संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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निःशंक होकर नावसे उतरकर यज्ञवाराहकी स्तुति करते हुए शीघ्र उसके पीछे-पीछे चले जाना। ऐसा करनेपर तुम पाताललोकमें चम्पकावती नगरीको देखोगे।
यों कहकर ब्रह्मकुमार नारदजी अन्तर्धान हो गये। राजाने भी समुद्रतटपर पहुँचकर पूर्वोक्त सब बातोंका अवलोकन करके नारदजीके कहे अनुसार समुद्रके भीतर प्रवेश किया और वे चम्पकावती नगरीमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने उस विद्याधरकुमारीको देखा, मानो तीनों लोकोंकी सौन्दर्यलक्ष्मी एकत्र मूर्तिमान् हो गयी है। राजा उसके समीप गये। वह भी झूलेपरसे उतरकर लज्जाके भारसे नीचे मुख किये उनसे बोली—'मनोहर रूपवाले पुरुष ! आप कौन हैं, जो मुझ अभागिनीके चित्तको अपनी ओर खींचते हुए इस कालके घरमें चले आये हैं? वह क्रूर आकृतिवाला कंकालकेतु जबतक आ नहीं जाता, उसके पहले ही आप इस शस्त्रागारमें छिपकर बैठ जाइये। श्रीपार्वतीजीके वरदानसे वह मेरे कन्या-व्रतको भंग करनेमें समर्थ नहीं है, किंतु परसों आनेवाली तृतीया तिथिको वह मेरा पाणिग्रहण करना अवश्य चाहता है।'
विद्याधरीके ऐसा कहनेपर महाबाहु अमित्रजित् शस्त्रागारमें छिपे हुए-से बैठ गये। तदनन्तर सायंकालमें मृत्युको भी भयभीत करनेवाला वह भयंकर आकारवाला दानव आकर विद्याधरीसे बोला—'सुन्दरी ! इन दिव्य रत्नोंको ग्रहण करो। परसों पाणिग्रहण होनेसे तुम्हारा कन्याभाव निवृत्त हो जायगा। कल प्रातःकाल तुम्हारी सेवाके लिये सहस्रों दासियाँ दूँगा। दिक्पालोंके घरमें जितना भी वैभव है, उस सबकी तुम स्वामिनी होओगी। मेरी पत्नी बननेसे तुम मेरे साथ दिव्य भोगोंका उपभोग कर सकोगी।' इस प्रकार प्रलाप करके वह दानव अपनी गोदमें त्रिशूल रखकर उन्मत्त एवं निडर होकर सो गया। तब उसको सोया हुआ जानकर पार्वतीजीके वरदानको याद करती हुई विद्याधरकुमारीने मनुष्योंमें श्रेष्ठ सर्वांगसुन्दर तथा विष्णुभक्तिसे सुरक्षित राजाको बुलाया और दैत्यके अंगसे त्रिशूल लेकर कहा—'इसे ग्रहण कीजिये तथा इस दानवको शीघ्र मार डालिये।'
कन्याके हाथसे त्रिशूल लेकर बालसूर्यके समान कान्तिमान् राजा अमित्रजित्ने हर्षका अनुभव किया और उस विद्याधरकुमारीको अभयदान दिया। फिर जगत्की रक्षा करनेवाले मणिरत्नस्वरूप चक्रसुदर्शनधारी श्रीहरिका मन-ही-मन स्मरण करके निर्भय हो, बायीं लातसे उस दानवको मारा और कहा—'अरे ओ दुष्ट ! उठकर खड़ा हो। कन्याओंपर बलात्कार करनेवाले लम्पट ! आ, मेरे साथ युद्ध कर। मैं सोते हुए शत्रुको नहीं मारता।'
यह सुनकर वह दानव बड़े वेगसे उठा और बार-बार कहने लगा—प्रिये ! मेरा त्रिशूल तो दो। यह कौन है, जो मौतके घरमें आ गया है? मैंने इसे देख लिया है, अतः आज इसकी आयु पूरी हो चुकी है। ऐसा कहकर उस दानवने राजाकी छातीमें बड़े जोरसे मुक्का मारा। राजाके रक्षक भगवान् थे। अतः उन्होंने उस आघातसे थोड़ी-सी भी वेदनाका अनुभव नहीं किया। प्रत्युत उनकी कठोर छातीसे टकराकर दानवका हाथ ही टूटने-सा लगा। तब राजाने उसके मुखमें एक तमाचा मारा। इससे दानवका सिर घूम गया और वह एक बार धरतीपर गिरकर पुनः उठ खड़ा हुआ। किसी प्रकार धैर्य धारण करके उसने राजासे कहा—'मैंने जान लिया तुम मनुष्य नहीं, मनुष्यरूपमें साक्षात् विष्णु हो। मधुसूदन ! यदि तुम बलवान् हो तो एक बात करो। इस बड़े भारी त्रिशूलको त्यागकर अपने आयुधोंसे मेरे साथ युद्ध करो। तुमने वामनरूप धारण करके बलिको पातालमें भेजा है। तुम्हींने नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया था। तुमने ही जटाधारी रामरूपसे लंकापति रावणको मारा था और तुम्हींने गोपवेष ग्रहण करके कंस आदि असुरोंका संहार किया है। मत्स्यरूपसे तुम्हारे द्वारा शंख आदि बहुतसे दानव मारे गये हैं। मायावियोंमें अग्रगण्य मैं तुमसे डरता नहीं हूँ।