भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 922
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८९३

माँगो, मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ।'

अत्यन्त कृपापूर्वक सात पाताल फोड़कर अपने आगे स्थित हुए ज्योतिर्मय लिंगको देखकर बालकने दण्डके समान पृथ्वीपर गिरकर प्रणाम किया और रुद्रदेवतासम्बन्धी सूक्तोंसे उनकी स्तुति करके बोला— 'महादेव ! आप सांसारिक ताप हरनेवाले हैं। कृपया सदा इस शिवलिंगमें स्थित रहें और अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण किया करें। जो लोग यहाँ आकर आपका दर्शन, स्पर्श और नमस्कार करें, उन्हें आप परम उत्तम सिद्धि प्रदान करते रहें।' इस प्रकार उसके माँगे हुए वरको सुनकर भगवान् शिवने कहा— 'वीर ! तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब कुछ पूर्ण हो। विष्णुभक्त राजा अमित्रजित तुम्हारे पिता हैं, तुम उन्हींसे उत्पन्न हुए हो और साक्षात् भगवान् विष्णुके अंश हो। हे वीर ! यह शिवलिंग तुम्हारे ही नामपर 'वीरेश्वर' कहलायेगा। यह काशीमें अपने भक्तोंका मनोरथ सिद्ध करेगा। वीर ! आजसे मैं सदा इस लिंगमें स्थित रहूँगा और शरणागतोंको परम उत्तम सिद्धि दूँगा। कलियुगमें प्रायः कोई भी मेरी महिमाको नहीं जानेगा। जो भाग्यसे जानेगा, वह उत्तम सिद्धिको प्राप्त होगा। यहाँ किया हुआ जप, होम, दान, पूजन एवं जीर्णोद्धार आदि पुण्यकार्य अक्षय फलका साधक होगा। तुम सब राजाओंके लिये दुर्लभ, श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करके अन्तमें सिद्धि पाओगे। वीर ! वीरेश्वर-तीर्थमें स्नान और वीरेश्वरकी पूजा करके मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेगा। चतुर्दशी तिथिमें वीरेश्वरकी पूजा करके यत्नपूर्वक एक रात्रिमें भी जागरण कर लेनेपर मनुष्य फिर पांचभौतिक शरीरको नहीं ग्रहण करता है। जो वीरेश्वरके समीप एक महारुद्रियका जप करे अथवा करावेगा, उसे कोटि रुद्रियका फल प्राप्त होगा। वीरेश्वरके निकट व्रती मनुष्य जो व्रत और उद्यापन आदि करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म कोटिगुना हो जाता है। जिसने भगवान् वीरेश्वरके सम्मुख आठ बार नमस्कार कर लिये, उसे आठ करोड़ नमस्कारका फल मिलता है। वीर ! यह वीरेश्वर-लिंग मेरे वरदानसे सब प्रकारकी सम्पत्तियोंका स्थान होगा। वीरेश्वर-लिंगकी सेवा करनेवाले पुरुषोंको मेरी आज्ञासे जीते-जी ही तारक ज्ञानकी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये शुभकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको इस वीरेश्वर-लिंगका सेवन अवश्य करना चाहिये।'

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दुर्वासेश्वर (कामेश्वर)-लिंगकी महिमा

स्कन्दजी कहते हैं—एक समय महातपस्वी दुर्वासा ऋषि भगवान् शंकरके आनन्दवनमें आये। यहाँ अनेक प्रकारके मन्दिरोंसे सुशोभित भगवान् शंकरका क्रीडास्थान, बहुत-से कुण्ड और पोखरे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। बहुत-से श्रेष्ठ शिवभक्त सब अंगोंमें विभूति लगाये, मस्तकपर जटा बढ़ाये, कौपीनमात्र पहने महादेवजीके ध्यानमें तत्पर थे। उनका दर्शन करके दुर्वासा मुनिको बड़ा हर्ष हुआ। कहीं-कहीं असंग, अपरिग्रह, कालसे भी भय न रखनेवाले तथा विश्वनाथजीके शरणागत त्रिदण्डी संन्यासी दिखायी देते थे। उन सबके दर्शनसे दुर्वासाजी बड़े आनन्दित हुए और मन-ही-मन कहने लगे 'यह परम कल्याणका स्थान है, ऐसा स्थान स्वर्गलोकमें भी कहाँ है। यह काशीपुरी तो पशु-पक्षियोंके भी परमानन्दको बढ़ानेवाली है। यह विश्वनाथपुरी मेरे चित्तको जिस प्रकार आकृष्ट कर रही है, वैसा आकर्षण न तो सम्पूर्ण भूमण्डलमें है, न स्वर्गलोकमें है और न पातालमें ही है।' इस प्रकार उस पुरीकी प्रशंसा करके दुर्वासाजीकी चित्तवृत्ति शान्त हुई। फिर वे वहाँ दीर्घकालतक भारी तपस्यामें लगे रहे, परंतु जब उसका कोई फल नहीं दिखायी दिया, तब उनके क्रोधकी सीमा नहीं रही। वे कहने लगे 'मुझको धिक्कार है, मेरे कठोर तपको