संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ८९२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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मन्त्रवेत्ता द्विज एक हाथसे कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके 'जातवेदसे......' इत्यादि ऋचाद्वारा घृत और मधु आदिमें डुबोये हुए स्वतःविकसित एक सहस्र कमल-पुष्पोंकी आहुति दे। तत्पश्चात् नयी ब्यायी हुई सीधी-सादी सुलक्षणा कपिला गाय आचार्यको दान करे। पति-पत्नी नूतन वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो भक्तिपूर्वक उपवास करके दूसरे दिन चतुर्थीको प्रातःकाल स्नानके अनन्तर आचार्यकी आदरपूर्वक पूजा करें। उन्हें प्रसन्नतापूर्वक वस्त्र, आभूषण, माला एवं दक्षिणा दें। फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करके सब सामग्रियोंसहित स्वर्णप्रतिमा आचार्यको निवेदन करे—
नमो विश्वविधानज्ञे विधे विविधकारिणि।
सुतं वंशकरं देहि तुष्टामुष्माद्व्रताच्छुभात्॥
'सम्पूर्ण विश्वके विधानको जानने तथा नाना प्रकारकी सृष्टि करनेवाली देवी ब्रह्माणी! आपको नमस्कार है। इस शुभ व्रतके अनुष्ठानसे प्रसन्न होकर आप मुझे वंश चलानेवाला पुत्र दीजिये।'
तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणभोजन कराकर शेष अन्नसे स्वयं पारण करना चाहिये। राजन्! इस प्रकार यह व्रत मैं आपके साथ करना चाहती हूँ। आप मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करें।
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! यह सुनकर श्रेष्ठ राजा अमित्रजितने प्रसन्नतापूर्वक पत्नीके साथ उस व्रतका अनुष्ठान किया। रानी गर्भवती हुई। गर्भावस्थामें उसने देवी पार्वतीसे यह प्रार्थना की—'महामाये! मुझे साक्षात् भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये, जो जन्म लेते ही स्वर्गलोकमें चला जाय और फिर लौट आवे। सम्पूर्ण भूमण्डलमें भगवान् शिवका वह सुप्रसिद्ध भक्त हो। मेरे स्तनोंका दूध पीये बिना ही वह क्षणभरमें सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाले किशोरके समान हो जाय।'
रानीकी भक्तिसे अत्यन्त सन्तुष्ट होकर गौरीदेवीने भी 'तथास्तु' कह दिया। तत्पश्चात् समय आनेपर रानीने मूलनक्षत्रमें एक पुत्रको जन्म दिया। उस समय हितैषी मन्त्रियोंने प्रसूतिगृहमें स्थित हुई रानीसे निवेदन किया—'देवि! आपका यह पुत्र दुष्ट नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। यदि आप राजाके जीवनकी रक्षा चाहती हैं, तो इस पुत्रको त्याग दें।' यह सुनकर पतिव्रता रानीने उस पुत्रको त्याग दिया। उन्होंने धाईको बुलाकर कहा—'धाय! पंचमुद्र नामक महापीठमें विकटा नामवाली एक मातृका रहती हैं। उनके आगे इस बालकको रखकर तू इस प्रकार कहना—'देवि! इस पुत्रको पार्वतीदेवीने दिया है। अब इसे मैं आपकी सेवामें सौंपती हूँ। पतिके हितकी इच्छा रखनेवाली महारानीने यह बालक आपको समर्पित किया है।'
रानीकी इस आज्ञाके अनुसार धाय उस सुन्दर बालकको विकटादेवीके आगे रखकर अपने घर लौट आयी। तब विकटादेवीने योगिनियोंको बुलाकर कहा—'इस बालकको तुम मातृकागणके आगे ले जाओ और उनकी जैसी आज्ञा हो, वह करो। इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना।' विकटाके कहनेसे आकाशगामिनी योगिनियोंने उस बालकको क्षणभरमें वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ ब्राह्मी आदि मातृकाएँ विद्यमान हैं। ब्रह्माणी, वैष्णवी, रौद्री, वाराही, नारसिंही, कौमारी, माहेन्द्री, चामुण्डा और चण्डिका—इन नौ मातृकाओंने विकटाके भेजे हुए उस सुन्दर बालकको देखकर उससे एक साथ पूछा—'बेटा! तेरे पिता और माता कौन हैं?' जब वह कुछ न बोल सका, तब मातृकागणने योगिनियोंसे कहा—'इसमें बड़े उत्तम लक्षण दिखायी देते हैं, यह बालक राजा होनेके योग्य है। अतः योगिनियो! तुम इसे पुनः उसी पीठमें ले जाओ, जहाँ महादेवी पंचमुद्रा (विकटा) रहती हैं। उस पीठकी सेवा और विश्वनाथजीकी कृपासे सोलह वर्षकी-सी आकृतिवाले इस बालकको उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी।' इस प्रकार मातृकागणोंका आशीर्वाद मिलनेपर योगिनियोंने पुनः क्षणभरमें उस बालकको उसी पंचमुद्रांकित पीठमें पहुँचा दिया। स्वर्गलोकसे इस लोकमें आया हुआ वह बालक काशीमें बड़ी भारी दिव्य तपस्या करने लगा। उसकी तीव्र तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिव लिंगरूपसे उसके आगे प्रकट हुए और बोले—'राजकुमार! तुम वर