भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वीरेश्वर लिंगकी महिमाके प्रसंगमें राजा अमित्रजित और मलयगन्धिनीका चरित्र

पार्वतीजीने कहा—महेश्वर! सुनती हूँ, वीरेश्वर लिंगकी बड़ी भारी महिमा है। काशीमें उस श्रेष्ठ लिंगका आविर्भाव किस प्रकार हुआ, यह मुझसे कहिये।

महादेवजी बोले—महादेवि! पूर्वकालमें अमित्रजित नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, सत्त्वगुणसम्पन्न, प्रजाको प्रसन्न रखनेवाले, यशके धनी, उदार, उत्तम बुद्धिसे युक्त तथा ब्राह्मणोंको देवताके समान माननेवाले थे। सदा यज्ञान्त-स्नान करनेके कारण उनके केश गीले रहते थे। वे विनयशील, नीतिज्ञ, सम्पूर्ण कर्मोंमें कुशल, समस्त विद्याओंमें पारंगत, गुणवान्, गुणी जनोंपर स्नेह रखनेवाले, कृतज्ञ, मृदुभाषी, पाप कर्मोंसे विमुख, सत्यवादी, पवित्रताके स्थान, कम बोलनेवाले और जितेन्द्रिय थे। उन्होंने भगवान् वासुदेवके युगल चरणोंमें अपनी चित्तवृत्ति लगाकर ईति-भीतिसे रहित निर्द्वन्द्व राज्य किया। शिवे! उस परम सौभाग्यवान् नरेशके राज्यमें प्रत्येक महलके भीतर पग-पगपर भगवान्‌के ऊँचे-ऊँचे मन्दिर थे। वहाँके प्रत्येक मन्दिरमें गोविन्द, गोप, गोपाल, गोपीजनमनोहर, गदापाणे, गुणातीत, गुणाढ्य, गरुड़ध्वज, कमलापते, कृष्ण, केशव, कमलाक्ष, कालभयनाशन, पुरुषोत्तम, पापारि, पुण्डरीकलोचन, पीताम्बरधारी, पद्मनाभ, परात्पर, जनार्दन, जगन्नाथ, जाह्नवी-जलकी जन्मभूमि, जीवजन्महर, जंजपूकाघनाशन (नाम-जप करनेवालोंकी अघराशिका नाश करनेवाले), श्रीवत्सवक्ष, श्रीकान्त, श्रीकर, श्रेयोनिधे, श्रीरंग, शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, शौरे, शीतांशुलोचन, दामोदर, देवकीहृदयानन्द, नागराजकी शय्यापर सोनेवाले, विष्णु, वैकुण्ठनिलय, विष्टरश्रवा, विष्वक्सेन, वनमालिन्, त्रिविक्रम, त्रिलोकीश, चक्रपाणे और चतुर्भुज इत्यादि पवित्र नामोंका कीर्तन होता था। स्त्री, वृद्ध, बाल और गोपाल सभीके मुखसे भगवन्नामका उच्चारण होता था। जहाँ-तहाँ सब ओर भगवान् विष्णुकी मनोहर लीला-कथा सुनायी पड़ती थी। घर-घरमें तुलसीके बगीचे देखे जाते थे। भगवान् लक्ष्मीपतिके पवित्र एवं विचित्र चरित्रोंकी चर्चा होती थी। महलकी दीवारोंपर श्रीहरिके विचित्र चरित्र ही चित्रकारोंद्वारा अंकित किये गये थे। भगवत्कथाके सिवा दूसरी कोई वार्ता वहाँ नहीं सुनायी देती थी। उस राजाके भयसे व्याधलोग हरिणोंपर बाण नहीं चलाते थे, क्योंकि वे हरिण श्रीहरिके नामका एक अंश धारण करते हैं। इसीलिये वे वनमें सुखपूर्वक विचरते थे। कोई मछली और मांस खानेवाला मनुष्य भी उस राजाके डरसे कभी मछली, कछुवा और वराह आदिका वध नहीं करता था। एकादशी तिथि आनेपर उस अमित्रजितके राज्यमें उत्तान सोनेवाले शिशु भी स्तनपान नहीं करते थे। पशु भी एकादशीको घास चरना छोड़कर उपवास करते थे, फिर औरोंकी तो बात ही क्या है। उस हरिभक्त राजाके शासनकालमें एकादशी प्राप्त होनेपर समस्त पुरवासी मिलकर बड़ा भारी उत्सव मनाते थे। वहाँके लोग प्रतिदिन जो शुभकर्म करते थे उन्हें निष्कामभावसे भगवान् वासुदेवको समर्पित कर देते थे। महाराज अमित्रजितके लिये श्रीकृष्ण ही परम देवता, श्रीकृष्ण ही परम गति और श्रीकृष्ण ही परम बन्धु थे।

इस प्रकार उस राजाके राज्य करते समय एक दिन श्रीमान् देवर्षि नारद उनसे मिलनेके लिये आये। राजाने मधुपर्ककी विधिसे उनका यथावत् स्वागत-सत्कार किया। तब नारदजीने उनसे कहा—‘राजन्! तुम धन्य हो, कृतार्थ हो तथा सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी माननीय हो; क्योंकि समस्त प्राणियोंमें तुम्हें भगवान् गोविन्दका ही दर्शन होता है। जो भगवान् विष्णु वेदपुरुष हैं,