्छा हो तो तुम काशीपुरीमें जाओ। बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली पुण्यमयी काशीपुरीमें जाकर तुम वहाँ शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करो। इससे भगवान् शंकर सन्तुष्ट होते हैं और उनके सन्तुष्ट होनेपर यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सन्तुष्ट हो जाता है। मनीषी महर्षियोंने ब्रह्महत्या आदि पापोंका प्रायश्चित्त तो कहा है, परंतु शिवनिन्दाजनित पापका प्रायश्चित्त नहीं बताया है। उसका प्रायश्चित्त तो केवल काशी ही है। जिन पुण्यात्माओंने काशीमें शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की है, उनके द्वारा सब धर्मोंका अनुष्ठान हो गया। इस संसारमें वे ही पुरुषार्थी हैं।'
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर दक्ष प्रजापति शीघ्र ही काशीपुरीमें आये और वहाँ बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। उन्होंने विधिपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना करके उसकी आराधना प्रारम्भ कर दी। उस लिंगसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको इस भूतलपर वे नहीं जानते थे। प्रजापति दक्ष दिन-रात भगवान् महेश्वरकी स्तुति, पूजा, नमस्कार, ध्यान और दर्शन करते थे। एकचित्त होकर उस ईश्वरलिंगकी आराधना करते हुए दक्षके बारह हजार वर्ष व्यतीत हो गये। दक्षकन्या सती अपना शरीर त्यागकर जब हिमाचलकी पतिव्रता पत्नी मेनाके गर्भसे प्रकट हुईं और उमारूपसे अत्यन्त तपस्या करके जब उन्होंने पिनाकपाणि भगवान् शिवको पतिरूपमें प्राप्त कर लिया, तबतक तपस्यामें निश्चलभावसे बैठे हुए दक्ष शिवलिंगकी आराधना करते रहे। तदनन्तर गिरिराजकिशोरी उमा जब अपने पतिके साथ काशी आयीं और दक्षको निश्चलचित्तसे शिवलिंगकी आराधनामें तत्पर देखा, तब देवीने महादेवजीसे निवेदन किया—'प्रभो! ये तपस्या करते-करते अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं। कृपासिन्धो! अब तो इन प्रजापतिको वरदान देकर प्रसन्न कीजिये।'
देवी अपर्णाके ऐसा कहनेपर महेश्वरने दक्षसे कहा—महाभाग! वर माँगो।
भगवान् शंकरका ऐसा वचन सुनकर प्रजापतिने उन्हें अनेक बार प्रणाम किया और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उन्हें प्रसन्न देखकर इस प्रकार कहा—'देव! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे और मैंने जो आपके महालिंगकी यहाँ स्थापना की है, इसमें आप सदा निवास करें। कृपानिधे! मैंने जो आपका अपराध किया है, उसे क्षमा कर दें।'
यह सुनकर महादेवजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—तुमने जैसा कहा है, वह सब उसी प्रकार होगा। प्रजापते! तुमने जो दक्षेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की है, इसके सेवनसे मैं पुरुषोंके सहस्रों अपराध क्षमा कर दूँगा, इसमें सन्देह नहीं है।
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अतः मनुष्योंको इस दक्षेश्वर लिंगकी पूजा अवश्य करनी चाहिये और तुम इस लिंगार्चनके पुण्यसे सर्वमान्य होओगे। दो परार्ध व्यतीत होनेपर तुम मोक्षको प्राप्त हो जाओगे। ऐसा कहकर महादेवजी उसी लिंगमें अन्तर्धान हो गये। प्रजापति दक्ष भी पूर्णमनोरथ होकर अपने घरको लौट गये।
अगस्त्य! इस प्रकार दक्षेश्वरकी उत्पत्ति बतायी गयी।
अगस्त्यजी बोले— पार्वतीनन्दन! अब पार्वतीश्वर लिंगकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये।
स्कन्दजीने कहा— मुने! एक दिन हिमाचलकी पतिव्रता पत्नी मेनाने अपनी पुत्री पार्वतीसे पूछा— 'बेटी! तुम्हारा और भगवान् महेश्वरका कौन-सा स्थान है, कौन घर है और कौन बन्धु है? तुम कुछ जानती हो तो बताओ।'
माताका यह प्रश्न सुनकर पार्वतीजीको बड़ी लज्जा हुई और उन्होंने अवसर पाकर भगवान् शिवको नमस्कार करके कहा— प्राणवल्लभ! अब मुझे निश्चितरूपसे ससुराल चलना चाहिये। यहाँ रहना उचित नहीं है, अतः मुझे अपने घर ले चलें। पार्वतीकी यह बात सुनकर यथार्थ रहस्यको जाननेवाले महादेवजीने हिमालयको छोड़ दिया और अपने परमधाम आनन्दवनमें चले आये। परमानन्दके हेतुभूत आनन्दवनमें आकर आनन्दस्वरूपा पार्वतीदेवी अपने पिताके घरको भूल गयीं।
तदनन्तर एक दिन गौरीदेवीने महेश्वरसे पूछा— भगवन्! इस क्षेत्रमें अविच्छिन्न आनन्दका समुद्र क्यों उमड़ रहा है, यह बतानेकी कृपा करें। | गौरीका यह वचन सुनकर पिनाकधारी शिवने कहा— 'यह पाँच कोसका क्षेत्र मुक्तिधाम है। यहाँ तिलके बराबर भी कोई कहीं ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ कोई शिवलिंग न हो। यहाँ बहुत-से परमानन्द-स्वरूप लिंग हैं। चौदहों भुवनोंमें जो पुण्यात्मा निवास करते हैं, उन सबने अपने-अपने नामसे यहाँ लिंग-स्थापना की है और इससे कृतार्थताका अनुभव किया है। पार्वती! यही कारण है कि यह क्षेत्र असीम आनन्दका प्रधान हेतु बन गया है।'
महादेवी बोलीं— नाथ! तब मुझे भी यहाँ शिवलिंग स्थापित करनेकी आज्ञा दीजिये। पतिकी आज्ञा लेकर पतिव्रता नारी जो-जो कल्याणमय कार्य करती है, उसके श्रेयकी हानि कभी प्रलयकालमें भी नहीं होती। इस प्रकार देवेश्वरको प्रसन्न करके उनकी आज्ञा ले गौरीजीने महादेवेश्वरके समीप एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसके दर्शनसे मनुष्योंके ब्रह्महत्या आदि पातक नष्ट हो जाते हैं और उन्हें फिर कभी देहबन्धन नहीं प्राप्त होता। मुने! महादेवजीने उस लिंगको जो वरदान दिया है, उसको श्रवण करो। 'जो कोई काशीमें पार्वतीश्वर नामक लिंगका भलीभाँति पूजन करेगा, वह देहावसान होनेपर मुझमें ही प्रवेश करेगा। चैत्र शुक्ला तृतीयाको पार्वतीश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य इस लोकमें सौभाग्य और परलोकमें सद्गति प्राप्त करता है। जो श्रेष्ठ पुरुष पार्वतीश्वरका माहात्म्य सुनेगा, वह परम बुद्धिमान् होकर इहलोक और परलोककी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करेगा।'
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नर्मदेश्वर तथा सतीश्वर लिंगका माहात्म्य
स्कन्दजी कहते हैं— मुने! अब मैं आपसे नर्मदेश्वरका माहात्म्य कहता हूँ, जिसके स्मरण-मात्रसे बड़े-बड़े पातकोंका नाश हो जाता है। इस वाराहकल्पके प्रारम्भमें बड़े-बड़े महर्षियोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा— 'मृकण्डनन्दन! सब नदियोंमें श्रेष्ठ नदी कौन-सी है?' | मार्कण्डेयजी बोले— मुनियो! आप सब लोग सुनें। भारतवर्षमें सैकड़ों नदियाँ हैं। वे सभी पापोंका नाश करनेवाली और पुण्य देनेवाली हैं। उन सबमें श्रेष्ठ वे नदियाँ हैं, जो समुद्रमें मिली हैं। उनमें भी गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती— ये चार नदियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं। गंगा ऋग्वेदमूर्ति,
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध *
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यमुना यजुर्वेदमूर्ति, नर्मदा सामवेदमूर्ति और सरस्वती
अथर्ववेदस्वरूपा हैं। इनमें भी गंगा ही सब नदियोंकी
उत्पत्तिकी कारणभूता हैं, वे ही समुद्रको भी
भरती हैं। इस भूमण्डलमें गंगाजीकी समता करनेवाली
दूसरी कोई श्रेष्ठ नदी नहीं है। परंतु पूर्वकालमें
नर्मदा नदीने बहुत वर्षोंतक तपस्या करके ब्रह्माजीको
प्रसन्न किया। जब ब्रह्माजी वर देनेको उद्यत हुए,
तब नर्मदाने इस प्रकार प्रार्थना की- 'भगवन्!
यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजीके समान कर
दीजिये।' तब ब्रह्माजीने मुसकराते हुए कहा-
'यदि दूसरा कोई देवता भगवान् त्रिलोचनकी
समता प्राप्त कर ले, दूसरा कोई पुरुष पुरुषोत्तम
श्रीविष्णुके समान हो जाय, दूसरी कोई नारी
भगवती पार्वतीकी समानता कर ले तथा दूसरी
कोई नगरी काशीपुरीकी बराबरी कर सके तो
दूसरी नदी भी गंगाके समान हो सकती है।'
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर नर्मदा उनके
वरदानका त्याग करके काशीपुरीमें चली गयी।
वहाँ भगवान् त्रिलोचनके समीप पिलपिलातीर्थमें
उसने विधिपूर्वक शिवलिंग स्थापित किया। तब
उस पुण्यात्मा नदीके ऊपर भगवान् शंकर बहुत
प्रसन्न हुए और बोले- 'सौभाग्यशालिनि! तुम
अपनी रुचिके अनुसार वर माँगो।' यह सुनकर
सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा बोली- 'देवेश्वर! तुच्छ
वर माँगनेसे क्या लाभ? आपके युगलचरणोंमें
मेरी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे।' नर्मदाकी यह बात
सुनकर भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हो बोले-
'नर्मदे! तुम्हारे तटपर जितने भी प्रस्तरखण्ड हैं,
वे सब मेरे वरसे शिवलिंगस्वरूप हो जायँगे।
गंगामें स्नान करनेपर शीघ्र ही पापका नाश होता
है, यमुना सात दिनके स्नानसे और सरस्वती तीन
दिनके स्नानसे सब पापोंका नाश करती है, परंतु
तुम दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका निवारण करनेवाली
होओगी। तुमने जो यहाँ नर्मदेश्वर नामक शिवलिंगकी
स्थापना की है, वह लिंग परम पुण्यमय तथा
शाश्वत मोक्ष देनेवाला होगा।'
ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् शिव उसी
लिंगमें लीन हो गये। अद्भुत पवित्रता पाकर
नर्मदा भी बहुत सन्तुष्ट हुई। वह दर्शनमात्रसे
पापहारिणी बनकर अपने देशको चली गयी।
इस प्रकार मार्कण्डेय मुनिका वचन सुनकर
वे सब मुनीश्वर प्रसन्नचित्त हो गये और उन्होंने
अपने-अपने हितका कार्य किया। नर्मदेश्वरके
इस माहात्म्यको सुनकर भक्तियुक्त मनुष्य पापरूपी
केंचुलका त्याग करके उत्तम ज्ञान प्राप्त करेगा।
स्कन्दजी कहते हैं- महादेवीजी जब रुद्र-भावको
प्राप्त हुए, तब महादेवी जगदम्बा दक्षकन्या सतीके
रूपमें प्रकट हुईं। उन्होंने भी काशीमें तीव्र तपस्या
की। उनकी तपस्याका उद्देश्य था, अपने अनुरूप
श्रेष्ठ वरको प्राप्त करना। तपस्या करते-करते उन्होंने
देखा, सामने भगवान् शंकर लिंगरूपमें प्रकट हुए
हैं और स्पष्ट बोल रहे हैं- 'महादेवि! अब तपस्याकी
आवश्यकता नहीं, यह सतीश्वर लिंग तुम्हारे नामसे
विख्यात होगा। दक्षकुमारी! यहाँ आकर जैसे तुम्हारा
मनोरथ सफल हुआ है, उसी प्रकार इस लिंगकी
आराधना करके दूसरोंका मनोरथ भी सफल होगा।
कुमारी कन्या इस शिवलिंगकी पूजासे उत्तम पति
प्राप्त करेगी और कुवाँरा पुरुष इसकी आराधनासे
सुन्दर स्त्री प्राप्त करेगा। सतीश्वरकी भलीभाँति
पूजा करके जो जिस फलको चाहेगा, उसे वह
मनोवांछित फल शीघ्र ही प्राप्त होगा। आजसे आठवें
दिन तुम्हारे पिता दक्ष प्रजापति तुम्हारा विवाह मेरे
साथ करेंगे। तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ।'
ऐसा कहकर देवदेवेश्वर शिव वहीं (उस
लिंगमें) अन्तर्धान हो गये। दाक्षायणी भी प्रसन्नतापूर्वक
अपने घरको लौट गयीं। फिर आठवें दिन उनके
पिताने भगवान् शंकरके साथ उनका विवाह कर
दिया।
स्कन्दजी कहते हैं- इस प्रकार काशीमें सतीश्वर
लिंग प्रकट हुआ। रत्नेश्वरके पूर्वभागमें सतीश्वरका
दर्शन करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त
होता और क्रमशः ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
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९०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अमृतेश्वर लिंगकी महिमा तथा व्यासोक्त व्रत एवं धर्मोंका निरूपण
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! पूर्वकालकी बात है। यहाँ काशीपुरीमें सनारु नामवाले एक मुनि थे, जो गृहस्थ-आश्रमके धर्मका पालन करनेवाले, ब्रह्मयज्ञपरायण, अतिथिपूजक, शिवलिंग-पूजनमें तत्पर रहनेवाले और तीर्थमें दान नहीं लेनेवाले थे। उन सनारु मुनिके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उपजंघनि था। वह किसी दिन वनमें गया और वहाँ उसको एक साँपने डस लिया। तदनन्तर उसके समवयस्क मित्र उसे उठाकर आश्रममें ले आये। सनारुने लंबी साँस खींचकर उपजंघनिको स्वर्गद्वारके समीप महाश्मशानभूमिमें पहुँचाया। वहाँ श्रीफलके समान आकारवाला एक अत्यन्त गुप्त शिवलिंग था। वहीं उस शवको रखकर वे विचार करने लगे कि सर्पसे डसे हुए मनुष्यका दाह-संस्कार कैसे किया जाता है। इतनेमें ही उपजंघनि सोकर उठे हुएके समान जी उठा। उसे जीवित देख सनारु मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ। इसी समय एक चींटी कहीं मरे हुए एक चींटेको खींचकर वहाँ ले आयी। उस स्थानपर आते ही वह चींटा भी जी उठा और रेंगता हुआ अन्यत्र चला गया। यह देखकर मुनिने सोचा ‘यहाँ कोई ऐसा तत्त्व अवश्य है, जिसमें मरे हुएको जीवित कर देनेकी शक्ति विद्यमान है।' ऐसा अनुमान करके मुनि अपने कोमल हाथसे धीरे-धीरे वहाँकी जमीन खोदने लगे। इतनेमें ही उन्हें श्रीफलके बराबर एक शिवलिंग दिखायी दिया। तब सनारुने वहाँ उसका पूजन किया और उस प्राचीन लिंगका नाम अमृतेश्वर रखा, जो अत्यन्त सार्थक था। वे बोले—'आनन्दवनमें यह अमृतेश्वर लिंग है। इसके स्पर्शसे निश्चय ही अमृतत्वकी प्राप्ति हो सकती है।' जिनका मरा हुआ पुत्र जी उठा था, वे सनारु मुनि अमृतेश्वरकी पूजा करके अपने घरको गये। तभीसे अमृतेश्वर लिंग काशीमें प्रसिद्ध हुआ, जो मनुष्योंको सिद्धि देनेवाला है। कलियुगमें वह पुनः गुप्त हो जायगा। अमृतेश्वरके संस्पर्शसे मरे हुए व्यक्ति तत्काल जी उठते हैं और जीवित मानव उसके स्पर्शसे जीवन्मुक्त हो जाते हैं। अमृतेश्वरके समान शिवलिंग इस भूतलमें कहीं भी नहीं है। भगवान् शिवने इसे यत्नपूर्वक गुप्त कर रखा है।
अगस्त्यजी बोले—स्कन्दजी! श्रीवेदव्यास इन्द्रिय-शुद्धिके लिये जिन कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रतोंका निरूपण करेंगे, उनके स्वरूपका आप मुझसे वर्णन कीजिये।
स्कन्दजी बोले—महाबुद्धे! दिनमें एक बार भोजन करना, दूसरे दिन केवल रातमें एक बार भोजन करना, तीसरे दिन बिना माँगे जो कुछ मिल जाय उसीका एक बार आहार करना और चौथे दिन अखण्ड उपवास करना—इस प्रकार किया जानेवाला व्रत ‘पादकृच्छ्र’ कहलाता है। बरगद, गूलर, कमल, बिल्वपत्र और कुश—इनके पत्तोंसे क्रमशः एक-एक दिन जल पीकर रहना ‘पर्णकृच्छ्र’ कहा गया है। तिलकी खली, घी, मट्ठा, जल और सत्तू—इनको क्रमशः एक-एक दिन एक-एक बार खाकर रहना और अन्तमें एक दिन उपवास करना यह ‘सौम्यकृच्छ्र’ कहा गया है। तीन दिन प्रातःकाल हविष्य भोजन करना, तीन दिन सायंकाल भी हविष्य ग्रहण करना, फिर तीन दिन बिना माँगे प्राप्त होनेवाले हविष्यका आहार करना और अन्तमें तीन दिन अखण्ड उपवास करना—यह ‘कृच्छ्र’ व्रत है। ‘अतिकृच्छ्र’ व्रतका पालन करनेवाला द्विज प्रतिदिन एक-एक ग्रास करके तीन दिन प्रातःकाल, फिर तीन दिनतक सायंकाल भोजन करे और तीन दिन अयाचित आहार ग्रहण करके अन्तमें तीन दिनतक उपवास करे। केवल दूधसे इक्कीस दिनतक निर्वाह करना ‘कृच्छ्रातिकृच्छ्र’ व्रत है। बारह दिन अखण्ड उपवास करनेसे ‘पराकव्रत’ होता है। ‘प्राजापत्य’ व्रतका अनुष्ठान करनेवाला द्विज तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल