भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 918, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 918
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८९

यज्ञपुरुष हैं, इस जगत्‌के अन्तरात्मा हैं तथा इसकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भी हैं, इस सम्पूर्ण विश्वको उन्हीं भगवान्‌का स्वरूप समझनेवाले भूपालशिरोमणे ! आज तुम्हारा कल्याणकारी दर्शन पाकर मैं परम पवित्र हो गया। इस क्षणभंगुर संसारमें एक ही सार वस्तु है, वह यह कि भगवान् लक्ष्मीकान्तके चरणारविन्दोंमें भक्ति-भाव बढ़ाया जाय; क्योंकि वह समस्त पुरुषार्थोंको देनेवाला है। जो सब कुछ छोड़कर सदा एकमात्र भगवान् विष्णुका भजन करता है, उस उत्तम बुद्धिवाले पुरुषकी सेवामें सब पदार्थ स्वयं ही उपस्थित होते हैं। जिसकी इन्द्रियाँ भगवान् हृषीकेशके चिन्तनमें स्थिर हो गयी हैं, वही इस अत्यन्त चंचल (क्षणभंगुर) ब्रह्माण्डमें स्थिरताको प्राप्त होता है। यौवन, धन और आयुको कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलविन्दुके समान अत्यन्त चपल जानकर एकमात्र भगवान् अच्युतकी शरण लेनी चाहिये *। जिसकी वाणीमें, चित्तमें सर्वत्र भगवान् जनार्दन विद्यमान रहते हैं, वह नररूपमें साक्षात् नारायण है। सदा उसीकी वन्दना करनी चाहिये। भगवान् लक्ष्मीपतिका निष्कपटभावसे ध्यान और पूजन करके इस पृथ्वीपर कौन श्रेष्ठपुरुष नहीं हो गया है। भूपाल ! तुम्हारी इस विष्णुभक्तिसे सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हारा कुछ उपकार करना चाहता हूँ और इसीलिये जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। विद्याधर-राजकुमारी मलयगन्धिनी अपने पिताके उद्यानमें अपनी सखियोंके साथ खेल रही थी। उसी समय कपालकेतुके पुत्र कंकालकेतु नामक महाबली दानवने आकर उसे हर लिया। आगामी तृतीयाको उसका पाणिग्रहण निश्चित हुआ है। वह कुमारी इस समय पाताललोककी चम्पकावती नगरीमें है। हाटकेश्वर शिवके स्थानसे मैं आ रहा था, तो उसने मुझे देखा और प्रणाम करके आँसू बहाते हुए कहा- "भगवन् ! राजा अमित्रजितसे आप मेरा यह संदेश कह दें-'महाराज ! मैं गन्धमादन पर्वतपर अपने पिताके उद्यानमें बालोचित खेल-कूदमें लगी हुई थी। उसी समय दुराचारी कंकालकेतु मुझे मूर्च्छित करके वहाँसे हर लाया। उसको दूसरे किसी अस्त्रके आघातसे जीतना कठिन है। वह अपने ही त्रिशूलसे मर सकता है। अन्यथा युद्धमें उसे परास्त करना असम्भव है। यदि कोई कृतज्ञ वीर मेरे दिये हुए त्रिशूलसे इस दुष्ट दानवको मारकर मुझे यहाँसे ले जाता, तो मेरा बड़ा उपकार होता। यदि यहाँ आकर आप मेरा उपकार करना चाहें, तो अवश्य आवें और उस दुष्ट दानवके हाथसे मेरा उद्धार करें। मुझे भी भगवती जगदम्बाने यह वर दिया है कि बेटी ! परम बुद्धिमान् विष्णुभक्त पुरुष तुमसे विवाह करेगा। तृतीया तिथितक देवीका यह वरदान जिस प्रकार सत्य हो सके वैसा प्रयत्न करें। आप केवल निमित्तमात्र हो जायँ।' राजन् ! इस प्रकार मलयगन्धिनीके वचनसे मैं तुम्हारे पास आया हूँ। तुम विष्णुभक्तिपरायण, तरुण और बुद्धिमान् हो। अतः कार्यकी सिद्धिके लिये जाओ और उस दुष्ट दानवको मारकर मलयगन्धिनीको शीघ्र ले आओ। नरेश्वर ! वह विद्याधरकुमारी तुम्हारी राह देखकर ही जीवित है।"

नारदजीका यह वचन सुनकर राजा अमित्रजितने चम्पकावती नगरीमें जानेका उपाय पूछा। तब नारदजीने पुन: कहा—'राजन् ! तुम पूर्णिमाके दिन शीघ्र ही समुद्रके तटपर पहुँचकर वहाँ एक नावपर बैठ जाओ। वहाँ तुम्हें एक रथपर कल्पवृक्ष दिखायी देगा। वहीं एक दिव्य पलंगपर कोई दिव्यांगना वीणा लेकर यह गाथा गान करती होगी—

यत्कर्म विहितं येन शुभं वाथ शुभेतरम्।
स एव भुङ्क्ते तत्तथ्यं विधिसूत्रनियन्त्रितः ॥

'जिस मनुष्यके द्वारा जो शुभ या अशुभ किया गया है, वही भाग्यसूत्रमें बँधकर उस कर्मका फल भोगता है। यह सर्वथा सत्य है।'

इस गाथाका भलीभाँति गान करके वह बाला रथ, कल्पवृक्ष और पलंगके साथ क्षणभरमें समुद्रके भीतर प्रवेश कर जायगी। उस समय तुम भी


* यौवनं धनमायुष्यं पद्मिनीजलविन्दुवत्। अतीव चपलं ज्ञात्वाच्युतमेकं समाश्रयेत्॥ (स्क० पु०, का० उ० ८२।४३)

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