भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 924

* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८९५


और पुरानी न हो।' तत्पश्चात् गुरुपत्नीने आज्ञा दी—'तुम मेरे लिये चोली बना दो, जो मेरे शरीरके अनुरूप हो, न कसी हुई हो और न ढीली ही हो। वह कपड़ेके बिना केवल वल्कलसे बनी हो, बहुत सुन्दर हो और सदा स्वच्छ रहनेवाली हो।' इसके बाद गुरुके पुत्रने आदेश दिया—'मेरे लिये दो खड़ाऊँ तैयार करो, जिनपर चढ़कर मेरे पैरोंको कभी कीचड़का स्पर्श न हो, उनमें चमड़े आदिका बन्धन न लगा हो, जो दौड़ते समय भी मुझे आराम देनेवाली हों तथा जिनके द्वारा मैं स्थल—भूमिकी भाँति जलके ऊपर भी अच्छी तरह चल सकूँ।' अन्तमें गुरुपुत्री बोली—'मेरे लिये अपने ही हाथसे दो सोनेके कर्णफूल बना दो। साथ ही लड़कियोंके खेलनेयोग्य खिलौने भी दो, जो हाथीदाँतके बने हुए और तुम्हारे ही हाथसे तैयार किये गये हों।'

पार्वती! तब विश्वकर्माने सबके आगे 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा' इस प्रकार प्रतिज्ञा की और वनके भीतर प्रवेश करके वे चिन्ता करने लगे। कुछ करना तो जानते नहीं थे, परंतु 'मैं सब करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा सबके सामने कर चुके थे। अतः मन-ही-मन इस विचारमें पड़े कि 'क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कौन मुझे बुद्धिकी भी सहायता देगा, मैं किसकी शरणमें जाऊँ। जो मूढ़ मानव गुरु, गुरुपत्नी और गुरु-पुत्रकी आज्ञा स्वीकार करके उसे पूर्ण नहीं करता, वह नरकगामी होता है। ब्रह्मचारियोंका प्रधान धर्म गुरुशुश्रूषा ही है। गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन न करनेपर जो दोष लगेगा, उससे मेरा उद्धार कैसे होगा। मैं इस वनमें रहकर उनकी बात कैसे पूरी कर सकूँगा। गुरुजनोंकी तो बात दूर रही, दूसरे छोटे मनुष्योंके भी कार्यको 'हाँ' कहकर स्वीकार कर लेनेपर जो उसे पूरा नहीं करता, वह नरकगामी होता है। मैं अज्ञानी हूँ, असहाय हूँ। इन सब कार्योंको मैं कैसे पूर्ण कर सकूँगा। इन्हें स्वीकार तो मैंने भयके कारण कर लिया है।'

वनके मध्यभागमें बैठे हुए विश्वकर्मा जब इस प्रकार चिन्तामें लगे थे, उसी समय उन्हें अकस्मात् एक तपस्वी महात्मा दिखायी दिये। उनको नमस्कार करके विश्वकर्माने पूछा—'आप कौन हैं, जो मेरे मनको बहुत सुखी कर रहे हैं? आप तापसरूपमें मेरे प्रारब्ध हैं अथवा साक्षात् करुणावरुणालय भगवान् शिव ही प्रकट हो गये हैं। आप जो हों, सो हों, आपको नमस्कार है। मुझे उपदेश दें, मैं गुरुकी, गुरुपत्नीकी तथा गुरुपुत्रोंकी आज्ञाका पालन कैसे कर सकता हूँ, इसके लिये कोई उपाय बताइये।' वनमें उस ब्रह्मचारी बालकके ऐसा कहनेपर तपस्वी बोले—'त्वाष्ट्र! यह कौन-सी अद्भुत बात है? ब्रह्माजी भी भगवान् विश्वनाथकी कृपासे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेमें प्रवीण हुए हैं। यदि तुम काशीमें जाकर सर्वज्ञ विश्वनाथजीकी आराधना करोगे तो तुम्हारा विश्वकर्मा नाम सार्थक होगा। श्रीकाशीपुरीमें विश्वनाथजीकी कृपासे कोई भी मनोरथ दुर्लभ नहीं है। बालक! यदि तुम अपने मनोरथोंको प्राप्त करना चाहते हो तो विश्वनाथजीके स्थान काशीपुरीमें जाओ।'

इस प्रकार तपस्वीका वचन सुनकर विश्वकर्माने पूछा—महात्मन्! भगवान् शिवका वह आनन्दवन-काशी कहाँ है?

तपस्वी बोले—मैं भी वहाँ जानेकी इच्छा रखता हूँ, मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें पहुँचा देता हूँ।

तब उन अतिशय कृपालु महर्षिके साथ विश्वकर्मा विश्वनाथजीकी पुरीमें गये। वहाँ जानेसे उनका मन स्वस्थ हो गया। विश्वकर्माको काशीमें पहुँचाकर वे तपस्वी कहीं असम्भावित गतिसे चले गये। विश्वकर्मा सोचने लगे, 'कहाँ तो उस वनमें व्याकुल चित्तवाला मैं और कहाँ वे तापस मुनि, जो मुझे उत्तम उपदेश देकर यहाँ ले आये। यह सब उन्हीं त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवकी लीला है, जिनके भक्तको कहीं कुछ भी दुर्लभ नहीं है। मेरी गुरुभक्ति ही भगवान् शिवको प्रसन्न करनेमें कारण हुई है। उसीसे सन्तुष्ट होकर परम दयालु भगवान् विश्वनाथने मुझपर अनुग्रह किया है। यदि मुझपर उनकी कृपा न होती तो तपस्वीका संग कैसे प्राप्त