संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भी धिक्कार है और सबको ठगनेवाले इस शिवक्षेत्रको भी धिक्कार है। अब मैं ऐसा करूँ जिससे यहाँ किसीकी मुक्ति न हो।' ऐसा विचारकर जब वे काशीको शाप देनेके लिये उद्यत हुए, तब भगवान् शिव जोर-जोरसे हँसने लगे। तत्काल ही वहाँ एक शिवलिंग प्रकट हो गया, जो 'प्रहसितेश्वर' नामसे विख्यात हुआ। उससे साक्षात् भगवान् शंकर दुर्वासाके शापसे पुरीकी रक्षा करनेके लिये प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'महाक्रोधी तापस! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'
शाप देनेके लिये जिनका हाथ उठ चुका था, वे दुर्वासा मुनि भगवान् शंकरका करुणामय वचन सुनकर लज्जित हो गये और बोले—तीनों लोकोंको अभय देनेवाली इस काशीपुरीको शाप देनेके लिये उद्यत होनेवाले मुझको धिक्कार है। जो बुद्धिमान् काशीपुरीकी स्तुति करता है, जो काशीको हृदयमें धारण करता है, उसने बड़ी भारी तपस्या की है और उसीने करोड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। 'काशी' यह दो अक्षरोंका नाम जिसकी जिह्वाके अग्रभागपर स्थित है, उस उत्तम बुद्धिवाले पुरुषको कभी गर्भमें नहीं आना पड़ता। जो 'काशी' इस दो अक्षरके मन्त्रका प्रतिदिन प्रातःकाल जप करता है, वह इहलोक और परलोक—दोनोंको जीतकर लोकातीत पदको प्राप्त होता है।
भगवान् शिव बोले—अनसूयानन्दन! इस समय काशीकी स्तुतिके पुण्यसे तुम्हें जैसा उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ है, वैसा पहले तपस्यासे भी नहीं प्राप्त हुआ था। मुने! काशीकी स्तुतिकी लालसा रखनेवाला मनुष्य मुझे जैसा अतिशय प्रिय प्रतीत होता है, वैसा प्रिय यज्ञकी दीक्षा लेकर निरन्तर मेरा यजन करनेवाला पुरुष भी नहीं लगता।
यह सुनकर दुर्वासाजीने भगवान् शिवका स्तवन किया और प्रसन्न होकर वर माँगते हुए कहा—देवदेव! जगन्नाथ! करुणाकर! शंकर! मृत्युंजय! उग्र! भूतनाथ! पार्वतीपते! त्रिलोचन! नाथ! धूर्जटे! यहाँ प्रकट हुआ यह लिंग 'कामद' नामसे प्रसिद्ध होवे और यह तड़ाग 'कामकुण्ड' कहलाये।
देवदेवने कहा—महातेजस्वी मुने! 'एवमस्तु'। तुमने जो दुर्वासेश्वर-लिंगकी स्थापना की है, वही मनुष्योंकी कामना पूर्ण करनेके कारण कामेश्वर नामसे विख्यात होगा। जो शनिवारयुक्त त्रयोदशीको प्रातःकाल तुम्हारे स्थानपर स्थित कामकुण्डमें स्नान और तुम्हारे द्वारा स्थापित कामेश्वर-लिंगका दर्शन करेगा, वह कामजनित दोषसे यमयातनाको नहीं प्राप्त होगा। अनेक जन्मोंके उपार्जित नाना प्रकारके पाप काम-तीर्थके जलमें स्नान करनेसे क्षण भरमें नष्ट हो जायेंगे। कामेश्वरकी सेवासे समस्त कामनाएँ पूर्ण होंगी।
ऐसा वरदान देकर भगवान् शिव उसी लिंगमें विलीन हो गये। उस शिवलिंगकी आराधनासे दुर्वासा ऋषिने सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लीं। इसलिये बड़ी-बड़ी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सदा प्रयत्नपूर्वक काशीमें कामेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। महापातकोंकी शान्तिके लिये कामकुण्डमें स्नान करके कामेश्वरका दर्शन-पूजन करना चाहिये।
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श्रीविश्वकर्मेश्वर-लिंगकी महिमा
पार्वतीजी बोलीं—भगवान्! काशीमें परम विख्यात जो विश्वकर्मेश्वर-लिंग है, उसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कहिये।
महादेवजीने कहा—देवि! पूर्वकालमें त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वकर्मा हुए, जो ब्रह्माजीके द्वितीय स्वरूप हैं। उपनयन-संस्कार हो जानेपर वे गुरुकुलमें रहकर भिक्षान्न-भोजन एवं गुरुशुश्रूषा करने लगे। एक दिन वर्षाकाल आनेपर गुरुने उन्हें आज्ञा दी—'वत्स! तुम मेरे लिये एक पर्णशाला बना दो, जहाँ वर्षाका कष्ट न हो, जो कभी नष्ट