संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * । ८९१
आज या कल प्रत्येक शरीरधारीको अवश्य मरना है। बल अथवा छलसे भी यदि तुम्हारे हाथसे मृत्यु हो, तो वही श्रेष्ठ है। यह विद्याधरी कन्या सती-साध्वी है। मैंने इसे कलंकित नहीं किया है, अपितु तुम्हारे लिये इसकी रक्षा की है।'
ऐसा कहकर दानवने पर्वतको भी हिला देनेवाले अपने बायें हाथके प्रहारसे राजाकी छातीपर आघात किया। राजाने उस प्रहारको सह लिया और हाथमें त्रिशूलको तौलते हुए उसकी छातीको निशाना बनाया। त्रिशूलकी मार खाकर दानवने उसी क्षण प्राण त्याग दिया। इस प्रकार देवताओंको कम्पित करनेवाले कंकालकेतुको मारकर राजाने विद्याधरीसे कहा—'सुन्दरि ! देवर्षि नारदके मुखसे तुम्हारा सन्देश पाकर मैंने तुम्हारी इच्छाके अनुसार यह कार्य किया है। अब बताओ और क्या करूँ?'
मलयगन्धिनी बोली—वीर ! तुम्हीं मेरे जीवन हो, मैं प्राणपणसे तुम्हारी हो चुकी हूँ, फिर मुझसे क्या पूछते हो।
विद्याधर-कन्याके ऐसा कहते ही देवलोकसे देवर्षि नारद मुनि आ पहुँचे। उनका दर्शन करके उन दोनोंको बड़ा सन्तोष हुआ। दोनोंने एक साथ मुनिको प्रणाम किया और मुनिने भी दोनोंको आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् नारदजीने पाणिग्रहणकी विधिसे दोनोंका मंगल अभिषेक किया और वे दोनों उन्हींके बताये हुए मार्गसे भूलोकमें आये। मलयगन्धिनीके साथ अमित्रजित काशीपुरीमें आये। वह पुरी पुरवासियोंद्वारा खूब सजायी गयी थी। विद्याधरीने दूरसे ही काशीका वैभव देखकर स्वर्गलोक और पातालनगरीको भी छोटा माना। राजा अमित्रजितने मलयगन्धिनीको धर्मपत्नीके रूपमें प्राप्त करके काशीमें धर्मप्रधान पीठका भलीभाँति सेवन किया और मनोवांछित उत्तम सुखको प्राप्त किया। एक समय उस पतिव्रता रानीने मनमें पुत्रकी कामना लेकर अपने विष्णुभक्त पतिसे एकान्तमें निवेदन किया—'राजन् ! प्राणनाथ ! यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं पुत्रकी कामनासे अभीष्ट तृतीयाका महान् व्रत करूँगी। वह व्रत मनोवांछित फलको देनेवाला है।'
राजाने पूछा—देवि ! अभीष्ट तृतीयाको कैसे व्रत किया जाता है, उसमें किस देवताकी पूजा होती है तथा उसका विधान और फल क्या है? जो नारी अपने पतिकी आज्ञा लिये बिना ही व्रत आदिका अनुष्ठान करती है, वह जीते-जी दुःख उठाती है और मरनेके बाद नरकमें जाती है।*
वीरेश्वरका जन्म, तपस्या, वीरेश्वरगलिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा
रानी बोली—पृथ्वीनाथ ! पूर्वकालमें पुत्रकी इच्छा रखनेवाली कुबेरपत्नी श्रीमुखीके आगे ब्रह्मपुत्र नारदजीने इस व्रतका वर्णन किया था। देवी श्रीमुखीने इस व्रतका पालन किया और उन्हें नलकुबर नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई। मार्गशीर्षमासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको कलशके ऊपर एक ताम्रपत्र रखकर उसे चावलसे भर दे। उसके ऊपर एक वस्त्र बिछावे, जो फटा-पुराना न हो, नवीन हो और उसे हल्दीके रंगमें रँग दे। उस वस्त्रके ऊपर सूर्यकी किरणोंसे विकसित हुए सुन्दर कमलपुष्पको रखकर उसकी कर्णिकापर स्वर्णनिर्मित ब्रह्माणीजीकी प्रतिमाकी स्थापना करके रत्न और रेशमी वस्त्र आदिके द्वारा उसकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पूजामें नाना प्रकारके सुन्दर पुष्प, नारंगी आदि फल, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थ, कपूर, कस्तूरी, उत्तम अन्न आदिके नैवेद्य, अनेक प्रकारके पकवान तथा अगर आदि धूप—इन सब वस्तुओंका यथावत् उपयोग करना चाहिये। फूलोंसे सजाये हुए सुन्दर मण्डपमें बैठकर निद्रारहित हो उत्तम उत्सव मनाते हुए रात्रिको जागरण करे।
* नारी पत्यननुज्ञाता या व्रतादि समाचरेत्। जीवन्ती दुःखिनी सा स्यान्मृता निरयमृच्छति ॥ (स्क० पु०, का० उ० ८२। १३९)